" /> कामनाओं का सर्जक है मन!

कामनाओं का सर्जक है मन!

मन अप्रत्यक्ष है। दिखाई नहीं पड़ता। यह मनुष्य के व्यक्तित्व की अंत: शक्ति है। मन के अध्ययन, विवेचन व विश्लेषण पर विश्वव्यापी मनोविज्ञान विकसित हुआ है। भारतीय दर्शन में मन: शक्ति की जानकारी ऋग्वेद के रचनाकाल से ही मिलती है। ऋग्वेद में मन भी एक देवता हैं। ऋषि मन की गतिशीलता से आश्चर्यचकित थे। मन के लिए समय और भौगोलिक दूरी की कोई बाधा नहीं। पल में यहां, पल में वहां। स्वयं से दूर गया मन सांसारिक कार्यों में बाधक होता है। अध्ययन, विवेचन और निरीक्षण के कार्यो में भी चंचल मन बाधा है। ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं, ‘हम दिव्यलोक, भूलोक तक चले गए मन को वापस लाते हैं। समुद्र, अंतरिक्ष या सूर्य की ओर गए मन को भी हम यहीं लाते हैं। दूर दूरस्थ पर्वत, वन या अखिल विश्व विचरणशील मन और भूत या भविष्य में गए मन को हम वापस लाते हैं। (१०.५८.१-१२) हम सब संसार में हैं। संसार का भाग हैं। जीवन के कार्य व्यापार संसार में ही होते हैं। संसार से विचलित मन एकाग्र नहीं होता। इस सूक्त के सभी मंत्रों के अंत में ठीक ही एक टेक बनी रहती है कि हे मन यहीं आओ, इसी संसार में आपका जीवन है।
मन हमारे व्यक्तित्व का सक्रिय हिस्सा है। यह संपूर्ण व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। भारतीय चिंतन में मन के कार्य व्यापार पर बहुविधि विचार हुआ है। अथर्ववेद (१३.३.१९) में ‘मन को ऋत के तंतुओं को नापनेवाला कहा गया है।’ प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क में प्रकृति बोध को समझनेवाले ज्ञान तंतु होते हैं। इसे आधुनिक विज्ञान में तंत्रिका तंत्र कह सकते हैं। यही ऋत तंत्र है। मन इस तंत्र का परीक्षण करता है। परीक्षण का आधार प्राकृतिक संविधान या ऋत होता है। इसी परीक्षण के अनुसार बुद्धि निर्णय लेती है।
मन का अस्तित्व महत्वपूर्ण है। वह दर्शनीय न होकर भी प्रभावशाली है। मन हमारे व्यक्तित्व में संकल्प का केंद्र है। मन का हमारे व्यक्तित्व में ही एकाग्र बने रहना बोधदाता है। मन की एकाग्रतावाली बुद्धि मनीषा-मन ईशा है। मन की एकाग्रतावाले विद्वान मनीषी कहे जाते हैं। ऋग्वेद के ऋषि ऐसे मन का आह्वान करते हैं ‘सतत् दक्ष कर्म के लिए, दीर्घकाल तक सूर्य दर्शन के लिए श्रेष्ठ मन का आह्वान करते हैं – आतु ए तु मन: कृत्वे दक्षाय जीव से, ज्योक च सूर्य दृशे। (१०.५७.४) मन कर्मठ जीवन का ऊर्जा केंद्र है।
कठोपनिषद् उत्तर वैदिक काल की प्रतिष्ठित दार्शनिक रचना है। इसमें मनुष्य के अंतर्जगत को समझने का सुंदर उल्लेख है। संसार से हमारा संबंध और परिचय इंद्रियों के माध्यम से होता है। उपनिषद् के ऋषि कहते हैं ‘इंद्रियों से मन परे है। मन के परे बुद्धि है, बुद्धि से महत् आत्मा श्रेष्ठ है और इसके बाद अव्यक्त।’ यही बात गीता के तीसरे अध्याय में भी है। आंख, कान, नाक, स्पर्श और स्वाद की पांच इंद्रियां बोध का उपकरण हैं। यह अपनी अनुभूति मन को देती हैं। मन इनका प्रधान है। वह एकाग्र हो तो इंद्रिय बोध का सार ग्रहण करता है। इंद्रियां पूरे दिन तमाम सूचनाएं देती रहती हैं। मन सभी सूचनाओं का संज्ञान नहीं लेता। वह चंचल है। यही कठिनाई गीता के अर्जुन के सामने भी थी। उसने श्रीकृष्ण से कहा ‘हे कृष्ण, मन बड़ा चंचल है, इसका निग्रह वायु पकड़ने की तरह कठिन है।’ अथर्ववेद (१९.९.५) में कहते हैं ‘मन के साथ पांच इंद्रियां हैं – इमानि यानि पंचेन्द्रियाणि मन षष्टानि। मन छठा है। इनके द्वारा रचित कल्पित उपद्रव शांत हों।’
