" /> कारपेंटरी संस्थान की दरकार

कारपेंटरी संस्थान की दरकार

कोरोना के बाद इकॉनमी फिर से रीस्टार्ट मोड में होगी। श्रमिकों एवं कारीगर बड़ी संख्या में अपने मूल स्थानों पर जा चुके होंगे। बहुत से उसमें से एवं अन्य युवा एवं उद्यमी भी उद्यम एवं रोजगार के विकल्प के रूप में सोच रहा होंगे। आइये आज चर्चा करते हैं एक ऐसे उद्यम की जो कि कोरोना के बाद ग्रामीण व क़स्बे स्तर पर अधिक संभावनाएं लिए हुए होगा। लेकिन अभी तक औपचारिक दृष्टि से अछूता है जबकि विदेशों में ब
बाकायदे इसके लिए संस्थान है, वह है कारपेंटरी उद्यम। सभ्यता के शुरुआत से ही जब समूहों में रहना प्रारंभ हुआ और लोग घरों में रहना प्रारंभ किये तभी से लकड़ियों के विभिन्न प्रयोगों के रूप विकसित हुए और फर्नीचर उद्योग की शुरुआत हुई। सभ्यता के शुरुआत में जो लकड़ी के पहिये भी बने वह भी फर्नीचर उद्योग का एक उदाहरण है। इतने हजारों साल के आस्तित्व से लेकर आज तक भारत में इसका कोई भी औपचारिक संस्थान नहीं है जबकि अन्य यंत्र ज्ञान के आपको शिक्षण संस्थान मिल जायेंगे, लेकिन वह यंत्र शिक्षा जिसने हमारे जीवन, विकास और सभ्यता को आधार दिया उसका औपचारिक होना अभी बाकी है। आज भी देश में सबसे पुराना और प्रमाणिक यंत्र प्रयोग वाला कुटीर उद्योग कारपेंटरी उद्योग ही है। आपको भारत के हर गांव में एक कारपेंटर मिल जायेगा जो अपना कारपेंटर उद्यम चला रहा होगा, थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो क़स्बे में आपको १० से १२ मिल जाएंगे, थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो जिले में २० से २५ मिल जाएंगे और जब बड़े शहरों में बढ़ेंगे तो सैकड़ों मिल जाएंगे। इतना बड़ा कुटीर उद्योग का जाल होने पर भी आज भी यह कौशल या तो पिता द्वारा पुत्र को या उस्ताद द्वारा अपने चेले के माध्यम से आग बढ़ रहा है। इस यंत्र चालित मानवीय सभ्यता की सबसे पुराने उद्यम को अगर थोडा पॉलिश किया जाय तो बड़े पैमाने पर रोजगार एवं इनके आय में वैल्यू एडिशन किया जा सकता है। आज भी महानगरों में किसी भी कार्यालय या घरों के इंटीरियर के काम में आत्मा इन्ही कारपेंटर की रहती है लेकिन इसकी सारी मलाई इंटीरियर डेकोरेटर ले जाता है, जबकि वह सारा काम कारपेंटर एवं इसके एलायड उद्यम ही करते हैं। इसके एलायड उद्यम में इलेक्ट्रीशियन के लिए इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का कोर्स है, पेंटिंग के लिए कुछ पेंट कम्पनियों ने औपचारिक शिक्षा भी शुरू की है, लेकिन कारपेंटर के लिए कोई शिक्षण संस्थान नहीं है, जबकि इंटीरियर एवं फर्नीचर उद्योग का यह मूल आधार है।
अमेरिका और यूरोप ने इस प्राचीन यंत्र ज्ञान एवं उद्योग की महत्ता को पहचाना है और बाकायदे इसके लिए कारपेंटरी इंस्टिट्यूट हैं। अब जरुरत है भारत में इस कौशल और यंत्र चालित उद्यम के लिए औपचारिक शिक्षण संस्थान चालू करने की क्यों की मौजूदा कुशल कारीगरों के अलावा बड़े पैमाने पर नवयुवा हैं जो रोजगार के लिए खड़े हैं। यदि हम आज ही इस पर एक ठोस नीति बना कर एक कारपेंटर संस्थान की परिकल्पना को साकार करते हैं तो सिर्फ हम मौजूदा स्किल को एक सूत्र में पिरोकर इनका पलायन ही नहीं रोकेंगे बल्कि बड़े पैमाने पर नव युवाओं को कारपेंटर उद्यम, एक रोजगार अवसर एवं स्व उद्यमशीलता के रूप में विकल्प मिलेगा।

