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केंद्र पर एक और आफत

केंद्र सरकार के समक्ष एक और बड़ा मसला मुंह खोले खड़ा है। लद्दाख में अपने अधिकृत क्षेत्र में भारत द्वारा सड़क का निर्माण करना चीन को अखर गया है। बनाई गई सड़क पर चीन ने जबरन कब्जा कर लिया है। उनके सैनिकों ने सड़क पर बाकायदा डेरा डाल दिया है, सड़क के बीचो बीच ट्रकों को खड़ा कर दिया है। इसको लेकर दोनों मुल्कों में बेहद तनातनी का माहौल बन गया है। कोई हल निकले इसको लेकर बातचीत का दौर जारी है। शनिवार को सेना प्रमुख भी पहुंचे, नाकाम कोशिश कर वापस आ गए। भारत-चीन के बीच बढ़ी तनातनी में अमेरिका भी कूद गया है, उसकी कोशिश है दोनों मुल्क इस मसले को लेकर भिड़ जाएं। दो पॉवरफुल मुल्कों को आपस में भिड़ाकर, दूर खड़े होकर तमाशा देखने की अपनी पूर्व की हरकतों से अमेरिका कभी बाज नहीं आएगा? जबकि, उनके इस चेहरे से सभी पहले से वाकिफ हैं।
अमेरिका को ये भय हमेशा रहता है कि कोई उसकी बराबरी न कर ले। कमोबेश, ऐसा कोई मुल्क करने की कोशिश करता भी है तो उसे किसी न किसी तरह उलझाना शुरू कर देता है। भारत के साथ भी ऐसा ही करने की फिराक में हैं। लद्दाख मसले को लेकर चीन से बिलावजह भारत को भिड़ाने का पासा फेंका है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भारत-चीन सीमा को लेकर एक ऐसा भड़काऊ और उकसाने वाला बयान दिया है जिससे भारत ताव में आकर चीन पर चढ़ाई कर दे। उसे युद्व के लिए ललकारे? या फिर कोई ऐसी बचकानी हरकत कर दे, जिससे दोनों देशों के बीच नफरत के बीच उग आएं। हालांकि भारत सरकार ने उनके बयान को हल्के में लेकर आया-गया कर दिया। ज्यादा गंभीरता नहीं दिखाई।

गौरतलब है, अमेरिका की उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स ने भारत को उकसाने का काम किया है। उन्होंने कहा है चीन अपनी बढ़ती हुई ताकत का इस्तेमाल दक्षिण चीनी समुद्र और भारतीय सीमाओं पर बहुत ही आक्रामक और उत्तेजक ढंग से कर रहा है। इससे भारत को तुरंत सचेत हो जाना चाहिए। एलिस वेल्स ने हाल ही में भारत-चीन के सैनिकों के बीच बॉर्डर पर हुई हल्की-फुल्की नोकझोंक का भी हवाला दिया। मई के पहले सप्ताह में चीन और भारत के सुरक्षाकर्मियों के बीच सड़क विवाद को लेकर थोड़ी तनातनी हुई थी, जो बाद में सुलझ गई थी। हैसियत में बराबरी की जहां तक बात आती है तो अमेरिका को खतरा सिर्फ भारत और चीन से ही है। क्योंकि दोनों देश हर क्षेत्र में अब सक्षम हैं। दरअसल, दोनों मुल्कों का सक्षम होना ही तो अमेरिका को अखर रहा है। इसलिए वह किसी भी तरह से दोनों के बीच खटास घोलकर आपस में उलझाना चाहता है। पर, भारत सरकार हर बात को गंभीरता से समझती है, वह किसी के बहकावे में नहीं आने वाली, अपने विवेक और ज्ञान से काम लेती है। ये इक्कीसवीं सदी का भारत है।

भारत की हुकूमत इस बात को ठीक से समझती है कि पक्की दोस्ती की दुहाई की आड़ में अमेरिका उनकी घेराबंदी पड़ोसी मुल्कों द्वारा करना चाहता है। तभी तो लिपुलेख क्षेत्र में भारत द्वारा सड़क बनाने को लेकर नेपाल के साथ भी इन दिनों तनाव बढ़ा रहा है। हालांकि इसके पीछे चीन का हाथ बताया जा रहा है। पर, प्रत्यक्ष रूप से करामात अमेरिका की भी है। समय की नजाकत को भांपते हुए भारत सरकार चीन और अमेरिका दोनों से सर्तक है। दोनों मुल्क एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। अपने फायदे के लिए किसी भी हद को पार कर सकते हैं। कोरोना वायरस के संक्रमित आंकड़ों को लेकर वैसे दोनों देशों में आपस में छिड़ी हुई है। इसलिए प्रत्यक्ष तौर से पंगा न लेकर भारत को चीन से भिड़ाना चाहता है अमेरिका।

