किसानों की कसक…

देश में अबकी बार मॉनसून सामान्य रहने के आसार हैं लेकिन पिछले २ सालों से मॉनसून सामान्य से थोड़ा कम ही रहा। देश में कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां अकाल की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में उन इलाकों के किसान बदहाल और हताश हैं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके में पिछले कई सालों से बारिश नहीं हुई है। हालांकि गैर सरकारी संगठनों के चलते कई हिस्सों में पानी की कमी महसूस नहीं हो रही, लेकिन ऐसे हालात देश के दूसरे इलाके में नहीं हैं। किसान आंदोलन की आग पूरे देश में फैली हुई है। इस आंदोलन की आग की आंच से केंद्र सरकार इसीलिए बची हुई है क्योंकि यह आंदोलन अलग-अलग राज्यों में टुकड़ों-टुकड़ों में हो रहे हैं। नोटबंदी के चलते किसानों की कमर टूट चुकी थी। यही वजह है कि देश के कमजोर किसान पहले के मुकाबले आर्थिक रूप से और भी ज्यादा कमजोर हुए। फिर कमजोर किसानों ने संगठित होकर अपनी मांग सरकार के समक्ष रखी। पिछले दिनों मुंबई में किसान आंदोलन का जो रूप देखने को मिला, वह इसी का नतीजा था। इस कड़ी में सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि देशभर में कई किसान आंदोलन हुए हैं।
किसानों का सबसे उग्र व व्यापक आंदोलन मध्य प्रदेश में हुआ था। यहां पुलिस ने किसान आंदोलन को दबाने के लिए गोलीबारी की थी, जिसमें ७ किसानों की मौत हुई थी। उस आंदोलन के चलते राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया था लेकिन किन्हीं कारणों से मामला ठंडा पड़ गया। राजस्थान में पिछले साल सितंबर महीने में हजारों किसान एक साथ धरने पर बैठ गए थे। उस आंदोलन में कुछ किसानों ने अपना विरोध प्रकट करने के लिए अपना आधा शरीर खेत के अंदर गाड़ लिया था, वहीं तमिलनाडु के किसान आंदोलन करने दिल्ली पहुंचे थे। आत्महत्या कर चुके किसानों के नर-कंकाल को लेकर इन किसानों ने दिल्ली में आंदोलन किया। तब अप्रैल से लेकर जुलाई महीने तक यह आंदोलन जारी रहा। इसी तरह उत्तर प्रदेश में हजारों किसानों ने योगी आदित्यनाथ के निवास स्थान के बाहर ‘आलू फेंक’ आंदोलन कर अपना विरोध जताया था। इन किसानों का आक्रोश इस बात को लेकर था कि उन्हें आलू की सही कीमत नहीं मिल रही। आंध्र प्रदेश में मिर्ची की फसल चौपट हो जाने से नाराज हजारों किसानों ने सड़क पर उतर कर आंदोलन किया था। दिल्ली में किसानों का एक आंदोलन संयुक्त रूप से भी हुआ। उस किसान आंदोलन में गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कुल १२ राज्यों के किसान शामिल हुए थे। इन सभी किसानों ने दिल्ली में इकट्ठा होकर अपना आक्रोश जताया था। पिछले साल गुजरात में चुनाव था। वहां ऐन चुनाव के वक्त किसानों ने आंदोलन किया था। उस आंदोलन के कारण ग्रामीण इलाकों में भाजपा को राजनीतिक रूप से काफी नुकसान हुआ था।
ताजा मामला महाराष्ट्र का है यहां एक बार फिर किसान आंदोलन ने जोर पकड़ा था, जो मुंबई में आने के बाद फिलहाल शांत है, लेकिन याद रहे यह आंदोलन अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। दरअसल, देवेंद्र फडणवीस सरकार के कार्यकाल में यह दूसरा किसानों का आंदोलन है। पहले आंदोलन में जब राज्य सरकार पर चौतरफा दबाव था तब फडणवीस सरकार ने आनन-फानन में किसानों को कर्जमाफी का वादा तो कर दिया, लेकिन वो वादा पूरा नहीं हो पाया। राज्य सरकार ने जिस तरीके से किसानों का कर्ज माफ किया, उससे किसान अब भी बहुत ही नाराज हैं। खैर, महाराष्ट्र का किसान आंदोलन फिलहाल थम गया है। उन्हें सरकार ने उसी तरह समझा दिया है जैसे मराठाओं और दलितों को समझा लिया था। लेकिन इतिहास को देखें तो पता चलता है कि किसानों के मामलों में सरकार द्वारा किसी भी वादे को अमलीजामा नहीं पहनाया जाता। सरकार की यह अब तक की अनोखी कला ही मानी जाएगी। ६ मार्च से शुरू हुआ किसान आंदोलन मुंबई पहुंचता है तो उससे ठीक पहले यानी ९ मार्च से सरकार द्वारा आंदोलनकारियों की मांग पर विचार करना शुरू होता है। पहली बैठक में ही किसानों की मांगों को पूरा करने का एक लिखित आश्वासन दे दिया जाता है और एक बार फिर एक और किसान आंदोलन सिमट जाता है।
गौर करनेवाली बात यह है कि किसान आंदोलन जिन-जिन राज्यों में हुए उनमें से अधिकांश जगहों पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। क्या इसका मतलब यही निकाला जाए कि भाजपा किसानों की मांग को समझ ही नहीं पा रही है या फिर समझने के बाद भी उसे उलझाए रखने का काम कर रही है! किसानों के मन में तो यही कसक है।
वैसे भी जब तक किसानों का आंदोलन कोई राष्ट्रीय स्वरूप नहीं लेता तब तक इस आंदोलन की गर्मी राष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच पाती है। बहरहाल महाराष्ट्र के किसानों की अनुशासन प्रियता ने सबका मन जीत लिया है। उनके आंदोलन के तरीके की सराहना हो रही है, परंतु इतने तर्कसंगत आंदोलन के बाद आज भी किसानों के हाथ में कुछ भी नहीं आया है। उनके मन में यह कसक कायम घर किए हुए है। देश के अलग-अलग हिस्सों में यदि इसी तरह किसान नाराज होकर आंदोलन करते रहे तो साल २०१९ में भाजपा को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। याद रहे कि गुजरात में भी नर्मदा योजना को मुद्दा बनाकर किसानों को तत्कालीन भाजपा सरकार से विमुख करने में कांग्रेस सफल रही थी। ये कहीं आगे भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर कसक न बन जाए?