कैंपस का क्रोध, छात्रों का विरोध

राजधानी दिल्ली की चर्चित जवाहरलाल यूनिवर्सिटी की साख खतरे में है। कन्हैया कुमार प्रकरण से शुरू हुआ हंगामा अभी तक जारी है। लेकिन तब और अब के विरोध के मुद्दे बदले हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में जेएनयू का अपना इतिहास रहा है। देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी डंका बजता है। पर वैंâपस के भीतर जारी लगातार विद्रोह ने बेरंग कर दिया है। इस शिक्षण संस्था में जिन छात्रों को दाखिला मिलता है वे खुद को भाग्यशाली समझते हैं। अपने लिए लाइफटाइम अचीवमेंट जैसा मानते हैं। इस वक्त करीब साढ़े सात हजार छात्र वहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जिनमें से मात्र ढाई-तीन सौ छात्र ऐसे हैं, जो बवाल काट रहे हैं। ये छात्र दो गुटों में बंटे हुए हैं। पहला गुट एबीवीपी का, दूसरा गुट वामपंथ का है। दोनों के बीच लड़ाई वैंâपस से शुरू होकर अब सड़कों तक पहुंच गई है। इनके बीच भड़की क्रोध की चिंगारी में अब राष्ट्रीय स्तर की सियासत ने भी छलांग लगा दी है। एबीवीपी के साथ जहां सरकार खड़ी है, वहीं वामपंथी छात्र संगठनों के पक्ष में पूरा विपक्ष खड़ा है।
छात्रों की लड़ाई जेएनयू में फीस बढ़ोतरी को लेकर थी लेकिन जब पीछे से सियासी दलों ने उनके मूवमेंट को हवा दी, लड़ाई सीएए में परिवर्तित हो गई। राजनेता खुद पीछे हैं, छात्र आगे हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीख का एलान हो चुका है। दिल्ली की तीनों प्रमुख पार्टियों ने जेएनयू प्रकरण को चुनावी मुद्दा भी बना दिया है। आम आदमी पार्टी की मांग है कि जेएनयू की देख-रेख उनकी सरकार के अधीन कर दी जाए, वह अपने हिसाब से चला लेंगे। वहीं छात्रों के मौजूदा हंगामे को कांग्रेस ने भाजपा के सिर मढ़ दिया है। उनका कहना है, जो कुछ हुआ उसे भाजपा ने कराया। इसके बाद भाजपा भी भला पीछे क्यों रहे। उसने भी कांग्रेस को कटघरे में लिया है। भाजपा के बड़े नेताओं ने कहा है कि कांग्रेस जेएनयू की आड़ में दिल्ली चुनाव में उतरना चाहती है। लेकिन कुछ भी हो, जेएनयू के मौजूदा घटनाक्रम ने पूरे देश का मन व्यथित जरूर कर दिया है। हंगामे को देखते हुए छात्र अपने घरों को लौट रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। चिंता होनी भी चाहिए। क्योंकि जिस तरह से बच्चों के चोटिल होने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वारयल हो रही हैं, उसे देखकर कोई भी विचलित हो जाएगा।
यूनिवर्सिटी के खिलाफ कौन जहर घोल रहा है, शायद बताने की जरूरत नहीं? सबके सामने है। लेकिन पुलिस की कार्रवाई गेंद की भांति इधर-उधर घूूम रही है। खुलेआम नकाबपोश गुंडे अंदर घुसते हैं, उनकी तस्वीरें सीसीटीवी वैâमरों में वैâद हो जाती हैं। बावजूद इसके पुलिस खाली रहती है। हालांकि पुलिस अब किसी नतीजे पर पहुंचती दिखाई पड़ रही है लेकिन कुछ राज ऐसे हैं जिनका वह खुलासा नहीं कर पाएगी। जेएनयू के भीतर गुंडे करीब तीन-चार घंटों तक हंगामा काटते रहे। कॉलेज प्रशासन मूक-बधिर बनकर तमाशा देखता रहा। उस समय वीसी भी अपने कार्यालय में मौजूद थे। जेएनयू प्रकरण को मीडिया में जिस तरह से परोसा है, दरअसल उसके पीछे की हकीकत कुछ और ही है। हकीकत निसंदेह सत्ता पोषित है।
गौरतलब है कि हमले की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। जेएनयू का तमाशा समूची दुनिया देख रही है। संस्था में कई मुल्कों के छात्र पढ़ाई करते हैं। घटना के बाद ज्यादातर बच्चे अपने देश चले गए हैं जबकि परीक्षाएं शुरू होनेवाली हैं। जेएनयू के बाद देश की दूसरी यूनिवर्सिटीज के छात्रों में भी बेचैनी पैâली है। जेएनयू कांड से ऐसा प्रतीत होता है कि देश की व्यवस्था को नीचे धकेलने की कोशिश हो रही है। मौजूदा सियासत लकवे से ग्रस्त हो गई है। नीति और नीयत में फर्क होता है। नीतियां बेशक जनकल्याणकारी हों लेकिन उसे लागू करने के लिए नीयत का पाक होना जरूरी होता है। किसी मुद्दे पर विरोध करना जनमानस का मौलिक अधिकार होता है। लेकिन ये अधिकार शायद हुकूमतों को अब अखरने लगा है। सीएए के खिलाफ देशभर में हो रहा विरोध उसका परिचायक है। जनमानस का इस जनआंदोलन के पीछे चलना मजबूरी है। लेकिन केंद्र सरकार को लगता है कि वह अपनी जगह ठीक है। यही कारण है कि उन्होंने भारी विरोध के बीच कानून को लागू भी कर दिया। पर विरोध अब भी जारी है। सरकार किसी भी सूरत में इस मूवमेंट को शांत करवाना चाहती है।
बहरहाल धीरे-धीरे जेएनयू की घटना की असल सच्चाई सामने आनी शुरू हो गई है। पुलिस के हाथ फिलहाल काफी कुछ लगा है। उनकी रिपोर्ट पर गौर करें तो वामपंथी समूहों ने पहले कक्षा, परीक्षा, रजिस्ट्रेशन का बहिष्कार किया। छात्रों से आह्वान किया कि वे अगले सेमेस्टर के लिए पंजीकरण न करें, सरकार के खिलाफ अपना विरोध जारी रखें। उन्होंने छात्रों को यह भी चेतावनी दी कि अगर जो छात्र ऐसा नहीं करेगा, वह अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे। वामपंथी गुटों के इस फरमान की भनक जब एबीवीपी का हुई तो उन्होंने विरोध किया। नहीं माने तो दोनों गुटों में जमकर टकराव हुआ। उस प्रकरण के बाद से ही जेएनयू वैंâपस का माहौल डरावना हुआ है। अब चुनौती जेएनयू प्रशासन की है। वह उत्पन्न हुए विद्रोह को तुरंत शांत कराए, बच्चों को दोबारा से पढ़ाई की तरफ लाए, क्योंकि अगले माह नया सत्र शुरू होगा। जेएनयू में बेहद गरीब तबके के बच्चे पढ़ाई करते हैं। उनके परिजनों की बड़ी ख्वाहिशें और उम्मीदें होती हैं। वह जिंदा रहनी चाहिए। गंदी सियासत में शिक्षण संस्थाओं और छात्रों को नहीं झोंकना चाहिए।