कुंभ पर्व और ग्रहों का संयोग

प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह १२ वर्षों के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है। अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चंद्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।
उज्जैन का कुंभ सिंहस्थ कुंभ कहलाता है। सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। जब सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होता है तब उज्जैन में कुंभ लगता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।
१२ वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्र्यंबकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चंद्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं क्योंकि यह योग १२ साल में बनता है।
हरिद्वार का संबंध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है।
प्रमुख शाही स्नान
मकर संक्रांति १५ जनवरी
कुंभ की शुरुआत मकर संक्रांति को पहले स्नान से होगी। इसे शाही स्नान और राजयोगी स्नान भी कहा जाता है। इस दिन संगम, प्रयागराज पर विभिन्न अखाड़ों के संत की पहले शोभा यात्रा निकलेगी और फिर स्नान होगा। माघ महीने के इस पहले दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति भी कहते हैं। लोग इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ दान भी करते हैं।
पौष पूर्णिमा
पौष महीने की १५वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं जो कि इस वर्ष २१ जनवरी को है। इस दिन चांद पूरा निकलता है। इस पूर्णिमा के बाद ही माघ महीने की शुरुआत होती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन विधिपूर्ण तरीके से सुबह स्नान करता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। इस दिन से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत कर दी जाती है। इस दिन संगम पर सुबह स्नान के बाद कुंभ की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन से कल्पवास भी आरंभ हो जाता है।
मौनी अमावस्या
कुंभ मेले में तीसरा स्नान मौनी अमावस्या के दिन किया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थंकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है। इस वर्ष मौनी अमावस्या ४ फरवरी को है।
वसंत पंचमी
पंचाग के अनुसार वसंत पंचमी माघ महीने की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। वसंत पंचमी के दिन से ही वसंत ऋतु शुरू हो जाती है। कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद वसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व  है। पवित्र नदियों के तट और तीर्थस्थानों पर वसंत मेला भी लगता है। इस बार वसंत पंचमी १० फरवरी को है।
माघी पूर्णिमा
वसंत पंचमी के बाद कुंभ मेले में पांचवां स्नान माघी पूर्णिमा को होता है। मान्यता है कि इस दिन सभी हिंदू देवता स्वर्ग से संगम पधारे थे। माघ महीने की पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) को कल्पवास की पूर्णता का पर्व भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन माघी पूर्णिमा समाप्त हो जाती है। इस दिन संगम के तट पर कठिन कल्पवास व्रतधारी स्नान कर उत्साह मनाते हैं। इस दिन गुरु बृहस्पति की पूजा की जाती है। इस वर्ष माघी पूर्णिमा १९ फरवरी को है।
महाशिवरात्रि
कुंभ मेले का आखिरी स्नान महाशिवरात्रि के दिन होता है। इस दिन सभी कल्पवासी अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं। शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतजार रहता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि ४ मार्च को है।
कुंभ : इतिहास के आईने में
कुंभ मेले का आयोजन वैसे तो हजारों साल पहले से हो रहा है। इतिहासकार एस.बी. रॉय ने १० हजार वर्ष ईसा पूर्व अनुष्ठानिक नदी स्नान को स्वसिद्ध किया है लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है, जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होनेवाले कुंभ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है। अंतरजाल पर कुंभ से संबंधित इतिहास ६०० वर्ष ईसा पूर्व बौद्ध लेखों में मिलता है। ४०० वर्ष ईसा पूर्व सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले का वर्णन किया है। रॉय मानते हैं कि मेले के वर्तमान स्वरूप ने इसी काल में स्वरूप लिया था। विभिन्न पुराणों और अन्य प्राचीन मौखिक परंपराओं पर आधारित पाठों में पृथ्वी पर चार विभिन्न स्थानों पर अमृत गिरने का उल्लेख हुआ है। सर्व प्रथम आगम अखाड़े की स्थापना हुई, कालांतर में विखंडन होकर अन्य अखाड़े बने। ५४७ वर्ष ईसा पूर्व अभान नामक सबसे प्रारंभिक अखाड़े का लिखित प्रतिवेदन इसी समय का है जबकि ६०० वर्ष ईसा पूर्व चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा प्रयाग पर सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित कुंभ में स्नान करने का उल्लेख मिलता है।
वर्ष ९०४ में निरंजनी अखाड़े का गठन के २४० वर्ष बाद सन् ११४६ में जूना अखाड़ा अस्तित्व में आया। फिर १,३०० में राजस्थान सेना में कार्यरत कानफटा योगी साधु के उदय का उल्लेख मिलता है।
१३९८ में हरिद्वार कुंभ में तैमूर द्वारा हजारों श्रद्धालुओं का नरसंहार किया गया। इसका उल्लेख १३९८ हरिद्वार महाकुंभ नरसंहार में विस्तार से उपलब्ध है।
१५६५ में मधुसूदन सरस्वती द्वारा दसनामी व्यवस्था की लड़ाका इकाइयों का गठन, जबकि १६७८ -प्रणामी संप्रदाय के प्रवर्तक, महामति श्री प्राणनाथ जी विजयाभिनंद बुद्ध निष्कलंक घोषित किए गए।