" /> कट्टरता नहीं, विनम्रता है इस्लाम!, जिहाद, शरीयत और काफिर की गलत अभिव्यक्तियों ने बढ़ाई दूरियां

कट्टरता नहीं, विनम्रता है इस्लाम!, जिहाद, शरीयत और काफिर की गलत अभिव्यक्तियों ने बढ़ाई दूरियां

बदलाव प्रकृति का नियम है और जो इस बदलाव को स्वीकार नहीं करता, वह या तो पीछे छूट जाता है या फिर खत्म हो जाता है। लेकिन इस मामले में अक्सर मुसलमानों का नजरिया मेल नहीं खाता। शिक्षा को सबसे अधिक महत्व देने वाले इस्लाम को कट्टरपंथी मुसलमानों ने १४०० वर्ष पुराने ढर्रे पर ही रखने का प्रयास किया। दरअसल इस्लाम को एक धर्म के रूप में जाना तो जाता है लेकिन इस्लाम के मूल स्रोत पवित्र कुरआन में इस्लाम को धर्म, मज़हब या रिलीजन नहीं कहा गया है। इस्लाम का शाब्दिक अर्थ होता है खुद को अल्लाह के आगे समर्पित करना। इस तरह इस्लाम एक ऐसी जीवन प्रणाली है जिसमें अल्लाह को सर्वोपरि मान कर उसकी इच्छा और निर्देश के अनुसार जीवन को संयोजित किया जाता है। इस्लाम खुद को एक दीन अथवा जीवन प्रणाली कहता है। दरअसल धर्म के अनेक पैमाने हैं। धर्म अपने सीमित अर्थों में ईश्वर के प्रति आस्था, अनुष्ठान, धार्मिक पद्धति और रीति को कहा जाता है। जीवन प्रणाली में बेशक सबसे पहले ईश्वर के प्रति आस्था और धार्मिक कर्मकांड आते हैं लेकिन जीवन प्रणाली केवल आस्था या कुछ कर्मकांडों तक सीमित नहीं होती, बल्कि जीवन के सिद्धांत और मूल मंत्र से शुरू हो कर पूरे जीवन चक्र और उसके नियमों को अपने दायरे में लेती है। इस्लाम के दीन होने का अर्थ है, इस्लाम में ईश्वर के प्रति जो आस्था है उसके अनुसार पूरे जीवन का एक सिद्धांत के अनुसार जीवन के हर मामले के लिए एक नियमावली का होना, जिसे शरीयत कहते हैं। इस नियमावली के अनुसार अल्लाह की उपासना करना और जीवन की गतिविधियों को नियोजित करने का नाम इस्लाम है। अगर मुसलमान केवल आस्था को अपनाए रहें और उसके अनुसार केवल कुछ इबादत की रस्में तथा धार्मिक या सांस्कृतिक कर्मकांड करते रहें, लेकिन शरीयत से मुक्त हो जाएं तो वे अधूरे मुसलमान होंगे। इस्लाम को अपनी जीवन प्रणाली अर्थात दीन बनाने की उनकी इच्छा और ज़िम्मेदारी पूरी नहीं होगी।
लेकिन पैगंबर मोहम्मद साहब और उनके बाद खुलफा-ए-राशिदीन द्वारा सींचे गए इस्लाम को धीरे-धीरे अलग-अलग विचारों के इस्लामी धर्मगुरुओं और शासकों ने अपने तरीके से पेश करना शुरू कर दिया। इस्लाम के मानने वालों ने इस्लाम की अलग-अलग व्याख्या तैयार कर ली जिसका असर यह हुआ है कि एक अल्लाह, एक कुरआन, एक नबी को मानने वाला मुसलमान अनेक फिरकों में बंटता चला गया। दुनिया में मुसलमानों का फैलाव दो तरह से हुआ है। एक तो विभिन्न कौमों और लोगों के द्वारा इस्लाम स्वीकार किए जाने से और दूसरे वंशगत रूप से, यानि किसी मुस्लिम परिवार में जन्म लेने से। पहली बार पैगंबर मोहम्मद साहब ने जब अरब में इस्लाम का पैग़ाम लोगों को दिया तो वहां कोई मुस्लिम समुदाय मौजूद नहीं था, बल्कि जिन लोगों ने इस्लाम को मान लिया वे मुसलमान कहलाए। उसके बाद इस्लाम का जो फैलाव हुआ वह लोगों के द्वारा इस्लाम को अपना लेने से ही हुआ। इस तरह विभिन्न देश, वंश, काल के हिसाब से इस्लाम को मानने का अलग-अलग रूप सामने आता रहा। रोचक यह कि हर तबका खुद को सही और दूसरों को गलत ठहराने की प्रक्रिया में लगा रहा। आज भी यह परंपरा कायम है।
