कैसा समाज बनाएंगे हम?

क्या कानून की जवाबदेही केवल देश के संविधान के ही प्रति है? क्या सभ्यता और नैतिकता के प्रति कानून जवाबदेह नहीं है? क्या ऐसा भी हो सकता है कि एक व्यक्ति का आचरण कानून के दायरे में तो आता हो लेकिन नैतिकता के नहीं?
 दरअसल माननीय न्यायालय के हाल के कुछ आदेशों ने ऐसा ही कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया। उदाहरणार्थ धारा ४९७ को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हाल के निर्णय को ही लें। निर्णय का सार यह है कि व्यभिचार अब अपराध की श्रेणी में नहीं है।
‘व्यभिचार’ अर्थात परस्त्रीगमन, जिसे आप दुराचार यानी बुरा आचरण, दुष्ट आचरण, अनैतिक आचरण कुछ भी कह सकते हैं लेकिन एक गैरकानूनी आचरण कतई नहीं। क्योंकि कोर्ट का मानना है कि स्त्री पति की संपत्ति नहीं है। विवाह के बाद महिला की ‘सेक्सुअल चॉइस’ को रोका नहीं जा सकता है, जिसके कारण धारा ४९७ असंवैधानिक भी है। इसलिए औपनिवेशिक काल के इस लगभग १५० साल पुराने कानून का अब कोई औचित्य नहीं है। न्यायालय के इस ताजा फैसले के अनुसार आपसी सहमति से विवाह नामक संस्था के बाहर, दो वयस्कों के बीच का संबंध अब ‘अपराध’ नहीं है लेकिन तलाक का आधार अब भी है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दिए गए कोर्ट के इस आदेश ने भारत जैसे देश में बड़ी ही विचित्र स्थिति उत्पन्न कर दी है। क्योंकि ‘विवाह’, यह भारतीय संस्कृति में वेस्टर्न कल्चर की तरह जीवन में घटित होनेवाली एक घटना मात्र नहीं है और न ही यह केवल एक स्त्री और पुरुष के बीच अपनी-अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने का साधन है। सनातन परंपरा में यह एक संस्कार है। जीवन के चार पुरुषार्थों को हासिल करने की एक आध्यात्मिक साधना जिसे पति-पत्नी एक साथ मिलकर पूर्ण करते हैं। यह एक ऐसा पवित्र बंधन है जो तीन स्तंभों पर टिका है रति, धर्म और प्रजा (संतान)। जीवन के चार आश्रमों ‘ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास’ में से एक महत्वपूर्ण आश्रम ‘गृहस्थ’, जिसका लक्ष्य शेष आश्रमों के साधकों के प्रति अपने दायित्वों का एक-दूसरे के साथ मिलकर निर्वाह करना एवं संतानोत्पत्ति के द्वारा एक ‘श्रेष्ठ’ नई पीढ़ी को तैयार करना एवं पितृ ऋण को चुकाना होता है। सनातन संस्कृति में यह सभी संस्कार या कर्म जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करने का मार्ग होते हैं क्योंकि जब हम मोक्ष की राह, ‘धर्म अर्थ काम मोक्ष’ इन चार पुरुषार्थों की बात करते हैं तो यह समझना बेहद आवश्यक होता है कि यहां धर्म का अर्थ रिलिजिन न होकर ‘धार्यते इति धर्म:’ अर्थात धारण करने योग्य आचरण या व्यवहार है और इसलिए यहां धर्म केवल इन चार पुरुषार्थों में से एक पुरूषार्थ न होकर चारों पुरुषार्थों का मूल है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए धर्म का पालन जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है। अत: धर्म (आचरण) धर्मयुक्त हो, अर्थ यानी पैसा भी धर्मयुक्त हो, और काम अर्थात कामवासना की पूर्ति भी धर्मयुक्त हो तभी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। इस प्रकार से विवाह (वि, वाह) अर्थात एक ऐसा बंधन होता जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर सृष्टि के प्रति अपनी विशेष जिम्मेदारियों का वहन करते हैं। लेकिन इस सबसे परे जब आज कोर्ट यह आदेश सुनाता है कि आपसी रजामंदी से दो वयस्कों द्वारा किया जानेवाला एक कृत्य जो दुनिया की किसी भी सभ्यता में ‘नैतिक’ कत्तई नहीं कहा जा सकता, अब अवैध नहीं है। इसे क्या कहा जाए?
माननीय न्यायालय की स्मृति में विश्व के वे देश आए जहां व्यभिचार अपराध नहीं है लेकिन उनकी स्मृति में हमारे शास्त्र नहीं आए जो इस अपराध के लिए स्त्री और पुरुष दोनों को बराबर का दोषी भी मानते हैं और दोनों ही के लिए कठोर सजा और प्रायश्चित का प्रावधान भी देते हैं। हमारी अनेक पुरातन कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि इस प्रकार के अनैतिक आचरण का दंड देवताओं और भगवान को भी भोगना पड़ता है। प्रायश्चित करना पड़ता है। अपने अनैतिक आचरण के कारण इंद्रदेव को गौतम ऋषि के श्राप का सामना करना पड़ा था। विष्णु भगवान को पत्थर बनना पड़ा था और जगत पिता होने के बावजूद ब्रह्मा की पूजा नहीं की जाती। इन कथाओं से एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की गई है कि इस सृष्टि में सर्व शक्तिमान भी कुछ नियमों से बंधे हैं और नैतिकता का पालन उन्हें भी करना पड़ता है नहीं तो दंड उन्हें भी दिया जाता है। प्रायश्चित वे भी करते हैं।
 माननीय न्यायालय की स्मृति में ब्रिटिश मुख्य न्यायाधीश जॉन हॉल्ट का १७०७ का वो कथन भी नहीं आया, जिसमें उन्होंने व्यभिचार को हत्या के बाद सबसे गंभीर अपराध बताया था।
हां, चाहे पुरुष करे या स्त्री, ये अपराध है और बहुत गंभीर अपराध है। क्योंकि इसका परिणाम केवल दो लोगों के जीवन पर नहीं पूरे परिवार के आस्तित्व पर पड़ता है (कोर्ट ने इसे तलाक का आधार मानकर स्वयं इस बात को स्वीकार किया है)। जिसका असर बच्चों के व्यक्तित्व पर पड़ता है। ऐसे टूटे परिवारों के बच्चे कल कैसे वयस्क बनेंगें और कैसा समाज बनाएंगे?
इन सब तथ्यों की अनदेखी करते हुए जब हमारे न्यायालय इस प्रकार के मामलों में त्वरित फैसले सुनाते हैं (धारा ४९७, केस २०१७ की दिसंबर में दर्ज हुआ, फैसला सितंबर २०१८, सबरीमाला केस २००६ में दर्ज हुआ, फैसला २०१८ और शनिशिंगणापुर केस जनवरी २०१६ में  दर्ज हुआ, फैसला अप्रैल २०१६ के द्वारा महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे देते हैं) लेकिन राममंदिर मुद्दे की सुनवाई टल जाती है तो देश का आम आदमी बहुत कुछ सोचने के लिए विवश हो जाता है।