कन्नड़ी लहर!

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी बहुमत की सीमा रेखा के पास जाकर रुक गई। विधानसभा की २२४ सीटों में से १०४ सीटों पर उसे विजय प्राप्त हुई। कांग्रेस का घोड़ा ७८ सीटों पर रुक गया। देवेगौड़ा की जनता दल ३७ स्थानों पर विजयी रही। कुछ निर्दलियों को छोड़कर दूसरे लोगों को ज्यादा सीटें नहीं मिल पार्इं। महाराष्ट्र एकीकरण समिति का भी सीमा क्षेत्रों में पराभव हुआ। वहां के मराठी बंधू मानो खुद ही यह पराभव ले आए। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तस्वीर साफ हो चुकी है। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी ही आएगी, ऐसा विश्वासपूर्वक कोई नहीं कह सकता। गोवा, मणिपुर, मेघालय और नागालैंड जैसे राज्यों में बहुमत न होते हुए भी वहां के राज्यपालों ने भाजपा सरकार को ही सत्ता स्थापना का निमंत्रण दिया था। उसके अनुसार कर्नाटक में पार्टी का दावा मजबूत है। नतीजे चाहे जो हों हमारी ही पार्टी किंगमेकर की भूमिका में रहेगी, ऐसा श्री देवेगौड़ा और उनके चिरंजीव कुमार स्वामी कल तक कह रहे थे लेकिन मतदाताओं ने अब ‘किंगमेकर’ से बड़ी भूमिका निभाई। कर्नाटक की विजय के पश्चात भाजपा ने १६वां राज्य अपनी जेब में डाल लिया है और फिर से कहा गया कि यह मोदी लहर है। यह लहर मोदी की नहीं बल्कि कन्नड़ जनता की है। वहां की वर्तमान राजनीतिक अनिश्चितता को देखते हुए यह कहना कि भाजपा ने १६वां राज्य अपनी जेब में डाल लिया है जल्दबाजी होगी। उनमें से १५ राज्यों में उनकी अकेले की सत्ता है। मतलब भाजपा विजय के आयुवर्ग में प्रवेश कर चुकी है इसलिए प्रसिद्ध गाने की तर्ज पर सोलहवां वर्ष धोखे का न साबित हो। कर्नाटक में कांग्रेस हार गई इसका मतलब मोदी या उनकी पार्टी की लहर थी, ऐसा मानने को हम तैयार नहीं। मोदी जब राष्ट्रीय राजनीति में नहीं थे, तब भी भाजपा ने कर्नाटक में विजय प्राप्त की थी और पूरे राज्य में उनका बहुमत था। अस्ताचल विधानसभा में भाजपा के ४० विधायक थे। अब उनके लगभग ६० विधायक और बढ़ गए हैं तथा कांग्रेस की सीटें कम हुई हैं। किसी भी सरकार के खिलाफ वातावरण बनता रहता है। आखिरी दौर में कांग्रेस ने जो धर्म की राजनीति की उससे उसे झटका लगा। जब चुनाव सिर पर था उस दौरान कांग्रेस ने अलग लिंगायत धर्म की राजनीति की। उसने हिंदुओं और लिंगायत समाज को अलग कर अपना गणित बिठाने का प्रयास किया जो कि नाकाम साबित हुआ। लिंगायत समाज की बहुलतावाले क्षेत्रों में भाजपा को बड़ी सफलता मिली। लिंगायत समाज ने ही कांग्रेस की राजनीति की धज्जियां उड़ा दीं। हालांकि यह खेल सिद्धरमैया ने खेला था और उन्होंने यह जुआ खुद ही खेला। सिद्धरमैया को उनका अति आत्मविश्वास ले डूबा। उन्होंने मेहनत की लेकिन उनके प्रचार की दिशा गलत रही। इससे कांग्रेस के अनुकूल माहौल होने के बावजूद लोगों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। हालांकि कम सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस के वोटों का प्रतिशत घटा नहीं और भाजपा को बड़ी जीत मिलने के बावजूद उनका मत प्रतिशत बढ़ा नहीं। ये सब कुछ मोदी लहर के लक्षण नहीं हैं। भाजपा ने भले ही जीत प्राप्त की हो लेकिन विधानसभा त्रिशंकु ही है। कांग्रेस और देवेगौड़ा का जनता दल एक होकर भाजपा की पकी हुई खिचड़ी का स्वाद बिगाड़ सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी को बड़ी विजय मिली, ये बात स्वीकार्य है लेकिन फिलहाल उनके लिए सत्ता की ‘हंडी’ लटकी हुई ही है। इस पर कांग्रेस ने देवेगौड़ा की पार्टी को सत्ता स्थापन एवं मुख्यमंत्री पद का ऑफर देकर इस ‘हंडी’ को और ऊपर कर दिया है। कांग्रेस और देवेगौड़ा की पार्टी ने राज्यपाल से मुलाकात की है। भाजपा के येदियुरप्पा ने भी राज्यपाल से मुलाकात की है। फिलहाल कर्नाटक की सत्ता नीति पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हो सकता है १०४ के आंकड़े के बावजूद भाजपा बाहर हो जाए और ३७ सीटोंवाला व्यक्ति मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो जाए। यह सब तुम्हारा बिना भरोसे का लोकतंत्र होने के कारण कुछ अलग भी घट गया तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।