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कनेक्टिविटी का संकट!, कैसे सफल होगा वन नेशन, वन राशन कार्ड?

एक तरफ सरकार भारत को डिजिटाइजेशन के मामले में दुनिया का अग्रणी देश बता रही है तो दूसरी तरफ सरकार के केंद्रीय उपभोक्ता मामले और खाद्य मंत्री राम विलास पासवान सरकार की महत्वाकांक्षी योजना `वन नेशन वन राशन कार्ड’ की राह में खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी को सबसे बड़ी बाधा बता रहे हैं। उल्लेखनीय है कि इस योजना को मार्च २०२१ तक देशभर में लागू किया जाना है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत वन नेशन वन राशन कार्ड योजना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। अभी तक इस योजना से २० राज्य जुड़ चुके हैं और एक अगस्त तक ३ और राज्य जुड़नेवाले हैं। हालांकि पहाड़ी राज्यों के साथ-साथ कुछ मैदानी इलाकों वाले राज्य भी खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी की वजह से इस योजना को अपने यहां लागू करने में असमर्थता जता रहे हैं।
गौरतलब है कि इस योजना के तहत किसी भी राज्य का उपभोक्ता देश के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में अपने हिस्से का अनाज सरकारी राशन दुकान से ले सकता है, लेकिन इस सुविधा का लाभ लेने के लिए उपभोक्ताओं को बायोमीट्रिक आधारित पॉइंट ऑफ सेल मशीन में अंगूठे के जरिए अपनी पहचान बतानी होती है। इस प्रक्रिया का अनुपालन करके कोई भी उपभोक्ता अपनी पात्रता के अनुसार देश के किसी भी राज्य या केंदशासित प्रदेश में सरकारी राशन दुकान से राशन ले सकता है। बायोमीट्रिक आधारित पॉइंट ऑफ सेल मशीन का संचालन इंटरनेट के जरिए किया जाता है, इसलिए इस योजना का लाभ लेने के लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी का होना जरूरी है।
आज देश में इंटरनेट कनेक्टिविटी के अलावा दूसरों कारणों से भी लोग इंटरनेट का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। स्मार्टफोन की कमी, देश के दूर-दराज इलाकों में मोबाइल टॉवर का नहीं होना, देश में ब्रांडबैंड की सीमित उपलब्धता आदि ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से मौजूदा समय में भी देश में शत-प्रतिशत डिजिटलाइजेशन सपना बना हुआ है।
अंतर्राष्ट्रीय संस्था मैरी मीकर ने इंटरनेट के इस्तेमाल पर २०१९ में एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके अनुसार भारत में चीन के बाद सबसे अधिक इंटरनेट का इस्तेमाल किया जाता है। अमेरिका मामले में तीसरे स्थान पर है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर में लगभग ३.८ अरब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। अप्रैल २०२० के आंकड़ों के अनुसार चीन में ८५ करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या लगभग ३० करोड़ है। ऑनलाइन बाजार का इस्तेमाल करने के मामले में भी भारत का स्थान दूसरा है। पहले स्थान पर चीन काबिज है। यह स्थिति तब है, जब भारत में इंटरनेट की पहुंच लगभग ४० प्रतिशत आबादी के बीच है। चीन में इंटरनेट की पहुंच ६१ प्रतिशत आबादी के बीच है, जबकि अमेरिका में यह ८८ प्रतिशत आबादी के बीच है। भारत के महानगरों में भी इंटरनेट की पहुंच ६५ प्रतिशत आबादी के बीच है, जबकि इंटरनेट के सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या कुल आबादी का लगभग ३३ प्रतिशत ही है। सक्रिय इंटरनेट उपभोक्ता उसे कहते हैं, जो एक महीने में कम से कम एक बार इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं।
