`कांटे’ का काउंटडाउन

सोशल मीडिया के सहारे सांसें लेनेवालों के लिए कल का दिन निराशा भरा रहा होगा। फेसबुक हांफता रहा तो व्हॉट्सऐप, मैसेंजर और इंस्टाग्राम लड़खड़ा कर चलते रहे। नई पीढ़ी में निराशा स्वाभाविक थी। वैसे निराशा कल राजनीतिक दिग्गजों को भी हुई होगी। सियासी लाभ के लिए चुनाव आयोग से लेकर प्रतिद्वंद्वियों तक पर बार-बार उंगलियां उठाने और सुप्रीम कोर्ट की आड़ में भ्रम पैदा करनेवालों के लिए दिन अच्छा नहीं रहा। संवैधानिक संस्थाओं ने `बिगड़ैलों’ की हल्के से उंगलियां ही मरोड़ दीं। आयोग ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर कड़ाई बरती तो सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर। मामला जरूरत से ज्यादा मुंह खोलने का था। अपेक्षा की जा सकती है कि चुनाव प्रचार के आगामी मौसम में `बड़े मुंहवाले’ नेताओं पर ये कार्रवाइयां अंकुश लगाने में सफल होंगी। वैसे कल दिन भर जनता सपा नेता आजम खान पर भी अंकुश लगने का इंतजार करती रही। वे रामपुर से चुनावी मैदान में हैं पर शैली बिल्कुल `रावण’ वाली है। सपा की पूर्व नेत्री जयाप्रदा पर टिप्पणी करने में उन्होंने अश्लीलता की कोई हद नहीं छोड़ी। नतीजे में प्रतिक्रियाओं के बाण चले। ट्विटर से लेकर सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म से। माहौल चुनावी महाभारत का ही बन गया तो चर्चा में भीष्म पितामह और द्रौपदी के चीर हरण का जिक्र भी रहा। सुषमा स्वराज ने आजम खान को निशाना बनाते हुए तीखे शब्दों में उनकी भर्त्सना की। निशाने पर अखिलेश के `मुलायम’ पिता को भी लिया। हां, निशाने पर मजिस्ट्रेट ने भी आजम खान को लेने में देरी नहीं की। मामला दर्ज हो गया। कार्रवाई करने में महिला आयोग भी पीछे नहीं रहा। हालांकि चर्चा वहीं के वहीं कायम थी। आजम कोई सुधरनेवाली चीज हैं क्या? अपने अश्लील बयानों के लिए चौतरफा घिरे मियां आजम का यह मामला तूल पकड़ ही रहा था कि आग में घी डालने का काम एक वायरल वीडियो ने कर दिया। आजम गाड़ी पर खड़े होते हैं और पब्लिकली कहते हैं कि गठबंधन की सरकार आई तो डीएम से जूता साफ करवाएंगे। अब ऐसे नेता पर `सोशल जूता’ न पड़ता तो भला क्या पड़ता? बदजुबानों पर कड़ाई जरूरी है। माना मौसम चुुनावी है और इसमें नेताओं की जुबान फिसलने का मर्ज आम। पर लक्षण बार-बार नजर आए तो बीमारी `घातक’ भी हो सकती है। जानबूझ कर इस ज्वर पर माफी की गुंजाइश नहीं है। जब मामला `बिलो दी बेल्ट’ हो तो उसे गंभीर मान लेना चाहिए। बिलो दी बेल्ट मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी चले जाते हैं, जब वे पीएम मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि तुम्हें पैंट पहननी नहीं आती थी तब नेहरू, इंदिरा गांधी ने सेना को खड़ा किया। सवाल मोदी के हेलिकॉप्टर से उतरे काले ट्रंक पर भी उठते हैं और अखिलेश यादव की चुप्पी पर भी। हिदायत मुलायम की बहू अपर्णा भी दे देती हैं, पर असर कोई नजर नहीं आता। चलिए अब बात दूसरे चरण के चुनाव की करते हैं। घड़ी के कांटे तेजी से बढ़ रहे हैं। काउंटडाउन शुरू हो चुका है। दूसरे चरण में १३ राज्यों की जिन ९७ लोकसभा सीटों पर मतदान होना है, वहां आज शाम चुनाव प्रचार खत्म हो जाएगा। तब भी इस युग में मतदाताओं तक `डिजिटल’ घुसपैठ तो बनी ही रहेगी। कोई कसर छूट गई तो मान कर चलिए न्यूज चैनल्स उसे पूरा करने में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे। यहां प्रचार का परचम किसी तरह अंतिम चरण तक लहराता ही रहेगा। खैर, पहले चरण के बाद अब सभी पर दबाव ज्यादा है। बेहद ज्यादा। राजनीतिक दलों पर भी और चुनाव आयोग पर भी। पश्चिम बंगाल और आंध्र में औसत से कहीं ज्यादा तो बिहार-उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से काफी कम मतदान सियासत के माथे पर चिंता की लकीर बन चुका है। पहले चरण की कोर कसर दूसरे चरण में पूरा करने का दमखम लग रहा है। पार्टियों को वोटरों की तो आयोग को वोटिंग मशीनों की चिंता होना स्वाभाविक है। शर्तिया धड़कनें सभी की बढ़ी हुई होंगी। घड़ी की सुइयों को मात दे रही होंगी।
पहले चरण के मतदान की मिठास पर यूपी के गन्ना किसानों की नाराजगी का `पाला’ पहले ही पड़ा चुका है। अब दूसरे चरण में यूपी का ही आलू किसान मतदान का हाजमा न खराब कर दे। हाजमा दुरुस्त रहे राजनैतिक दलों का और प्रजातंत्र का तो सचेत होना पड़ेगा।