कर्नाटक का कशीदा!

उपचुनाव के नतीजों में भाजपा के पराभव की शृंखला पिछले पन्ने से अगले पन्ने तक जारी है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के उपचुनाव में जो हुआ वही अब कर्नाटक में हुआ है। कर्नाटक में लोकसभा की तीन सीटों और विधानसभा की दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव का नतीजा घोषित हुआ है। इन पांच सीटों में से सिर्फ एक सीट बड़ी मुश्किल से भाजपा ने जीती है। शेष चारों सीटों पर कांग्रेस तथा जेडीएस के उम्मीदवार भारी बहुमत से विजयी हुए हैं। मतों का विभाजन ही भाजपा की जीत का मूल आधार है और यह नहीं होने देना है इस बात को भाजपा विरोधी दलों ने बखूबी समझ लिया है। इसीलिए उत्तर प्रदेश में जिस तरह सपा और बसपा ने एक होकर उपचुनाव में भाजपा को चित किया था, उसी तरह का प्रयोग अब कर्नाटक में भी कांग्रेस तथा जेडीएस ने सफल कर दिखाया है। २०१९ का लोकसभा चुनाव जब करीब है तब कर्नाटक में भाजपा को जिस तरह हार का सामना करना पड़ा है, वह उसके लिए धक्कादायक ही है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ये नतीजा बेजान पड़ी कांग्रेस में प्राण फूंकनेवाला है। भाजपा का गढ़ समझे जानेवाले बेल्लारी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के उम्मीदवार वी.एस. उगरप्पा ने २ लाख ४३ हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की है। भाजपा के मजबूत प्रत्याशी श्रीरामुलू की बहन जे. शांता को यहां हार का सामना करना पड़ा है। बेल्लारी कर्नाटक भाजपा की नाक समझी जाती है। पिछले १४ वर्षों से यह सीट भाजपा के कब्जे में थी मगर यह नाक ही भाजपा के पास नहीं रही। मंड्या लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में तो भाजपा की बेल्लारी से भी अधिक दुर्दशा हुई है। यहां भाजपा ने सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी सिद्धरामैया को उम्मीदवारी दी थी। जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवार एल.आर. शिवरामी गौडा ने करीब सवा ३ लाख वोटों के अंतर से भाजपा को यहां पराजित किया है। कर्नाटक विधानसभा की दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव को भी कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने जीता है। भाजपा ने एकमात्र सीट जो हासिल की है, वह शिमोगा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र की है। यहां से पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के पुत्र बी.वाई. राघवेंद्र जीते हैं। मगर कांग्रेस-जेडीएस के उम्मीदवार जहां दो-तीन लाख से अधिक वोटों के अंतर से चुनकर आए हैं, वहां भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री के सुपुत्र सिर्फ ५२ हजार वोटों से जीतकर आए हैं। यह अंतर भी देखने लायक है। होनेवाले उपचुनाव में निरंतर मिलनेवाली हार का विश्लेषण, मंथन और चिंतन पराजित दल अपने तरीके से करेगा ही। मगर देश में इतनी सारी अच्छी बातें हो रही हैं और क्रांतिकारी परिवर्तन होने का दावा सत्ताधारी दल जब कर रहा है, उस समय उसकी इस तरह हार क्यों हो रही है? यह सवाल जनता के मन में उठ रहा है। चार वर्ष पूर्व उठनेवाली लहर को आज अचानक ऐसा क्या हो गया है? तोड़-फोड़ और जोड़-तोड़ में विशेष रूप से माहिर होनेवालों का गणित अब काम नहीं कर रहा है, ऐसा सवाल सत्ताधारी दल के समर्थकों के मन में उठ रहा होगा। २०१४ में मिला जनाधार अब कम-से-कम ५० वर्षों तक तो नहीं घटेगा, ऐसा सीना ठोंककर दम भरनेवालों के मन में भी चार वर्ष में ही आई गिरावट ने चिंता में डाल दिया है। २०१४ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने देश को कांग्रेस से मुक्त करने का नारा दिया था और देशवासियों के ‘अच्छे दिन’ आएंगे, ऐसा विश्वास दिलाया था। मगर कांग्रेस मुक्त हिंदुस्थान की घोषणा चार वर्ष में ही धूल-धूसरित हो गई है। देश की आम जनता ‘अच्छे दिन’ की खोज कर रही है तो उपचुनावों के नतीजे मात्र कांग्रेस के ही ‘अच्छे दिन’ वापस आएंगे, ऐसी तस्वीर दिखा रहे हैं। २०१४ के चुनाव में २८२ सीटों पर जीत हासिल कर भाजपा ने सभी को विस्मित कर दिया था। मगर उपचुनाव में मिलनेवाली निरंतर असफलता के कारण लोकसभा में भाजपा की संख्या १० सीटों से घटकर २७२ तक आ गई है। कर्नाटक के उपचुनाव के नतीजों को तो भाजपा के लिए खतरे की घंटी ही कहना पड़ेगा। राम मंदिर, जम्मू-कश्मीर की धारा-३७० को रद्द करना और समान नागरिक कानून जैसे मूल विषयों को बगल में रख, कुछ और ही एजेंडा लागू करने का ही यह परिणाम हो सकता है। कर्नाटक की कशीदाकारी की कला पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। साड़ियों सहित विभिन्न वस्त्रों पर होनेवाली कशीदाकारी ने लोगों को रिझाया है। वहीं कर्नाटकी कसीदा अब राजनीतिक पटल पर भी अवतरित हुआ है। २०१९ के नतीजों के बाद उपचुनाव के इसी ‘कर्नाटकी कशीदेकारी’ की छाप दिखाई देगी क्या?