आज दुनिया में इंटरनेट के कुल उपभोक्ताओं में भारत की हिस्सेदारी १२ प्रतिशत है, जिसका एक बड़ा कारण रिलायंस जियो द्वारा उपभोक्ताओं को पहले मुफ्त और बाद में सस्ती दर पर मोबाइल डेटा उपलब्ध कराना है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया एंड नीलसन द्वारा नवंबर २०१९ में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्र में लगभग २३ करोड़ इंटरनेट के सक्रिय उपभोक्ता थे, जबकि शहरों में इंटरनेट के सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या २१ करोड़ है। इस प्रकार, इंटरनेट के सक्रिय शहरी उपभोक्ताओं की तुलना में ग्रामीण लोग इंटरनेट का १० प्रतिशत अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं।
देखा जाए तो भारत की कुल आबादी के मुकाबले इंटरनेट का उपयोग करनेवाले लोगों की संख्या बहुत कम है, लेकिन विगत ५ वर्षों से इस संख्या में तेजी आ रही है, जिसका कारण चीन की मोबाइल कंपनियों द्वारा कम कीमत पर भारत में स्मार्ट मोबाइल हैंडसेट बेचना है। फिर भी, गरीबी और निरक्षरता की वजह से भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करनेवालों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है। दिसंबर २०१९ के अंत तक भारत में लगभग ५० करोड़ लोगों के पास स्मार्टफोन था लेकिन इनमें से कुछ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कभी-कभार या कभी भी नहीं कर रहे थे।
इधर, कोरोना वायरस की वजह से भारत में लोगों की इंटरनेट पर निर्भरता अभूतपूर्व ढंग से बढ़ी है। खासतौर पर ब्रॉडबैंड और वाई-फाई की। लॉकडाउन की वजह से लोगों को अपने घर में रहना पड़ रहा है। कंपनियों ने कर्मचारियों से घर से काम यानी वर्क फ्रॉम होम करने को कहा है। इसके अलावा लोग सिनेमा, बेवसीरीज, गेम खेलने आदि के लिए भी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। देशभर में बच्चों की ऑनलाइन क्लास चल रही है। बच्चे सप्ताह में ५ दिन ५ से ६ घंटे इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन खराब इंटरनेट कनेक्टविटी की वजह से लोगों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरे कारणों से भी लोगों को इंटरनेट इस्तेमाल करने में मुश्किलें आ रही हैं। उदाहरण के तौर पर अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ इलाकों में मोबाइल टॉवर और ब्रॉडबैंड सेवा उपलब्ध नहीं है। मोबाइल कंपनियां या टेलीकॉम कंपनियां ४ जी सेवा देने के दावे जरूर कर रही हैं, लेकिन वास्तविकता में ये आज भी लोगों को २जी की रद्दी स्पीड मुहैया करा रही हैं। इसके बावजूद कोरोना काल में ऑनलाइन क्लास की मदद से शैक्षिक सत्र को पूरा करने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन देश में इंटरनेट की पहुंच बहुत कम लोगों के बीच है। इतना ही नहीं, भारत में ५ से ११ साल के लगभग ७ करोड़ बच्चे अपने माता-पिता के स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैब या डेस्कटॉप का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन माता-पिता के कामकाजी होने पर उनके लिए ऑनलाइन क्लास करना मुमकिन नहीं होता है। इन कारणों से कोरोना काल में औसतन देश में ४० से ५० प्रतिशत बच्चे ही ऑनलाइन क्लास कर रहे हैं।
कहा जा सकता है कि सवाल सिर्फ `वन नेशन वन राशन कार्ड’ योजना को लागू करने की नहीं है, बल्कि सवाल कोरोना काल में ऑनलाइन क्लास करने, वर्क प्रâॉम होम करने, ग्रामीण एवं दूर-दराज के इलाकों में बैंकिंग सुविधाओं को मुहैया कराने, अस्तपतालों में ऑपरेशन से लेकर कई अनुसंधान से जुड़े कार्यों को अमलीजामा पहनाने से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि इन कार्यों को बिना अच्छी स्पीड वाली कनेक्टविटी के नहीं किया जा सकता है। इसलिए सरकार को दावा करने की जगह, जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए मामले से जुड़ी कठिनाइयों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।