कभी-कभी

‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं, तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन जिंदगी तो नहीं…’ गुलजार द्वारा लिखा गया फिल्म ‘आंधी’ का ये गीत फिल्म अभिनेता संजीव कुमार की अधूरी चाहत को बखूबी बयान करता है। प्यार एक ऐसी चाहत है, जिसकी दरकार हर इंसान को होती है लेकिन हर चाहत को मंजिल मिले ये जरूरी तो नहीं।
९ जुलाई, १९३७ को सूरत में जन्में हरीभाई जरीवाला उर्फ संजीव कुमार ने बचपन में ही ठान लिया था कि बड़े होकर वे फिल्मों में हीरो बनेंगे। १९६० में आई फिल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ में एक छोटा-सा किरदार निभानेवाले संजीव कुमार बाद में स्टेज से जुड़ गए और नाटकों में काम करने लगे। १९६५ में आई फिल्म ‘निशान’ में उन्होंने हीरो का किरदार निभाया। ‘निशान’ के बाद प्रदर्शित उनकी अन्य दूसरी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाल न दिखा सकीं। १९६८ में आई फिल्म ‘संघर्ष’ में दिलीप कुमार के अपोजिट काम करके उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई लेकिन १९७० में रिलीज हुई फिल्म ‘खिलौना’ की कामयाबी ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया। इसके बाद संजीव कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसी साल प्रदर्शित हुई फिल्म ‘दस्तक’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कर मिला। फिल्म ‘कोशिश’ में गूंगे का किरदार निभाकर दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार जीतनेवाले संजीव कुमार एक ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने हर तरह की भूमिका निभाई। जवानी में बूढ़े का किरदार निभाने को लेकर संजीव का कहना था कि ‘किसी ने उनका हाथ देखकर कहा था कि उनकी उम्र ज्यादा लंबी नहीं है। बूढ़ा होना मेरे नसीब में ही नहीं है इसलिए फिल्मों में बूढ़ा बनकर मैं बूढ़ा होने का अरमान पूरा कर रहा हूं।’ ‘शोले’, ‘मौसम’, ‘सीता और गीता’, ‘मनचली’, ‘सिलसिला’, ‘राजा और रंक’, ‘आंधी’ जैसी एक से बढ़कर एक फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरनेवाले संजीव कुमार की जिंदगी में एक खालीपन था, जो आखिरी समय तक नहीं भरा।
ऐसा नहीं था कि संजीव कुमार को किसी से प्यार नहीं हुआ। १९६९ में फिल्म ‘देवी’ के सेट पर संजीव कुमार को गुस्से में तमतमाकर तमाचा जड़नेवाली नूतन से भले ही उन्होंने अपने प्यार की अफवाह एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू के जरिए उड़ाई थी लेकिन सच्चाई ये थी कि वे नूतन की बजाय ‘ड्रीमगर्ल’ हेमा मालिनी को दिल से चाहते थे मगर हेमा अपना दिल धर्मेंद्र को दे चुकी थीं। हेमा द्वारा उनके प्यार को ठुकराकर धर्मेंद्र से शादी करने के बाद संजीव का दिल ऐसा टूटा कि उन्होंने सारी जिंदगी अकेले गुजार दी। संजीव कुमार भले ही हेमा के प्यार में पागल थे लेकिन गायिका-अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित, संजीव के प्यार में पागल थीं। उन्होंने बाकायदा संजीव को प्रपोज भी किया लेकिन संजीव के शादी से इंकार करने पर सुलक्षणा ने किसी और से शादी नहीं की। एक बार संजीव ने अपने मित्र गुलजार से बातों-ही-बातों में कहा था कि उनके घर के मर्दों की उम्र ५० से ज्यादा नहीं रही है इसलिए शादी कर वे किसी की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहते। उनकी ये बात सच भी थी क्योंकि उनके पिता की ५० और उनके भाई की मृत्यु ४८ वर्ष की उम्र में हो चुकी थी। उनका हाथ देखकर उनकी छोटी उम्र की भविष्यवाणी करनेवाले की बात ६ नवंबर, १९८५ को दूसरी बार आए हार्टअटैक ने सच साबित कर दी। ४७ वर्ष की छोटी उम्र में संजीव कुमार अपने मन में अधूरी चाह लिए इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गए।