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कोरोनामिक्स: उम्मीद का नया अर्थशास्त्र!

कोरोना महामारी केवल कुछ समय के लिए अर्थशास्त्र की दशा को बदलने नहीं जा रही है , यह कोरोना का नया इकोनॉमिक्स बनाने जा रही है कोरोनामिक्स। यह कोरोनामिक्स अर्थव्यवस्था पर तब तक शासन करेगा जब तक कि इसके लिए दवा न विकसित हो जाए हो और लोगों के दिल में  जैविक युद्ध की आशंका न खत्म हो जाए। इस कोरोनामिक्स को जानने के लिए आइए कोरोना महामारी के कुछ तथ्य पर चर्चा करते हैं । आज आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री नहीं के बराबर है, इसलिए जीडीपी लगभग शून्य और विकास नकारात्मक है। लगभग सभी व्यवसाय आवश्यक सामान के उद्योग को छोड़कर सकल हानि का सामना कर रहे हैं। आपूर्ति श्रृंखला अंतिम छोर तक प्रभावित है। विश्व बैंक ने भी कह दिया कि जीडीपी भारत और संपूर्ण एशिया के लिए शून्य होगा। अगले साल की विकास दर १.८ प्रतिशत आंकी गई और यदि ७ प्रतिशत की विकास दर चाहिए तो लगातार तीन वर्ष तक  ८.५ प्रतिशत की उच्च विकास दर चाहिए होंगे। दुनिया भर में १६० करोड़ लोगों के बेरोजगारी का अनुमान लगाया जा रहा है. भारत में ११ करोड़ एमएसएमई प्रभावित हैं। सभी सरकारी लक्ष्य और रेटिंग समाप्त हो गए हैं। सभी बजट आवंटन पूरे नहीं किए जा पा रहे हैं सारा फोकस स्वास्थ्य इन्प्रâा पर आ गया है। भारत में प्रति दिन नुकसान ४.५ बिलियन डॉलर हो गया है और लॉकडाउन एक में जहाँ उच्च स्तर के बिजनेस एविएशन और हॉस्पिटैलिटी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं तो अंतिम स्तर पर नाई और सैलून बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हालाँकि ये तथ्य हमें नकारात्मक संकेत देते हैं लेकिन फिर भी, भारत के लिए बहुत सारी उम्मीदें और सकारात्मक संकेत हैं। शेष विश्व की तुलना में भारत में आबादी के आकार और जटिल संरचना के अनुपात में प्रसार और मृत्यु की दर धीमी है। हालांकि संक्रमण का सम्पूर्ण स्तर पर परीक्षण और मापन नहीं हो पाया है तिस पर भी मृत्यु औसत दर से बहुत कम और नियंत्रण में है शेष विश्व के मुकाबले. भारत में परीक्षण की कमी के कारण एक बड़ी आबादी बड़े पैमाने पर संक्रमण से अनजान हैं, टेस्ट नहीं हो पा रहें हैं लेकिन लगभग हर शहरी मृत्यु रिकॉर्ड में हैं और फिर भी कोरोना से मृत्यु बहुत कम है, कारण भारतीयों की प्रतिरक्षा प्रणाली अच्छी तरह से लड़ रही है।
अर्थव्यवस्था और समाज के लिए, यह उछाल लेकर वापसी करने का समय है विशेषकर  उनके लिए जो विकास की दौड़ से वंचित और पिछड़ गए थे. इस संकट ने नए नेतृत्व विकास को उभरने के लिए भी एक जगह बनाई है, यह व्यक्तिगत स्तर पर भी लागू है और वैश्विक स्तर पर भी।  पृथ्वी और अर्थव्यवस्था दोनों रीसेट मोड में हैं, यह परिवर्तन विकास की दौड़ में पिछड़ गए और वंचित रह गए आबादी को अधिक संभावना देगी , यह उनके लिए अवसर हो सकता है। कौशल के विकेंद्रीकरण से क़स्बे के स्तर पर आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी और पूरे भारत में समान गति और स्तर से  विकास संभव होगा और आर्थिक तानाबाना मजबूत होगा। नौकरी से निकाल दिए गए लोग स्वरोजगार शुरू करेंगे और वे सलाहकार पेशेवरों जैसे की सीए,अधिवक्ताओं और अन्य सेवा प्रदाताओं के लिए अवसर पैदा करेंगे। बैंक और वित्तीय संस्थान और ऋण देने के लिए मजबूर होंगी क्योंकि इस अवधि के दौरान ऋण वितरण नहीं हो पाया है। सरकार एमएसएमई और प्रभावित क्षेत्र को कई पैकेज देगी। सरकारी खरीद और व्यय में वृद्धि होगी।