" /> कैग की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा, सरकारी स्कूल बने गंदगी के ढेर!, ७५% टॉयलेट की नहीं होती सफाई

कैग की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा, सरकारी स्कूल बने गंदगी के ढेर!, ७५% टॉयलेट की नहीं होती सफाई

देश के बचपन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का पाठ पढ़ाने की जिम्मेदारी रखनेवाले सरकारी स्कूल खुद ही गंदगी का ढेर बने हुए हैं। १५ राज्यों के ७५ फीसदी सरकारी स्कूलों के टॉयलेट में साफ-सफाई के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने की बात नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (वैâग) ने बुधवार को संसद में पेश की गई ऑडिट रिपोर्ट में कही है।
इतना ही नहीं केंद्रीय सरकारी कंपनियों (पीएसयू) की तरफ से स्कूलों में बनवाए गए ११ फीसदी टॉयलेट अपनी जगह से ‘गायब’ मिले हैं यानी इनका निर्माण केवल कागजों में ही कर दिया गया, जबकि ३० फीसदी टॉयलेट संचालित ही नहीं किए जा रहे। वैâग ने दरअसल १५ राज्यों के २,०४८ स्कूलों के उन २,६९५ टॉयलेट का ऑडिट किया है। ये टॉयलेट २०१४ में शिक्षा मंत्रालय की अपील पर चार मंत्रालयों की सरकारी कंपनियों की तरफ से निर्मित कराए गए १,३०,७०३ टॉयलेट में से एक थे। इन टॉयलेट का निर्माण २,१६२ करोड़ रुपए की लागत से कराया गया था।
रिपोर्ट के मुताबिक सर्वे के दौरान २,३२६ स्कूली टॉयलेट में से १,८१२ बुरी तरह गंदे पाए गए। दिन में कम से कम एक बार सफाई के मानक के विपरीत इन १,८१२ में से ७१५ टॉयलेट बिल्कुल भी साफ नहीं किए जाते जबकि १,०९७ टॉयलेट में सप्ताह में दो बार से लेकर महीने में एक बार तक सफाई की जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक २०० टॉयलेट महज कागजों में ही बना दिए गए जबकि ८६ का आंशिक निर्माण किया गया। ऐसे ८३ टॉयलेट मिले, जिनका निर्माण पहले ही किसी अन्य योजना में हो चुका था। यह निर्माण अभियान लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट के लक्ष्य के तहत चलाया गया था लेकिन वैâग रिपोर्ट के मुताबिक ९९ स्कूलों में कोई टॉयलेट नहीं चल रहा तो ४३६ स्कूल में एक ही टॉयलेट का उपयोग हो रहा है यानी २७ फीसदी स्कूलों में अब भी लड़के-लड़कियों के अलग-अलग टॉयलेट नहीं हैं।
सर्वे में ७२ फीसदी यानी १,६७९ स्कूलों में टॉयलेट जाने के बाद सफाई के लिए पानी की सुविधा ही मौजूद नहीं मिली जबकि ५५ फीसदी यानी १,२७९ स्कूलों में हाथ धोने के लिए साबुन या अलग से पानी नहीं मिलता।