कांग्रेस का मीना बाजार!

७३ वर्षीय सोनिया गांधी को फिर कांग्रेस की कमान संभालने के लिए आगे आना पड़ा। सोनिया गांधी बार-बार बीमार पड़ती हैं। इलाज के लिए उन्हें विदेश जाना पड़ता है। बीच-बीच में उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने की खबरें आती रहती हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस का नेतृत्व करने का बोझ उन्हें उठाना पड़ रहा है, ये अमानवीय है। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे को ७५ दिन बीत चुके हैं। कांग्रेस की नीति के अनुसार नए अध्यक्ष को चुना जाए, ऐसा राहुल गांधी का कहना था। अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर का हो, ऐसा भी उन्होंने कहा था। गांधी परिवार की बैसाखी त्यागें व पार्टी अपने दम पर खड़ी हो, ऐसा राहुल गांधी ने कहा। पार्टी द्वारा मान-मनौव्वल किए जाने के बाद भी वे पीछे नहीं हटे यह महत्वपूर्ण है। कुछ लोगों द्वारा प्रियंका गांधी का नाम आगे लाते ही राहुल गांधी ने उन्हें फटकार लगाई। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता रहा है और इसके लिए गांधी परिवार को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसमें से राहुल गांधी ने यह निर्णय लिया और उनके निर्णय का सम्मान होना जरूरी था। लेकिन ७५ दिनों के बाद कांग्रेस को गांधी परिवार के बाहर का अध्यक्ष नहीं मिला व ७३ वर्षीय सोनिया गांधी फिर पार्टी की कार्यकारी अध्यक्षा बन गई हैं। वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व की पहली पंक्ति अस्तित्व में नहीं है। मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खरगे, ए.के. एंटनी ये ‘सिर्फ’ टूटी हुई पंक्तियां हैं। महाराष्ट्र के सुशील कुमार शिंदे भी उसी पंक्ति के हैं। इस पंक्ति के सहारे कांग्रेस पार्टी का आगे बढ़ना संभव नहीं है। तब भी पार्टी अध्यक्ष पद का झमेला ७५ दिनों तक जारी रहा। अब भी पार्टी अध्यक्ष के लिए जिन नामों पर चर्चा हुई, ऐसा कहते हैं कि वे नाम मतलब ‘बीमारी की अपेक्षा दवा भयंकर’ ऐसा कहना पड़ेगा। युवाओं के हाथ कांग्रेस की कमान सौंपी जाए ये विचार अच्छा ही था। लेकिन कांग्रेस पार्टी में युवाओं की भर्ती पिछले २५ वर्षों से बंद हो गई है। सिर्फ उम्र से युवा होना नहीं चलता, बल्कि उन नेताओं में युवाओं को आकर्षित करने की क्षमता भी होनी चाहिए। ८४ साल की उम्र के बाद भी शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे युवाओं के नेता थे। मोदी ६५ साल की उम्र पूरा कर चुके हैं, फिर भी देश का नवयुवक उनके नेतृत्व की तरफ आकर्षित हुआ है। सुप्रिया सुले की तुलना में आज भी शरद पवार के इर्द-गिर्द युवाओं का घेरा है तथा अखिलेश यादव की तरफ युवाओं ने पीठ फेर ली है। आज भी युवा वर्ग मुलायम सिंह यादव का सम्मान करता है। लालू यादव के परिवार के दो युवा लड़कों द्वारा राजद का बोरिया-बिस्तर समेटने की शुरुआत करने से बची पार्टी आज भी जेल में बंद लालू यादव की ओर अपेक्षा की दृष्टि से देख रही है। शिवसेना के पास आज भी युवाओं की फौज है ही और नए कार्यकर्ता तैयार करने की प्रक्रिया शुरू ही है। प्रश्न यही है कि कांग्रेस पार्टी में पिछले २५ सालों में नए कार्यकर्ता नहीं बने होंगे तो उसका जिम्मेदार कौन? नेहरू-गांधी का जयकारा लगानेवाला युवा वर्ग उस काल में था ही, लेकिन समय बदलने के बाद भी कांग्रेस को बदलाव करने की इच्छा नहीं हुई और गांधी परिवार के प्रति निष्ठा ही उनका दरबारी कार्यक्रम बन गया। महाराष्ट्र सहित देश के कई भागों में बाढ़ से हाहाकार मचा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, शिवसेना सहित कई राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता कीचड़ में उतरकर काम कर रहे हैं। किसी समय कांग्रेस ‘सेवादल’ के युवक मदद कार्यों के लिए आगे जाते थे। आज ‘सेवा’ शब्द ही खत्म हो गया है और बचा सिर्फ ‘दल-दल’ है। कांग्रेस पार्टी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में दिया गया योगदान निश्चित ही महत्वपूर्ण है। लेकिन तब कांग्रेस पार्टी सत्ता में नहीं थी। सड़कों पर उतरकर वो अंग्रेजों से लड़ी और तब कांग्रेस ही देश की आवाज थी। उस लड़ाई में युवाओं का सहभाग था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद ६० वर्षों तक सत्ता का उपभोग करनेवाली कांग्रेस ने जब समय आया तब प्रबल विरोधी दल की भूमिका स्वीकार नहीं की। इतना ही नहीं तो अब लोकसभा चुनावों में लगातार दूसरी बार बुरी हार के बावजूद भी ‘हम ही देश के राज्य करनेवाले’ इस ‘मुगलिया’ मानसिकता से कांग्रेस बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं है। संपूर्ण देश अनुच्छेद ‘३७०’ हटाए जाने का स्वागत कर रहा है, वहीं जीर्ण-शीर्ण कांग्रेस पार्टी ‘३७०’ के मकड़जाल को अपने शरीर से दूर करने को तैयार नहीं है। उनकी पार्टी में ही इस पर दो-फाड़ हो गया है। ट्रिपल तलाक के संदर्भ में राजीव गांधी द्वारा की गई भयंकर गलती को इस बार सुधारा जा सकता था। लेकिन कांग्रेस ने इतिहास की गलतियों से सीखने की तैयारी नहीं दिखाई इसलिए कांग्रेस पार्टी दिल्ली का मीनाबाजार बन गई है। पुराने ग्राहक वहां घूमते नजर आते हैं सिर्फ इतना ही। कांग्रेस के पतन के लिए मोदी-शाह जिम्मेदार न होकर वे खुद ही जिम्मेदार हैं। ७३ वर्षीय सोनिया गांधी के कंधों पर भार सौंपकर कांग्रेस ने बचा-खुचा सत्व भी गंवा दिया है।