भारत विश्व में पुनः आउटसोर्सिंग हब हो सकता है। आउटसोर्सिंग के लिए  लिस्टिंग पहले से ही इस प्रक्रिया में है जिसमें कौन सा काम काम घर से और कौन सा हाइब्रिड सिस्टम में हो सकता है इसपर मंथन चालू हो गया है, यह बदलाव ऑपरेटिंग लागत को कम करेगा और लाभ बढ़ाएगा। लॉकडाउन में घटे वेतन और आय ने बचत की आदत और फालतू खर्चों में कमी की आदत डाल दी है।
वैश्विक स्तर पर, खरीदार पहले से ही भारत से चीनी मिट्टी के बरतन, घर, फैशन और जीवन शैली के सामानों की खरीददारी कर रहें हैं और अब यह गति बढ़ेगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकल्प के रूप में  भारत कच्चे माल और निर्मित वस्तुओं के आपूर्तिकर्ता के रूप में कई व्यापार चैनलों में प्रवेश कर सकता है। बदलती विश्व अर्थगति और नई अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला मॉडल में, भारत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत चीन से निकल रहे और लगभग एक हजार विदेशी निर्माताओं को भारत में उत्पादन संयत्र को स्थानांतरित करने के लिए आमंत्रित करने में लगा है। वे भारत को चीन के विकल्प के रूप में देख भी रहें हैं। कथित तौर पर, कम से कम ३०० कंपनिया पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा और कपड़ा सहित कई क्षेत्रों में उत्पादन के लिए भारत सरकार के साथ बात कर रहीं हैं । विनिर्माण सुविधाओं के वृद्धि होने पर आसपास ढांचागत विकास , स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। इस वर्ष, सरकार ३०० से अधिक उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने का सोच रही  है, और ऐसे देशों को चिन्हित कर रही है जो करीब १००० वस्तुओं की आपूर्ति के लिए चीन से इतर सोच रहें हैं । महामारी ने उपभोक्ता मनोविज्ञान में भी बदलाव किया है, और यह बाजार के प्रति , विशेष रूप से चीन और उसके उत्पादों के प्रति एक परिवर्तित व्यवहार सामने लायेगा ।इससे  कोई इनकार नहीं कर रहा है कि महामारी को देखते हुए, आपूर्ति श्रृंखला पर सबसे बड़ी मार पड़ी है और भारत को इस वैश्विक शून्य को भरने के लिए छलांग लगाने से पहले अपनी निर्भरता को चीन पर से काफी कम करना होगा क्यों कि लंबे समय से, चीन विभिन्न वस्तुवों के लिए भारत की आयात सूची में सबसे ऊपर है।
कोरोना काल के बाद  सेक्टरों के विकास, पहले से स्थापित कई नकारात्मकताओं को प्रतिस्थापित करेंगे और पूर्व निर्मित विकास के अंतर को भरेंगे।