" /> कुंभारों का ‘चीनी’ दर्द

कुंभारों का ‘चीनी’ दर्द

मुंबई के धारावी स्थित कुंभारवाड़ा में मिट्टी के दीये, गमले और सजावट की दूसरी चीजें बनती हैं। सालभर लगकर परिवार का हर सदस्य देशभर के लिए दीये बनाता है लेकिन इसके बावजूद इन दीयों से होनेवाली आमदनी से ये लोग अपनी आजीविका नहीं चला पाते। हिंदू त्यौहारों पर विदेशी संस्कृति का प्रभाव और मार्वेâट में चाइनीज आइटम्स आ जाने से इन कुंभारों के सामने और अधिक समस्याएं आ खड़ी हुई हैं।
एक दौर था जब कुंभार दीपावली का बेसब्री से इंतजार करते थे। उस समय मिट्टी के दीयों की मार्वेâट में डिमांड रहती थी। इसी के साथ ही लोग पानी के लिए मटके और मिट्टी से बने लोटे भी खरीदा करते थे। मगर अब बदलते दौर के साथ इन मिट्टी के दीयों और बर्तनों की मांग घट गई है। एक तरफ जहां दीयों की जगह चाइनीज बल्ब और लाइट्स ने ले ली है, जिससे इस समुदाय के लोगों की आजीविका पर असर पड़ रहा है। एक तरफ जहां समय के साथ महंगाई बढ़ती जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ इन लोगों की आय कम होती जा रही है। धारावी स्थित कुंभारवाड़ा में आज से ८७ साल पहले गुजरात के कुंभार विस्थापित होकर धारावी की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने आए थे। १२.५ एकड़ में पैâले इस इलाके को इन कुंभारों ने दीयों का सबसे बड़ा बाजार बना दिया। इसके बावजूद ये लोग अपना जीवन गरीबी में बिता रहे हैं। दीया निर्माण कार्य में पूरा परिवार हाथ बंटाता है। पुरुष सुबह ६ बजे से शाम ७ बजे तक चाक चलाते हैं और महिलाएं मिट्टी का गोला बनाने और दीयों की सजावट कर उनकी मदद करती हैं। रोजाना एक परिवार दो से पांच हजार दीये बना लेता है। स्कूल-कॉलेज से लौटने के बाद बच्चे भी इस कार्य में हाथ बंटाते हैं। इसके बावजूद भी ये लोग पर्याप्त धन नहीं जुटा पाते। धारावी की झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाले इन कुंभारों को पानी, शौचालय और सड़कों को लेकर काफी असुविधाएं होती हैं। ऐसे में इनमें से कई लोग दीये बनाने का काम छोड़कर अन्य कार्यों की तरफ बढ़ रहे हैं।
मैं बचपन से दीया बनाने का कार्य करता हूं। इस कार्य में मेरी पत्नी और बच्चे भी मेरा हाथ बंटाते हैं लेकिन समय के साथ इस काम से आजीविका चलाना मुश्किल हो गया है। मार्वेâट में एक तरफ जहां खरीददारों की कमी है, वहीं दूसरी तरफ जीएसटी से महंगाई भी बढ़ रही है। ऐसे में दीया बनाने से होनेवाली आय से हमारा घर नहीं चल पा रहा। – सुनील कुमावत (निवासी)
दीया बनाने से होनेवाली आय से हमारा घर नहीं चल पाता। इसकी वजह से मैं दूसरे कामों की तलाश कर रहा हूं। मैं अपने बच्चों को आगे पढ़ाना-लिखाना चाहता हूं, ताकि आगे चलकर उन्हें ये कार्य न करना पड़े।
– अमित प्रजापत (निवासी)