इसके लिए सबसे पहले हमें कारपेंटरी ज्ञान को एक इंजीनियरिंग ज्ञान एवं शिक्षा के रूप में रेखांकित करना पड़ेगा। जब तक हम इसे इंजीनियरिंग ज्ञान एवं शिक्षा के रूप में रेखांकित नहीं करेंगे हम अपना दृष्टिकोण इसके उत्थान के लिए बदल नहीं सकते। फिर इसे एक औपचारिक उद्योग के रूप में चिन्हित करना होगा क्यों कि पूरे देश में सबसे बड़े और प्राचीन कुटीर उद्योग के विस्तृत नेटवर्क के रूप में यही है। ऐसा कोई गांव नहीं जहां आपको माइक्रो स्तर का कारपेंटर नहीं मिले, अतः इसे हमें रोजगार के सबसे सुलभ प्राकृतिक अवसर के रूप में चिन्हित करना होगा। इसे औपचारिक रूप देने हेतु हमें इनके कौशल ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर सर्टिफिकेट डिप्लोमा या डिग्री आधारित शिक्षा लानी पड़ेगी। इसके लिए कारपेंटरी ज्ञान एवं रोजगार की उपयोगिता को देखते हुए एक समर्पित संस्थान खोला जाना चाहिए। दरअसल कारपेंटरी ज्ञान एक प्रकार का इंजीनियरिंग ज्ञान है एवं रोजगार में इसकी तीव्र उपयोगिता को देखते हुए एक समर्पित संस्थान खोला ही जाना चाहिये जो कक्षा १२ वीं के बाद ही इस कोर्स के प्रति रोजगार एवं आय की संभावनाओं को देखते हुए युवाओं को आकर्षित करे। इस डिग्री की शिक्षा के अलावा सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स को डेवलपमेंट मिशन पोलिटेक्निक या आईटीआई से सम्बद्ध कारपेंटरी इंस्टिट्यूट के माध्यम से दिया जा सकता है। इसकी रूप रेखा में विश्वविद्यालय या एआईसीटीई के तहत कारपेंटरी डिग्री कोर्स को डिजाईन किया जाना चाहिये, जिसमें कारपेंटरी एवं इसके सहायक विषयों का समावेश हो। इस डिग्री कोर्स हेतु बाकायदे एक कारपेंटरी इंस्टिट्यूट भी खोला जाय। कारपेंटरी इंस्टिट्यूट के अलावा इस कोर्स को मौजूदा इंजीनियरिंग पाठयक्रम में भी शामिल कर इसे इंजीनियरिंग कॉलेज में भी इलेक्ट्रिकल मैकेनिकल की तरह एक विभाग माना जाय और वहां भी इसकी शिक्षा दी जाय। इस कोर्स को इंटीरियर डिज़ाइनिंग कोर्स से स्वतंत्र रखा जाय क्योंकि एक कारपेंटर तो इंटीरियर डिज़ाइनर बन सकता है लेकिन एक इंटीरियर डिज़ाइनर कारपेंटर नहीं बनता है। इस डिग्री की शिक्षा के अलावा सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण भारत सरकार के स्किल डेवलपमेंट मिशन द्वारा किया जाय जिसमें कारपेंटरी एवं इसके सहायक विषयों का समावेश हो। इस बात का ध्यान रखते हुए कि यह ज्ञान देश में फैले ऐसे करोड़ों उद्यमियों को देना है जो पहले से ही इस कार्य को कर रहें हैं। बस थोड़े से हेल्प और पॉलिश ज्ञान से एक बड़ा वैल्यू एडिशन करना है। भारत सरकार की पहले से एक योजना इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्किल है, वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार कारपेंटरी एवं अलायड हुनर इसके कोर्स में नहीं है इसी इंस्टिट्यूट में कारपेंटरी एवं अलायड का कोर्स पहले शामिल किया जाय। कोर्स में शामिल करने के पश्चात विकेंद्रीकृत कारपेंटर इंस्टिट्यूट को इससे सम्बद्ध कर खोला जाए। प्रवासी निवासी एवं अन्य इच्छुक अभ्यर्थी निम्न आय वर्ग वाले होंगे अतः इनका प्रदेश के अन्य हिस्सों से आकर पढना संभव नहीं होगा। अतः इसे विकेंद्रीकृत केन्द्रों के माध्यम से सम्बद्ध कर चलाया जाय. इस कोर्स को त्वरित लाभ से भी जोड़ा जाए और सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स को तो सिर्फ उन्हें ही दिए जाएँ जो पहले से ही इस लाइन में हो और यह उन्हें एक औपचारिक डाटाबेस में लाने के लिए एक प्रक्रिया की योजना केतहत हो. इन त्वरित लाभों में सर्टिफिकेट/डिप्लोमा/डिग्री लेने के बाद इनमे से जो स्वरोजगार अपनाना चाहते हैं उन्हें इंस्टिट्यूट से निकलते वक़्त ही उद्योग आधार दिया जाय, उन्हें एमएसएमई का सर्टिफिकेट तुरंत दिया जाय। उन्हें प्राथमिक ऋण दिए जाएं। कोर्स की शर्तों से सम्बद्ध जो भी कारीगर स्वरोजगार करना चाहें, उन्हें तत्काल १ लाख रूपये औजार और मशीनरी हेतु एवं ५० हजार रूपये कार्यशील पूंजी के रूप में दिए जाएं ताकि वह स्वरोजगार कर सकें। इसे क्रेडिट गारंटी सीजीटीएसएमई योजना के तहत दिया जाय। इसकी निगरानी व्यवस्था भी रखी जाय ताकि यह सुनिश्चित हो। जो बड़े पैमाने पर करना चाहते हों  उन्हें सीजीटीएसएमई सुविधा वाला प्रतिभूति रहित प्रोजेक्ट ऋण क्रेडिट गारंटी योजना के तहत दिया जाय। इसकी निगरानी व्यवस्था भी रखी जाय ताकि यह बैंको एवं वित्तीय संस्थानो द्वारा सुनिश्चित हो। यदि हम ऐसा कर ले जाते हैं तो समझ जाइये की कुटीर उद्योग को नियमित करने में एक बड़ा कदम होगा।