जिस शरीयत की आज दुहाई मुस्लिम समाज देता है, क्या कभी उसकी तह में जाने का मुस्लिम समाज ने कोई प्रयास किया है? लगता तो नहीं है ऐसा किया गया होगा। क्या मुस्लिम समाज जानता है कि शरीयत या शरीयत कानून होता क्या है? ट्रिपल तलाक, जिहाद, काफिर जैसे गिने चुने मसलों के लिए शरीयत की दुहाई देने वाले मुसलमानों को इसका गहराई से अध्ययन करना चाहिए। इस्लामी मुल्कों में शरीयत कानून ही लागू होता है। लेकिन देखा यह जाता है कि हर इस्लामी मुल्क अपने हिसाब से शरीयत की व्याख्या करता है। शरीयत कानून में ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों के अधिकारों की पूरी जमानत मौजूद है और उनको पूरी सुरक्षा देने का प्रावधान है। मोहम्मद साहब ने अपने ज़माने के पहले इस्लामी राज्य में गैर-मुस्लिम समुदाय के आम लोगों के साथ जिस दयाशीलता, सहिष्णुता और सदव्यवहार की मिसालें छोड़ी हैं, उसका कोई सानी नहीं है। शरीयत कानून में सबसे पहली चीज अपने अकीदे, आस्था या धर्म को मानने की पूरी आजादी है। मोहम्मद साहब ने कभी भी अकीदा, धर्म और आस्था बदलने के लिए किसी पर दबाव नहीं बनाया। उनके पास आने-जाने वाले, उनके आस-पास रहने वाले और उनके साथ लेन-देन के मामले करने वाले बहुत से लोग ऐसे थे जो आप को पैगंबर या अल्लाह का रसूल नहीं मानते थे। वे लोग अपनी पिछली आस्थाओं पर कायम थे लेकिन मोहम्मद साहब ने उनके साथ न तो संबंध तोड़े, न उनका सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार किया और न उनसे व्यापार या लेन-देन करने से मुसलमानों को रोका।
हां, यह भी सत्य है कि मोहम्मद साहब के दौर में भी जंगें हुई हैं लेकिन उसके भी अपने कारण थे। इस्लामी समाज और राज्य को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने वालों, साजिशें करने वालों और खुले या छिपे जंग करने वालों से मोहम्मद साहब ने मुकाबला किया है। लेकिन मोहम्मद साहब ने उन पर नियंत्रण पाने के लिए जितना आवश्यक होता था, उतना ही बल प्रयोग किया और किसी पर जुल्म होने नहीं दिया। उन्हीं पैगंबर साहब की सुन्नतों और शरीयत कानून में गैर-मुस्लिमों के नागरिक अधिकार, मुसलमानों के नागरिक अधिकारों के बराबर हैं, उनसे कम नहीं है। ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों के जीवन की आवश्यकताएं पूरी करना शरीयत कानून लागू करने वाली सरकार के लिए उतना ही जरूरी है जितना मुस्लिम नागरिकों की आवश्यकताओं को पूरा करना। क्या आज मोहम्मद साहब की उस सीख का कोई पालन करना चाहता है? आज तो जिहाद के नाम पर गैर-मुस्लिम तो छोड़िए मुसलमानों का भी कत्ल-ए-आम करने से जिहादी पीछे नहीं हटते। मस्जिदों में घुसकर नमाजियों का कत्ल करना किस जिहाद में आता है? यह तो इन जिहादियों के आका ही बता सकते हैं। जिहाद के नाम पर मुस्लिम-गैर-मुस्लिम का भेद किए बिना मासूमों का कत्ल करने वाले क्या मुसलमान कहलाने के भी हकदार हो सकते हैं? क्या वे उसी नबी के उम्मती हैं जिसने सभी को एक जैसा इंसान माना?