मन तमाम कामनाओं का सर्जक है। सभी कामनाएं पूरी नहीं होतीं। कामनाओं की पूर्ति में बाधा से मन में तरंगे उठती हैं। इन तरंगो से क्रोध का जन्म होता है। अथर्ववेद के ऋषि क्रोध शमन के भौतिक उपायों से भी सुपरिचित थे। कहते हैं, ‘हम आपके क्रोध को पैर के अग्रभाग व एड़ी से दबाते हैं। इस क्रिया से आप शांत हों और अनियंत्रित न हो।’ (६.४२.३) आगे कहते हैं, ‘हम आपके हनु (ठोढ़ी जबड़ा) पर क्रोध से उभरी नस की फड़कन को शांत करते हैं। मुख पर उभरे क्रोध के लक्षण शांत करते हैं। आप न बोलें, शांत रहें।’ (६.४३.३) एक सुंदर उदाहरण से क्रोध का स्वरूप समझाते हैं ‘जैसे धनुर्धारी पुरुष धनुष पर तनावपूर्ण प्रत्यंचा उतारते हैं, वैसे ही हम आपके क्रोध को उतारते हैं। इससे हम-आप परस्पर मित्र आत्मीय होंगे।’ (वही १) क्रोध का उद्भव केंद्र मन है।
क्रोध आत्मीयता में बाधक है। यह संबंध विच्छेदक है। सामाजिक संगठन का शत्रु है। यह तमाम कामनाओं के उत्ताप का परिणाम है। मन इसका केंद्र है। मन ही संकल्प का भी केन्द्र है। लोककल्याण के संकल्प मन मिलाते हैं। लेकिन क्रोध की चित्तदशा में विवेक काम नहीं करता। क्रोध ध्वंसकारी है। ऋषि कहते हैं, ‘हम आपके क्रोध को भारी पत्थर के नीचे फेंकते हैं। हम परस्पर मन मिलाते हुए आत्मीय मित्र की तरह कार्य करें – सरवाया विव सचावहा।’ (वही २) परस्पर सहमना लोग सहमना समाज बनाते हैं और सहमना समाज के शिव संकल्प समाज को सुख-स्वस्ति और आनंद से भरते रहते हैं।
अथर्ववेद के रचनाकाल में आधुनिक मनोविज्ञान की तमाम उपलब्धियां बीज रूप में विद्यमान थीं। मनोविज्ञान को अंग्रेजी भाषा में साइकोलॉजी कहा जाता है। च्लेबीवसवहल ग्रीक शब्द च्लेबीम से बना है। साइको का अर्थ स्प्रिट या माइंड है। भारत में यह मन कहा जाता है। लॉजी विज्ञान है। साइकोलॉजी मन विज्ञान है। यूरोप के मनोविश्लेषण से बहुत पहले मन के स्वरूप, उसकी गति और प्रभाव का अध्ययन भारत में ऋग्वैदिक काल से ही जारी है। इसे अध्यात्म भी कहा गया है। गीता में अर्जुन का प्रश्न है ‘अध्यात्म क्या है – किम् अध्यात्म?’ श्रीकृष्ण का उत्तर है ‘स्वभावो अध्याम उच्चते – स्वभाव को अध्यात्म कहते हैं।’ स्वभाव हमारे मन अंतरंग का ही नाम है। हिंदुस्थानी चिंतन पद्धति में मन का अध्ययन दर्शन का विषय रहा है। पतंजलि के योग सूत्रों में मन का वैज्ञानिक विवेचन भी है।
हिंदुस्थानी इतिहास के उत्तर वैदिक काल में मन के रूप-स्वरूप व प्रभाव पर काफी विचार हुआ था। मन पूरे व्यक्तित्व का स्वामी है। शतपथ ब्राह्मण में मन को सम्राट कहा गया है – मनो वै सम्राट। यहां मन को अनंत भी बताया गया है। मन के अनुसरण स्नायु तंत्र की गतिविधि है। मन का प्रभाव रक्त संचार पर भी पड़ता है। मन को स्वस्थ रखने के लिए स्वयं को स्वयं द्वारा सकारात्मक सुझाव देने -ऑटो सजेशन का उपचार सर्वविदित है। यह आधुनिक मनोविज्ञान का निष्कर्ष है। यही बात शतपथ ब्राह्मण में भी कही गई है ‘मन प्राणों का स्वामी है। प्राण मन के आदेशानुसार चलते हैं। ज्ञानेंद्रियों के सब काम मन के द्वारा नियंत्रित होते हैं। कामना, संकल्प, संदेह, अधीरता, श्रद्धा, अश्रद्धा और भय आदि सभी मन आयाम हैं।’ ये सब मन की गतिविधि के ही परिणाम हैं। मन आराध्य है।
आधुनिक मनोविज्ञान में मन से जुड़े अनेक विषयों का अध्ययन होता है। इसमें प्रमुख विषय संवेदन – सेनसेशन व ध्यान – अटेंशन हैं। स्मरण व विस्मरण भी महत्वपूर्ण हैं। स्नायुतंत्र की गतिविधि अति महत्वपूर्ण है। प्रेरणा या मोटीवेशन भी मन का भाग हैं। चिंतन वस्तुत: मनन ही है। यह मन का ही कार्यव्यापार है। सफलता या विफलता मन की ही अनुभूतियां हैं। अनुमानों से निर्मित काल्पनिक अवधारणाएं या परसेप्शन भी मनोविज्ञान के उपविषय हैं। मन अध्ययन संबंधी ये सारे विषय प्रत्यक्ष नहीं हैं लेकिन इनके प्रभाव से बने मानसिक रूप व आकार प्रत्यक्ष अनुभव में आते हैं। मन के तल पर होनेवाली गतिविधि सारी दुनिया के मनस्विदों की जिज्ञासा रही है। इसी में से मनोविकारों की भी पहचान हुई और उनके अध्ययन का काम भी विकसित हुआ। आधुनिक मनोविज्ञान में चिकित्सकीय सुझाव-या काउंसिलिंग का उपचार नया व्यवसाय बना है। प्रेम में विफल या अवसादग्रस्त लोगों के लिए मनोरंजन मीडिया में लवगुरु टाइप लोगों के परामर्श चल रहे हैं।