कभी सुख-दुख का  साथी था डाकिया

सूचना क्रांति एवं इंटरनेट के युग में अब सैकड़ों किलोमिटर दूर रहनेवाले किसी अपने का हाल जानने की लिए चिठ्ठियों के इंतजार की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मोबाइल संस्कृति में लोगों के बीचे फासले खत्म हो गए हैं। स्मार्ट फोन के जरिए हम अपने किसी अपने से न सिर्फ बात कर सकते हैं बल्कि प्रत्यक्षरूप से उन्हें देख भी सकते हैं लेकिन डॉक की प्रसंगिकता आज भी पूरी तरह खथ्म नहीं हुई है। ‘सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान।’ निदा फाजली रचित यह शेर गुजरे जमाने में डाक विभाग के महत्व को इंगित करता है। फाजली जी ने जब ये शेर लिखा था उस वक्त देश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक लोगों के संदेश पहुंचाने का डाक विभाग ही एकमात्र साधन था। डाकिये के थैले में से निकलने वाली चिट्ठी किसी को खुशी का समाचार देती थी तो किसी को गम का। लोग तय वक्त पर बेसब्री से डाकिए का इंतजार किया करते थे। एक तरह से डाकिया लोगों के सुख-दुख का साथी हुआ करता था। डाक विभाग के इसी महत्व से लोगों को अवगत कराने के लिए ९ अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसको मनाने का मुख्य ऊद्देश्य है ग्राहकों को डाक विभाग के बारे में जानकारी देना, उन्हें जागरूक करना और डाकघरों के बीच सामंजस्य को स्थापित करना होता है। इस दिवस को स्विट्जरलैंड के बर्न में १८७४ ईस्वी में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) की स्थापना की याद में मनाया जाता है। गौरतलब हो कि १ जुलाई, १८७६ में हिंदुस्थान यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना था। इस सदस्यता को लेने वाला हिंदुस्थान, एशिया का पहला देश है। १ अक्टूबर, १८५४ में हिंदुस्थान सरकार ने डाक के लिए एक विभाग की स्थापना की थी। पहले डाक विभाग हमारे जनजीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता था। गांव में जब डाकिया डाक का थैला लेकर आता था तो बच्चे-बूढ़े सभी उसके साथ डाक घर की तरफ इस उत्सुकता से चल पड़ते थे कि उनके भी किसी परिजन की चिट्ठी आ जाए। डाकिया जब नाम लेकर एक-एक चिट्ठी बांटना शुरू करता तो सभी लोग अपनी या अपने पड़ौसी की चिट्ठी ले लेते व उसके घर जाकर उस चिट्ठी को बड़े चाव से सम्भलवाते थे। उस वक्त शिक्षा का प्रसार ना होने से अक्सर महिलाएं अनपढ़ होती थी। इसलिये चिट्ठी लाने वालो से ही चिट्ठियां पढ़वाती भी थी और लिखवाती भी थी। कई बार चिट्ठी पढ़ने लिखनेवाले बच्चों को ईनामस्वरूप कुछ पैसा या खाने को गुड़, पताशे भी मिल जाया करते थे। इसी लालच में बच्चे ज्यादा से ज्यादा चिट्ठियां पहुंचाने का प्रयास करते थे। उस वक्त गांवो में बैक शाखा भी नहीं होती थी। इस कारण बाहर कमाने गए लोग अपने घर पैसा भी डाक में मनीआर्डर के द्वारा ही भेजते थे। मनीआर्डर देने डाकिया स्वयं प्राप्तकर्ता के घर जाता था व भुगतान के वक्त एक गवाह के भी हस्ताक्षर करवाता था। इसी तरह रजिस्टर्ड पत्र देते वक्त भी प्राप्तकर्ता के हस्ताक्षर कराए जाते थे। डाक विभाग अतिआवश्यक संदेश को तार के माध्यम से भेजता था। मगर आज नजारा पूरी तरह से बदल चुका है। इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने डाक विभाग के महत्व को बहुत कम कर दिया है। आज लोगों ने हाथ से चिट्ठियां लिखना छोड़ दिया है। अब ई-मेल, वाट्सएप के माध्यमों से मिनटो में लोगो में संदेशों का आदान प्रदान होने लगा है। आज डाक में लोगों की चिट्ठियां तो गिनती की ही आती है। मनीआर्डर भी बंद ही हो गए हैं। मगर डाक से अन्य सरकारी विभागों से संबंधित कागजात, बैंको व अन्य संस्थानो के प्रपत्र काफी संख्या में आने से डाक विभाग की प्रासंगिकता पूरी दुनिया में आज भी बरकरार है। वर्तमान में डाक विभाग का एकाधिकार लगभग खत्म हो गया है। यही कारण है कि डाक विभाग दुनिया भर में अब कई नई तकनीकी सेवाओं से जुड़ रहा है। दुनियाभर में इस समय ५५ से भी ज्यादा विभिन्न प्रकार की पोस्टल ई-सेवाएं उपलब्ध हैं। भविष्य में पोस्टल ई-सेवाओं की संख्या और अधिक बढ़ाई जाने की तैयारी है। भारतीय डाक विभाग पिनकोड नंबर (पोस्टल इंडेक्स नंबर) के आधार पर देश में डाक वितरण का कार्य करता है। पिनकोड नंबर का प्रारम्भ १५ अगस्त १९७२ को किया गया था। डाक विभाग के महत्व को बरकरार रखने के लिए केंद्र सरकार ने इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) शुरू किया है। देश के हर व्यक्ति के पास बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने के क्रम में यह एक बड़ा विकल्प होगा। इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक ने देश में ६५० शाखाओं व देश भर में ३,२५० एक्सेस प्वाइंट में बैंकिंग सेवाएं शुरू कर दी है। आनेवाले दिनों में ये सेवा देश के १.५५ लाख एक्सेस प्वाइंट पर शुरू हो जाएगी। इससे देश का सबसे बड़ा बैंकिंग नेटवर्क अस्तित्व में आएगा जिसकी गांवों के स्तर तक मौजूदगी होगी।
यही नहीं इन सेवाओं के लिए पोस्ट विभाग के ११००० कर्मचारी घर-घर जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देंगे।