शरीयत कानून को अपने मुल्क में लागू करना इस्लामी मुल्कों के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन गैर-मुस्लिम देशों में इस्लामी शरीयत लागू करना या लागू करवाना किसी भी मुस्लिम देश या इस्लामी सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। ऐसे में खुद को जिहाद में शामिल बताने वाले जिहादी आखिर किस बुनियाद पर दूसरे मुल्कों में जाकर रक्तपात करते हैं? आइसिस, हिज्बुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे इस्लाम नामधारी आतंकी संगठन कैसे बेकसूरों का खून बहाकर इस्लाम की नुमाइंदगी कर सकते हैं? असल इस्लाम तो शांति की बात करता है लेकिन मुसलमानों ने इसे हिंसक रूप दे दिया है। ‘दार-उल-इस्लाम’ और ‘दार-उल-हरब’ के खेल में मुसलमानों को उलझाकर रखने की कोशिश हमारे देश में भी चलती रही है। हालांकि पवित्र कुरआन में इस प्रकार की कोई संकल्पना मौजूद नहीं है। आरंभिक कट्टरपंथी इस्लामी न्यायविदों ने विश्व को दार-उल-इस्लाम और दार-उल-हरब जैसे रूप में बांटा है। इस कोरी स्वयंभू संकल्पना के अनुसार ‘इस्लाम का घर’ यानि दार-उल-इस्लाम ऐसे तमाम मुस्लिम बहुल इलाकों को कहा जाता है जहां इस्लाम का शासन चलता है। सभी इस्लामिक देश इस परिभाषा के तहत आते हैं। ‘युद्ध भूमि’ यानि दार-उल-हरब ऐसे देश अथवा ऐसे स्थान को कहा जाता है, जहां शरीयत कानून नहीं चलता। जहां अन्य आस्थाओं वाले अथवा अल्लाह को नहीं मानने वाले लोगों का बहुमत हो। सरल भाषा में कहें तो गैर-इस्लामिक देश।
लेकिन हिंदुस्थान के मुसलमानों ने इस संकल्पना को अस्वीकार किया है। दार-उल-उलूम देवबंद का ऐतिहासिक फतवा है कि ‘हिंदुस्थान को दार-उल-इस्लाम या दार-उल-हरब बताने की बात गलत है, बल्कि हिंदुस्थान दुनिया का सबसे ज्यादा मुस्लिमों वाला वतन है और यह सच्चे मायने में दार-उल-अमन है। यानि यह मुल्क इस्लाम का दोस्त है, यहां जिहाद की बात बेमानी है और मुजाहिदीन बनने की बात गैर-इस्लामिक।’ फतवे के मुताबिक हिंदुस्थान में मुसलमान अमन के साथ रह सकते हैं। इस्लाम को हिंदुस्थान में कोई दिक्कत नहीं है। एक फतवे में यह भी साफ किया गया है कि हिंदू काफिर नहीं हैं, क्योंकि उनमें दुनिया बनाने वाले के प्रति आस्था है। फतवे में मुसलमानों के लिए हिंदुओं को अपना भाई-बहन मानने की सीख है। फतवे में इस्लामी सहिष्णुता की झलक है जिसे देखने की पहले कट्टर मुसलमानों को जरूरत है। कुल मिलाकर इस्लाम को किसी और ने नहीं मुसलमानों ने ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जरूरत है हिंदू-मुसलमानों के बीच जमी उस गांठ को ढीला करने की कोशिशें तेज करने की, जो हिंदू-मुसलमान होने की वजह से उनमें अलग होने का एहसास भरती रही हैं। मुसलमान सिर्फ इतना भी कर ले तो काफी होगा कि वह अपने दीन की बातों का गहराई से अध्ययन कर ले। सबकुछ आईने की तरह साफ नजर आएगा और उसे किसी पसोपेश में मुब्तिला होने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।