किसान तूफान का झटका… थप्पड़ की गूंज

किसानों के एक और झटके ने राज्य के सत्ताधारियों को सीधा कर दिया है। नासिक से निकला हजारों किसानों का तूफान सोमवार को मुंबई से टकराया। उस तूफान के झटके से सरकार रूपी टूटे हुए पत्ते उड़ जाएंगे। आंदोलनकारियों की मांग को मानने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही सरकार के सामने नहीं बचा था। कल तक जो सरकार किसानों के मोर्चे के प्रति सुस्त बैठी थी, वह सोमवार को अचानक ‘संवेदनशील’ हो उठी। मोर्चा निकालनेवाले किसानों का आक्रोश जिनके कानों तक नहीं पहुंच रहा था वे उनकी मांगों के बारे में ‘सकारात्मक’ हो गए। किसानों और मेहनतकशों की जिंदगी को आज तक चौपट करने की कोशिश जिन-जिन लोगों ने की उन सभी को उनके सामने झुकना पड़ा है, यही इतिहास है। किसानों के तूफान के कारण सोमवार को इसी इतिहास की पुनरावृत्ति हुई। आंदोलनकारी किसानों की करीब-करीब सभी मांगें राज्य सरकार ने स्वीकार कर ली हैं। मुख्य बात यह रही कि इस बार सरकार आश्वासन देकर किसानों को टरका नहीं सकी। सभी मांगें तय सीमा में पूर्ण करने के वादे के साथ लिखित स्वरूप में मान्य करनी पड़ी। थोड़े में कहें तो किसान राजा की आक्रामकता का एक कदम आगे बढ़ चुका है और राज्य सरकार को एक कदम पीछे हटना पड़ा है। वन भूमि के अधिकार के बारे में सभी दांवों का निपटारा आगामी ६ महीनों में किया जाएगा, ऐसा स्पष्ट आश्वासन सरकार ने दिया है। २००५ के पहले के सबूत जिनके पास हैं उन्हें पूरी जमीन देने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय का सबसे अधिक लाभ गरीब आदिवासी किसानों को मिलेगा क्योंकि वन अधिकार कानून का लोढ़ा उनकी जिंदगी को कई वर्षों से पीस रहा था। जिन आदिवासियों को अपात्र ठहराया गया है, उनके दांवों का निपटारा भी ६ माह में पूरा किया जाएगा। आदिवासी क्षेत्र के राशन कार्डों को ३ माह में बदला जाएगा और जीर्ण राशन कार्डों के बदले में भी उन्हें ३ से ६ माह में नए राशन कार्ड दिए जाएंगे। इसके अलावा नारपार, पिंजाल, दमनगंगा नदियों के महाराष्ट्र के हिस्से का पानी महाराष्ट्र में ही रोका जाएगा, ‘पेसा’ कानून के तहत अतिअपवादात्मक स्थिति को छोड़कर अन्य निजी और अन्य कामों के लिए भू-संपादन करते समय ग्रामसभा की शर्त को बरकरार रखना, गौ-चरण भूमि पर बने बेघरों के अतिक्रमण को नियमित करना, विदर्भ-मराठवाड़ा के कीटग्रस्त और ओला पीड़ित किसानों को नुकसानभरपाई देने जैसे अन्य निर्णय भी सरकार ने लिए हैं। संपूर्ण कर्जमाफी का सवाल सरकार के ‘ऑनलाइन’ और ‘पारदर्शक’ कोहराम के कारण आज भी जस का तस है। कर्जग्रस्त किसानों का संपूर्ण सातबारा कोरा करने की शिवसेना की मांग का ही ‘ऐतिहासिक’ रूप पिछले वर्ष किसानों की हड़ताल के समय दिखाई दिया था। इस मांग के लिए शिवसेना ने जो संघर्ष किया था, उसी संघर्ष की आंच लगने के बाद सरकार को किसानों की कर्जमाफी की घोषणा करनी पड़ी थी। मगर प्रत्यक्ष रूप से लागू करते समय ‘नियम और शर्तों’ के चलते यह कर्जमाफी एक मजाक बन गई। अब कुछ और कृषि कर्ज का समावेश इस योजना में किया गया है। ३० जून, २०१७ तक के कर्ज माफ होनेवाले हैं और २००९ की बजाय २००१ तक के किसान कर्ज का समावेश कर्जमाफी योजना में शामिल किया जाएगा। अन्य कुछ तकलीफदेह शर्तों को भी शिथिल किया जाएगा इसलिए और हजारों कर्जग्रस्त किसानों को राहत मिल सकेगी। मुंबई से टकराए किसानी तूफान का प्रहार इतना जबरदस्त है। निश्चित समयावधि में काम पूर्ण करने के लिखित आश्वासन देने को सत्ताधारियों को मजबूर कर दिया गया। यह उससे भी बड़ी और दूरगामी सफलता है। किसानों द्वारा मुंबई में आकर मारी गई ‘थप्पड़ की गूंज’ सत्ताधारियों को सदैव स्मरण रहेगी और मेहनतकशों की जिंदगी को बर्बाद करने की कोशिश अब इसके आगे कोई नहीं करेगा। ‘जनता के राजा’ छत्रपति शिवराय का नाम लेकर सत्ता में आए लोगों ने पिछले तीन-साढ़े तीन वर्षों में सिर्पâ घोषणाबाजी की और ‘जनता’ को ही न्याय मांगने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर किया। उन किसान राजाओं द्वारा सत्ताधारियों को दिया गया यह आखिरी मौका है। मांगों की पूर्ति का लिखित आश्वासन आपने दिया है। उसे अब तो निभाओ अन्यथा यह आखिरी मौका ‘आखिरी तृण’ साबित होगा।