इस दौर के बाद एग्रो इकोनॉमी ही विश्व स्तर पर लीड करेगी, इस दौर में लोगों ने आवश्यक खाद्य पदार्थों, प्रिवेंटिव स्वास्थ्य बाजार (आयुर्वेद, योग और होमियोपैथ) को महसूस किया है और यह इस सेगमेंट के लिए एक अवसर होगा। आर्थिक गतिविधियों के विकेंद्रीकरण से माइक्रो सेक्टर बढ़ेगा और नए और पहले से अधिक मजबूत आर्थिक ताने-बाने का निर्माण होगा। हेल्थ इन्प्रâास्ट्रक्चर और ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक सेक्टर में वृद्धि होगी। एविएशन हॉस्पिटैलिटी एवं एंटरटेनमेंट सेक्टर प्रभावित होगा जहां भीड़ ज्यादे  होती है लेकिन पोजिटिव यह है की लोग मनोरंजन के अन्य माध्यमों की ओर रुख करेंगे और उद्योग उस ओर बढ़ेगा। हां, एविएशन और हाई-क्लास हॉस्पिटैलिटी सेक्टर को कोरोना के बाद संभलने और पुनः पूर्व आकार  लेने में समय लगेगा।
यह भी स्पष्ट है की  विश्व स्तर पर बदल रही गतिशीलता में चीन पर निर्भरता शायद खत्म हो रही है, आशंका है की उसका दबदबा खत्म करने या कोरोना के दंड के रूप में चीन पर परमाणु बम से हमला हो जाए या चीन को तोड़ने के लिए साइलेंट हमला हो या शीत युद्ध जैसी परिस्थितियां हो जाए, हालाँकि ये सब अतिवाद संभावनाएं हैं फिर भी दुनिया की शीर्ष १० अर्थव्यवस्था की लिस्ट बदलेगी और कुछ नए देश आयंगे और पुराने जायेंगे । संयुक्त राष्ट्र और डब्ल्यूएचओ की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी
उपरोक्त सभी सकारात्मक आशाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। एमएसएमई से सरकारी खरीद को बढ़ाकर ५० प्रतिशत  किया जाना चाहिए और इसमें से भी ५० प्रतिशत माइक्रो सेक्टर से खरीदना चाहिए। एमएसएमई को तीन-भाग सूक्ष्म, लघु और मध्यम में अलग-अलग तीन प्रकोष्ठ के नेतृत्व में विभाजित करना चाहिए ताकि माइक्रो के साथ न्याय हो सके। सरकार को अंतिम स्तर पर बिक्री संभव बनाने और खपत बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। बैंक के लाभ की समीक्षा की आवश्यकता है और बैंक ब्याज और बैंक शुल्क में कमी इस समय की मांग है। कम ब्याज दर के साथ अधिस्थगन की अवधि और सभी इन्प्रâास्ट्रक्चर खर्च बढ़ाए जाने चाहिए । बजट की बात करें तो कोरोना के कारण अधिकांश बजट आवंटन बदल जायेगा और यह अब मानव संसाधन के बचाव, विकास एवं स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे के विकास पर स्थानांतरित हो जाएगा।  पारित किए गए सभी बजट और सरकारी खर्चों की समीक्षा, पुनर्गणना और फिर से नवीन आवंटन किया जाना चाहिए क्यूँ की इस कोरोना ने बजट के खर्चों की प्राथमिकता और उनकी अवधि मटेरियल रूप से बदल दी है।
व्यक्तिगत स्तर पर भी हमारे पास करने को कई चीजें हैं और अवसर भी हैं । हम अपने लंबे समय से लंबित स्वास्थ्य योजना को पूरा कर सकते हैं। हम उन सभी कार्यों को पूरा कर सकते हैं जो कार्यालय जाने या काम में व्यस्त रहने के कारण टालते आये थे। अब हम व्यय पुनर्गठन और लागत में कमी को संभव कर सकते हैं । मध्यम वर्ग कोरोना के बहाने ही भव्य और अनावश्यक खर्च को कम कर सकता है। लगातार लॉकडाउन ने हमें अनुशासन सीखा दिया है हम लॉकडाउन के दिशानिर्देशों और कोरोना के बाद आने वाले आर्थिक पर्यावरण के अनुसार काम का पुनर्गठन कर सकते हैं। इस कोरोनामिक्स से लड़ने के लिए हमें अपने व्यावसायिक रणनीति में सभी सीमाओं, शर्म और अहंकार को भी खोलना चाहिए । कोरोनामिक्स के इन अनुप्रयोगों  से हम अर्थव्यवस्था और मानव जीवन के दुश्मन कोविड १९ को हरा सकते हैं।