यह तय है भारत बिलावजह किसी देश से पंगा नहीं लेगा। पंगा लेने की वैसे जरूरत ही नहीं, क्योंकि भारत किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अब समक्ष है। अरूणाचल प्रदेश की सीमा से सटे भारत और चीन के भूभाग में कभी कभार भूल-चूक से और कभी अत्यंत आवश्यक होने पर एक-दूसरे की सीमाओं में दोनों तरफ के सैनिक घुस जाते हैं, जिससे कुछ समय के लिए तनाव जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उसके कुछ मूल कारण भी हैं। भारत और चीन बॉर्डर पर करीब चार हजार किलोमीटर की नियंत्रण-रेखा सीमा है, नियंत्रण सीमाओं में सैनिकों की चहलकदमी होने से दोनों देशों के जवानों में भिड़ंत भी हो जाती हैं। ऐसा आज से नहीं, बल्कि कई सालों से होता आया है।

दरअसल, बॉर्डर इलाके में तीन दर्जन ऐसे स्थान हैं, जिनको लेकर विवाद और जो सामरिक दृष्टि से नाजुक स्थिति एकाध दशकों से बनीं हुई है। अच्छी बात ये है यह विवाद आजतक ज्यादा बढ़ा नहीं। स्थिति नियंत्रण में ही रही, अनियंत्रण कभी नहीं हुई। यदा-कदा जब भी विवादों की लपटें उठी, दोनों देशों की हुकूमतें ने उसे शांत करा लिया। मुठभेड़ या युद्व जैसा माहौल कभी नहीं बना। लेकिन अमेरिका इसी विवाद को लेकर हवा देना चाहता है। अमेरिका किसी भी सूरत में चीन और भारत के बीच खटास पैदा करना चाहता है आपस में भिड़ाना चाहता है। लेकिन भारत समझदारी से काम लेता है, उनके भड़काने वाले बयानों को गंभीरता से नहीं लेता। अमेरिकी के उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स के बयान को भी वैसे ही ले रहा है। भारत अपने पड़ोसी मुल्कों की हर चाल से वाकिफ है। चाहें चीन हो, पाकिस्तान हो या फिर नेपाल का मौजूदा नक्सा विवाद?
भारत सरकार पहले कोई पहल नहीं करेगी। दूसरी तरफ से पहल होते ही मुंह तोड़ जवाब देगी। वैसे, अमेरिकी उप-विदेश मंत्री एलिस वेल्स की बात पर थोड़ा बहुत गौर किया भी जाए तो चीन सैनिकों ने इस साल जनवरी से लेकर पंद्रह मई तक करीब साढ़े तीन सौ दफे सीमा का उल्लंघन किया है। इस बात की आपत्ति केंद्र सरकार द्वारा जताई भी जा चुकी है। फिलहाल इस समय दौलतबेग ओल्डी क्षेत्र में बनी भारत की सड़क को लेकर चीन ने अडंग़ा अड़ाया हुआ है जिसको लेकर भी दोनों देशों में विवाद छिड़ा है। सड़क पर चीनी सैनिकों ने तंबू ताने हुए हैं और आवाजाही रोकी हुई है। सड़क के दोनों तरफ जबरदस्ती अपने फौजी वाहनों को खड़ा किया हुआ है। सड़क के पास ही हमारी सैनिक भी अड़े हुए हैं। दौलतबेग ओल्डी क्षेत्र में बनाई गई सड़क पर चीन का तर्क है कि सड़क उनके अधिकृत क्षेत्र में बनी है। माहौल तनानती वाला बना हुआ। लेकिन दोनों देशों में सुलह को लेकर बातचीत जारी हैं। वैसे ये घटना पाकिस्तान के लिए सीखने जैसी है, गर्माहट होने के बावजूद भी शांति का माहौल है। चीन के जगह अगर पाकिस्तान होता तो धरती को सिर उठाकर संयुक्त राष्टृ से लेकर पता नहीं कहां-कहां रोना रो रहा होता। सब्र और संयम रत्ती भर नहीं है पाकिस्तान के पास।