केंद्र में रुतबा बरकरार रखने की चुनौती

सियासत रूतबे पर निर्भर करती है और यह रुतबा जनसमूह और संगठन से बनता है। पर किन्हीं परिस्थितियों के चलते अगर ये ताकत खत्म हो जाए, तो समझो उसे धरातल पर आने में वक्त नहीं लगता। विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में खासा बदलाव आया है। प्रादेशिक स्तर के कई दल बदलती परिस्थितियों को झेल नहीं पाए, नतीजा क्या हुआ, सबके सामने है। हालांकि कुछ क्षेत्रीय दलों का जलवा पहले जैसा ही कायम है। उनका संगठन अब भी मजबूत है। हिंदुस्थान में ‘चुनावी वसंत’ जैसा माहौल हमेशा रहता है। प्रदेशों के विधानसभा चुनावों से लेकर गांव-देहात के ग्राम पंचायत चुनावों का शोर पूरे साल बना रहता है। कमोबेश, इस समय भी चुनावी माहौल बना हुआ है। अगले चंद दिनों में देश के दो महत्वपूर्ण प्रदेशों के विधानसभा चुनाव के अलावा ६४ उपचुनाव भी होनेवाले हैं। जिसको लेकर मुंबई से दिल्ली तक फिजा सियासी हो गई है। भाजपा सहित सभी पार्टियां अपनी-अपनी जीत को लेकर कमर कस चुकी हैं।
इन दो प्रदेशों के विधानसभा और उपचुनावों को फतह करने की चुनौती क्षेत्रीय पार्टियों से ज्यादा केंद्र सरकार के समक्ष है। यहां अच्छा परफॉर्मेंस होगा, तभी उनका केंद्र में रुतबा बरकरार रहेगा। अक्सर कहा जाता है कि केंद्र सरकार में जिस दल की सरकार होती है उसे अपने कार्यकाल में होनेवाले सभी चुनाव जीतने की चुनौती होती है। क्योंकि इससे उनका दबाव कायम रहता है। अगर खुदा-न-खास्ता मौजूदा केंद्र सरकार इन चुनावों में अच्छा परफॉर्मेंस नहीं कर पाती है तो उसके लिए आगे के रास्ते कठिन होंगे। क्योंकि इन चुनावों के ठीक बाद ही कई अन्य राज्यों में भी चुनाव होने हैं। इसलिए दिल्ली की सियासत के लिए दोनों राज्यों के चुनाव केंद्र सरकार के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं होंगे।
चुनावी स्वरूप अब कुछ दशक पहले जैसा नहीं रहा। खासा बदलाव हो चुका है। सियासी पार्टियां चुनाव जीतने के लिए हर तरकीब अपनाती हैं। आयोग द्वारा तय धन खर्च सीमा से भी कई गुना धन खर्च करती हैं। दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने मौजूदा चुनावों के साथ-साथ आगामी दिल्ली विधानसभा की चुनावी रणनीति भी बनानी शुरू कर दी है। उनके नेताओं ने अभी से केजरीवाल सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। भाजपा ने अरविंद केजरीवाल पर सरकारी धन का फिजूल खर्च करने का आरोप लगाकर सियासत माहौल गर्मा दिया है। इस बाबत बीते दिनों भाजपा का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्य चुनाव आयोग से मिला और केजरीवाल पर सरकारी धन के दुरुपयोग की लिखित शिकायत की। इसके बाद भला केजरीवाल भी चुप बैठनेवाले नहीं थे, उन्होंने भी भाजपा पर लगे हाथ वैसा ही आरोप जड़ दिया। केजरीवाल ने भी मोदी सरकार पर प्रत्येक माह करोड़ों-अरबों रुपए का सरकारी धन खर्च करने का आरोप लगा दिया। खर्च के कई सबूत भी पेश किए हैं। कुलमिलाकर चुनाव से पहले ही सत्तापक्ष और मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा में अभी से तलवारें खिंच गई हैं।
फिलहाल अभी दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुछ माह शेष हैं, लेकिन चुनावों की सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। सभी पार्टियों ने चुनाव प्रचार आरंभ कर दिया है। दीवारों पर पोस्टर चस्पां करने लगे हैं। आम आदमी पार्टी ने अभी से अपने कुछ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। इसलिए उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्रों को चुनावी रंग में रंग दिया है। चुनावों में सभी सियासी पार्टियां बेहताशा धन खर्च करती हैं। वैसे गौर करें तो चुनाव आयोग पर देश में चुनाव करवाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है लेकिन बीते आम चुनाव के पहले आदर्श आचारसंहिता के इतने कथित उल्लंघन हुए हैं कि सवाल पूछे जा रहे हैं कि आखिर आयोग कहां है और क्या उसका हाल किसी ऐसी अप्रभावी संस्था या बिना दांत के शेर जैसा तो नहीं है जिसकी किसी को परवाह नहीं?
भाजपा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए कई टीमों को अभी से सियासी अखाड़े में उतार दिया है। लेकिन बड़े नेताओं का पूरा फोकस महाराष्ट्र, हरियाणा और ६४ उपचुनावों पर है। केंद्र में मोदी सरकार का रुतबा पहले की तरह कायम रहे, इसलिए पार्टी मौजूदा चुनाव प्रतिष्ठा के तौर पर ले रही है। इसलिए दिल्ली की सियासी सेहत के लिए दोनों राज्यों के चुनाव काफी अहम माने जा रहे हैं। क्योंकि यह परिणाम अगले कुछ माह बाद होनेवाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों पर भी प्रत्यक्ष रूप से असर डालने का काम करेंगे। सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी इस सच्चाई से वाकिफ होते हैं कि विधानसभाओं के चुनाव केंद्र सरकार पर कितना प्रभाव डालते हैं। दिल्ली की सियासत पर कुछ राज्यों के चुनावी परिणाम सीधे प्रभाव डालते हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा व बिहार जैसे प्रमुख राज्य हैं।
राजनीति में हमने वह भी वक्त देखा, जब प्रदेश विधानसभा चुनावों में स्थानीय पार्टियां बहुमत या अच्छी सीटें जीतकर आती थीं, तो केंद्र सरकार पर माकूल दबाव बनाया करती थीं। पर, विगत कुछ वर्षों से ऐसा देखने को नहीं मिला। क्षेत्रीय दलों के भीतर पारिवारिक कलह ही इस कदर पैâली हुई है, पहले उससे तो निपट लें। प्रदेशों के बड़े दल जैसे सपा, बसपा, इनेलो, एडीएमके, पीडीपी आदि दल सभी टूट की कगार पर पहुंच गए हैं। टूटने का एक ही कारण सामने निकला, वह है सियासी महत्वाकांक्षाओं का बढ़ना। सपा में चाचा-भतीजे की लड़ाई उसी का प्रतिफल है। लेकिन इन सबके इतर, सियासी दलों के अलावा देश की जनता का ध्यान इन दो राज्यों के विधानसभा चुनाव पर है। चुनाव संपन्न होने के बाद परिणाम भी जल्द आएंगे, तभी पता चलेगा कि इस बार किसकी मनेगी दीवाली और किसका निकलेगा दिवाला?