" /> काश तू मेरी होती

काश तू मेरी होती

काश तू मेरी होती
तेरे ख्वाब मेरे होते,
और मेरे ख्वाब में तू होती।
तेरे चेहरे की चमक मेरी होती,
तेरी पायल की छन-छन मेरी होती।
तेरे सपनो का मैं राजा होता।
और तू मेरे सपनो की रानी होती।।
काश तू मेरी होती।।
तू मेरे इतनी पास है,
फिर भी क्यों लगता है दूर?
नजाने वैâसी है बेसब्री,
तू भी क्यों हैं मजबूर।
वैâसे तेरे सपने मेरे होते,
जैसे मेरे सपने तेरे।
मैं तेरा आशिक होता।
और तू मेरी आशिकी होती।।
काश तू मेरी होती।।
मेरे किस्मत में तू लिखी होती,
न ए-जिंदगी में अकेलापन होता।
पास तेरे होके भी तेरे बिना,
दिल ए मेरा अब न रोता।
यूं तू जब गुजरती है मेरे सामने से,
जैसे मेरे किस्मत से दूर।
काश तेरी किस्मत मेरी होती।
और तू मेरी किस्मत में होती
काश तू मेरी होती।।
तेरी शादी में मैं होता,
और मेरे शादी में तू होती।
तेरा दूल्हा मैं होता,
तू मेरी दुल्हन होती।
तेरे बच्चों के नाम में मेरा नाम आता,
और मैं उनका पापा कहलाता।
काश तू मेरी होती।।
और मैं तेरा होता।।
-शशिधर तिवारी ‘राजकुमार’, मुंबई 

बाबा
प्यार दिया स्नेह दिया, जो भी मांगा हर बार दिया।
नजर पड़ी जिस चीज पर, मुझ पर तुमने वार दिया।।
याद है बाबा, बिन मांगे हर तीज-त्यौहार दिया।
गुड़िया-गुड्डा से लेकर, स्वर्ग सजा परिवार दिया।।
फिर घर की जिम्मेदारी भी देकर देखो न बाबा,
बेटे से मैं कम नहीं, इस बात का करती हूं दावा,
खरी ना उतरी तो तेरे समक्ष, समर्पण कर जाऊंगी।
नतमस्तक होने के पहले मस्तक का ताज कहलाऊंगी।।
जितना यकीन है बेटे पर, मुझ पर करके देखो बाबा।
हो जाऊंगी थोड़ा कम या ज्यादा, नहीं तोड़ूगी कायदा।।
कंधे को इतना सशक्त बनाऊंगी, घर पर बोझ नहीं।
घर की जिमेदारी उठाने के काबिल मैं बन जाऊंगी।।
इस दुनिया की हर जंग को जीत गई भी तो क्या?
जब तेरी नजरों में मैं मोम की गुड़िया रह जाऊंगी।।
खुद को जीता हुआ, दुनिया को कैसे बतलाऊंगी?
जब तेरे कंधे पर रखे बोझ को, मैं ही ना हर पाऊंगी।।
-नताशा गिरि ‘शिखा, सांताक्रुज

कोई तो दिल बहलाएगा!
अधरों पर प्यास लिए निकला हूं,
दरिया की आस लिए निकला हूं।
कोई तो दिल को बहलाएगा,
दिल में विश्वास लिए निकला हूं।
आखिर गुरबत साथ निभाएगी,
इसका अहसास लिए निकला हूं।
गम की चिंता करनी क्या मुझको?
मन में उल्लास लिए निकला हूं।
आज खिजां का मौसम हो चाहे,
पर मैं मधुमास लिए निकला हूं।
खूब ठिकाने अपने दुनिया में,
पर एक तलाश लिए निकला हूं।
राह खुदा दिखलाना तू मुझको,
तेरी अरदास लिए निकला हूं।
-गोविंद भारद्वाज, पितृकृपा, पीलीखान, अजमेर, राजस्थान