कार्तिक पूर्णिमा को मारा गया था त्रिपुरासुर

हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में आनेवाली पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था, इसलिए इसे ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ भी कहते हैं। यदि इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह ‘महाकार्तिकी’ होती है। वहीं भरणी नक्षत्र होने पर इस पूर्णिमा का विशेष फल प्राप्त होता है। इस वर्ष १२ नवंबर को भरणी नक्षत्र में कार्तिक पूणिमा है।
एक अन्य मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर संध्या के समय भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप-दान का फल दस यज्ञों के समान होता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य ने इसे महापुनीत पर्व कहा है।
कार्तिक मास में आनेवाली पूर्णिमा वर्षभर की पवित्र पूर्णमासियों में से एक है। इस दिन किए जानेवाले दान-पुण्य के कार्य विशेष फलदायी होते हैं। यदि इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चंद्रमा और विशाखा नक्षत्र पर सूर्य हो तो पद्मक योग का निर्माण होता है, जो कि बेहद दुर्लभ है। वहीं अगर इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चंद्रमा और बृहस्पति हो तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। इस दिन संध्याकाल में त्रिपुरोत्सव करके दीपदान करने से पुनर्जन्म का कष्ट नहीं होता है। उड़ीसा में इस दिन केदार व्रत रखा जाता है जबकि राजस्थान का पुष्कर मेला इसी दिन समाप्त होता है। यहां पर कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी आते हैं। बड़ी संख्या में हिंदू इस मेले में आते हैं व अपने को पवित्र करने के लिए पुष्कर झील में स्नान करते हैं। भक्तगण एवं पर्यटक श्री रंग जी एवं अन्य मंदिरों के दर्शन कर आत्मिक लाभ प्राप्त करते हैं।
पौराणिक संदर्भ
प्राचीन काल में एक समय त्रिपुर नामक राक्षस ने एक लाख वर्ष तक प्रयागराज में घोर तप किया। उसकी तपस्या के प्रभाव से समस्त जड़-चेतन, जीव और देवता भयभीत हो गए। देवताओं ने तप भंग करने के लिए अप्सराएं भेजीं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। त्रिपुर राक्षस के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी स्वयं उसके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।
त्रिपुर ने वरदान मांगा कि ‘मैं न देवताओं के हाथों मरूं, न मनुष्यों के हाथों से, इस वरदान के बल पर त्रिपुर निडर होकर अत्याचार करने लगा। इतना ही नहीं उसने वैâलाश पर्वत पर भी चढ़ाई कर दी। इसके बाद भगवान शंकर और त्रिपुर के बीच युद्ध हुआ। अंत में शिव जी ने ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु की मदद से त्रिपुर का संहार किया।
सिखों के आदिगुरु का प्रकाश पर्व
कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक जी का जन्मदिन भी मनाया जाता है। १५ अप्रैल १४६९ को पंजाब के तलवंडी जो कि अब पाकिस्तान में है और जिसे ननकाना साहिब के नाम से भी जाना जाता है, में गुरु नानक ने माता तृप्ता व किसान पिता कल्याणचंद के घर जन्म लिया। गुरु नानक जी की जयंती गुरुपूरब या गुरु पर्व सिख समुदाय में मनाया जानेवाला सबसे सम्मानित और महत्वपूर्ण दिन है। गुरुनानक जयंती के अवसर पर गुरुनानक जी के जन्म को स्मरण करते हैं। नानक सिखों के प्रथम (आदि गुरु) हैं। इनके अनुयायी इन्हें नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। लद्दाख व तिब्बत में इन्हें नानक लामा भी कहा जाता है। नानक दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु – अनेक गुण अपने आप में समेटे हुए थे।
‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे
एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे’
सभी इंसान उस ईश्वर के नूर से ही जन्मे हैं इसलिए कोई बड़ा छोटा नहीं है कोई आम या खास नहीं है। सब बराबर हैं। बचपन में ही गुरुजी में प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन में ही ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहने लगे। इनका पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था। महज ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत प्राप्ति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक हार मान गए तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ आए। जिसके बाद अधिक समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन में कई चमत्कारिक घटनाएं घटीं, जिन्हें देखकर गांववाले इन्हें दिव्य आत्मा मानने लगे। नानक जी में सर्वप्रथम श्रद्धा रखनेवाले उनके गांव के शासक राय बुलार और उनकी बहन नानकी थीं।
कार्तिक पूर्णिमा के कर्मकांड
कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान, दीपदान, होम, यज्ञ और ईश्वर की उपासना का विशेष महत्व है। इस दिन किए जानेवाले धार्मिक कर्मकांड इस प्रकार हैं-
पूर्णिमा के दिन प्रात:काल जाग कर व्रत का संकल्प लें और किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान करें।
इस दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसुईया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन अवश्य करना चाहिए।
कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में व्रत करके बैल का दान करने से शिव पद प्राप्त होता है।
गाय, हाथी, घोड़ा, रथ और घी आदि का दान करने से संपत्ति बढ़ती है।
भेड़ का दान करने से ग्रहयोग के कष्टों का नाश होता है।
कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होकर प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा का व्रत रखनेवाले व्रती को किसी जरूरतमंद को भोजन और हवन अवश्य कराना चाहिए।
इस दिन यमुना जी पर कार्तिक स्नान का समापन करके राधा-कृष्ण का पूजन और दीपदान करना चाहिए।