" /> कभी-कभी : तेरे सुर और मेरे गीत…!

कभी-कभी : तेरे सुर और मेरे गीत…!

अगर किसी से कोई वादा करके उसे पूरा न किया जाए तो अच्छा नहीं लगता। सामनेवाले का दिल टूट जाता है और उस इंसान की नाराजगी भी जायज है। ऐसा ही एक वाकया हमारी फिल्म इंडस्ट्री में भी घटित हुआ। प्रोड्यूसर ने अपनी फिल्म में शहनाई वादक से शहनाई तो बजवा ली लेकिन अपने वादे के मुताबिक उस शहनाई वादक का नाम स्क्रीन पर सोलो न देकर चार अन्य आर्टिस्टों के साथ दे दिया।
बात १९५९ की है। विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ रिलीज हो चुकी थी। फिल्म हिट हो चुकी थी और फिल्म के गाने ‘तेरे सुर और मेरे गीत…’, ‘जीवन में पिया तेरा साथ रहे…’, ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया…’, ‘तेरी शहनाई बोले…’ गली-गली और घर-घर में गूंज रहे थे। उस दौर में फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर एक करोड़ अस्सी लाख की कमाई कर ली थी। फिल्म की यूनिट के साथ ही पूरी फिल्म इंडस्ट्री इस फिल्म के हिट होने से खुश थी। अगर कोई खुश नहीं था तो सिर्फ एक शख्स, जो इस फिल्म का अहम हिस्सा थे। निराशा, हताशा और क्रोध में डूबे उस व्यक्ति का नाम था रामलाल। वो रामलाल जिनकी शहनाई से फिल्म संगीत कूक उठता था, सुर बोल पड़ते थे। वसंत देसाई, शिवराम, नौशाद, एस.डी. बर्मन, आर.सी. बोराल, सी. रामचंद्र और गुलाम हैदर जैसे तमाम संगीतकारों के गानों में अपनी शहनाई का जौहर दिखानेवाले रामलाल की शहनाई की गूंज हर संगीतकार चाहता था। खैर, रामलाल की नाराजगी की वजह ये थी कि फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ में मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने भी शहनाई बजाई थी। विजय भट्ट ने इस बात की खूब पब्लिसिटी करवाई कि पहली बार किसी फिल्म में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई बजाई है, जबकि बिस्मिल्लाह खान से ज्यादा फिल्म में रामलाल की शहनाई का इस्तेमाल किया गया था। खैर, जब स्क्रीन पर क्रेडिट देने की बारी आई तो विजय भट्ट बदल गए। विजय भट्ट ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम सोलो कार्ड पर दे दिया और रामलाल का नाम छोटा करके चार असिस्टेंटों के बीच लिख दिया। जबकि उन्होंने रामलाल से वादा किया था कि फिल्म की स्क्रीन पर एक अलग से सोलो टाइटल आएगा, जिस पर लिखा होगा- बैकग्राउंड म्यूजिक, बैकग्राउंड सॉन्ग, बैकग्राउंड शहनाई और सॉन्ग शहनाई प्लेड बाय रामलाल और सोलो शहनाई प्लेड बाय उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ये दूसरा टाइटल होगा। अपने साथ हुई इस तरह की नाइंसाफी और विजय भट्ट के अपने किए गए वादे से मुकरने के बाद रामलाल इतने खफा हुए कि उन्होंने ३५ वर्षों तक अपनी ये सुपरहिट फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ नहीं देखी।
रामलाल ने भले ही अपनी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ गुस्से में आकर न देखी हो लेकिन ‘गूंज उठी शहनाई’ में रामलाल द्वारा बजाई गई शहनाई को सुनकर वी. शांताराम ने अपनी फिल्म ‘सेहरा’ के लिए बतौर संगीतकार उन्हें अनुबंधित कर लिया। फिल्म के गीतों ‘पंख होते तो उड़ आती रे…’, ‘तुम तो प्यार हो सजना मुझे तुमसे प्यारा और न कोई…’, ‘तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाएं…’ जैसे एक से बढ़कर एक गीतों ने इतिहास रच दिया। खास बात ये है कि रामलाल ने इन गीतों की धुन पहले ही तैयार कर ली और गीतकार ने धुन सुनकर गीतों के बोल लिखे। अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखनेवाले रामलाल को वो स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। कई फिल्मों को अपने संगीत और कई गीतों और फिल्मों के बैकग्राउंड म्यूजिक को अपनी शहनाई के सुरों से सजानेवाले रामलाल के लिए बरबस ही मुंह से निकलता है- ‘आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं…!’

यू.एस. मिश्रा