किसन वारे, संजय साठे तथा अन्य

पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल चार-पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार में व्यस्त है। मगर महाराष्ट्र राज्य सूखे की दावाग्नि में झुलस रहा है। मुख्यमंत्री खुद धुले महापालिका के प्रचार में व्यस्त हैं। राज्य के अन्य मंत्रियों को भी धुले महापालिका के विभाग बांटकर दिए गए हैं। केंद्रीय रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे भी इन दिनों धुले में ही जमे हुए हैं। मतलब ‘जवान’ और ‘किसान’ इन्हें भगवान भरोसे छोड़कर महापालिका से लेकर विधानसभा चुनाव तक हमारे सत्ताधारी जुटे हुए हैं। इसी दौरान केंद्रीय दस्ता महाराष्ट्र के सूखा दौरे पर आया हुआ है। केंद्रीय दस्ते के सामने किसान अपनी व्यथा व्यक्त कर रहा है जो अत्यंत दुखदायी है। ‘साहब बताओ, हम वैâसे जीएं? पीने को पानी नहीं और जानवरों को चारा नहीं। साहूकार से कर्ज लिया है उसे वैâसे अदा करें? बैंक से भी कर्ज लिया है। इसलिए वापस बैंक के दरवाजे पर जाकर कर्ज नहीं मांगा जा सकता और हम पर जहर पीने की नौबत आई है।’ इस तरह की व्यथा करमाला के जातेगांव के किसान किसन वारे ने व्यक्त की है। किसन की व्यथा ही राज्य के सभी सूखाग्रस्त किसानों की व्यथा है। ‘अधिकारी आते हैं, सिर्फ सर्वे करके चले जाते हैं। न कर्जमाफी और न ही फसल बीमा योजना। साहब, किसी भी तरह की मदद नहीं मिलती। अब अगर मदद नहीं मिली तो हम सभी आत्महत्या करेंगे साहब…।’ केंद्रीय सूखा दस्ते के सामने राज्य का किसान आक्रोश व्यक्त कर रहा है यह राज्य के प्रशासन के लिए शर्मनाक है। शिवसेना, सरकार पर टिप्पणी करती है, सरकार में रहकर कामकाज की बखिया उधेड़ती है, ऐसा जिन्हें लगता है उन्हें केंद्रीय दस्ते के सामने किसानों द्वारा जताई गई व्यथा को समझना होगा। केंद्रीय दस्ते से शिवसेना का संबंध नहीं और किसन वारे (उम्र ६७) जैसे लोग शिवसेना के प्रवक्ता नहीं। हम वैâसे जीएं? यह सवाल महाराष्ट्र के किसानों को परेशान कर रहा है। कपास नहीं, प्याज नहीं, सब्जी नहीं, फल नहीं, ऐसी इन दिनों अवस्था है। बारिश के अभाव में कपास जल गया। प्रति एकड़ ५ से ६ हजार रुपए खर्च हुए मगर हाथ कुछ नहीं आया। ढाई टन प्याज बेचकर हाथ में लागत भी नहीं आई। उल्टे प्याज उत्पादकों की जेब का पैसा खत्म हो रहा है। खेत में श्रम करना और आसमानी सुल्तानी चुनौतियों का मुकाबला करते हुए फसल पैदा करना और जब उसे बेचकर आमदनी प्राप्त करने की बारी आती है तब कृषि उत्पाद को कौड़ियों के मोल बेचने के अलावा किसानों के सामने कोई विकल्प नहीं होता। इसलिए बुआई, बीज, खाद, यातायात खर्च के साथ आमदनी का तालमेल नहीं बैठता। संजय साठे नामक निफाड के किसान ने क्या किया? निफाड बाजार समिति में प्याज को प्रतिकिलो सिर्फ १ रुपए ४० पैसे का दाम मिला। इससे नाराज संजय साठे ने साढ़े ७ क्विंटल प्याज के मिले १ हजार ६४ रुपए को प्रधानमंत्री कोष में भेज दिया। संपूर्ण राज्य की यही तस्वीर है। अब इस किसान का प्याज किस तरह निम्न स्तर का था इसे सिद्ध करने के लिए सरकारी यंत्रणा बेताब है। केंद्र से महाराष्ट्र को सूखे की मदद चाहिए और इसीलिए केंद्रीय दस्ता राज्य में आया हुआ है। किसान हताश है और उसका आक्रोश उद्रेक में न बदले इसीलिए केंद्रीय दस्ते को भारी सुरक्षा प्रदान की गई है। इसका अर्थ ऐसा है कि किसानों में आक्रोश है इसका विश्वास सरकार को है। किसान संतप्त है। वो मन से अशांत है, लेकिन उसकी जीने की इच्छा मर गई है उसी तरह लड़ने की जिद भी खत्म हो गई है। आज तक किसानों ने कम आंदोलन किए क्या? परंतु हाथ में क्या आया, कुछ नहीं। इस बार भी फडणवीस सरकार ने सूखाग्रस्तों के लिए कई घोषणाएं कीं, मगर किसान मरणासन्न अवस्था में हैं। सरकार चलाने के लिए जहां शिर्डी संस्थान से कर्ज लेना पड़ रहा हो, वहां किसानों के सवाल कैसे हल होंगे? केंद्रीय सूखा दस्ते को भी महाराष्ट्र में ‘बॉडीगार्ड’ लेकर घूमना पड़ रहा है। किसन वारे और संजय साठे ये हाशिए की यात्रा है। जिस राह सरकार आई उसी राह अब बारूद बिछा दी गई है।