" /> कोरोना ‘एटम बम’

कोरोना ‘एटम बम’

कोरोना ‘एटम बम’
कोरोना प्रकृति की शक्ति का नमूना है।
कोरोना प्रकृति निमित्त ‘एटम बम’ है।।
कोरोना से विश्व के बलशाली नेता और
प्रजा भयभीत हैं।
कोरोना से सीखना है हमसे ताकतवर
प्रकृति है न कि हम मनुष्य।।
कोरोना ने याद दिलाया है कि हे मानव।
अभी भी चेत जा और अहंकार को त्याग कर।।
मानवीय रिश्तों को सुधार ले
कोरोना विश्व व्यापी महामारी बन चुका है।
कोरोना से हमारी सुरक्षा होए।
ऐसी ईश्वर से सतत प्रार्थना होए।।
कोरोना एक ऐसा अदृश्य जंतु का पैâलाव है।
जिसे दूरबीन से भी नहीं देखा जा सकता।।
कोरोना से भयभीत न होकर
सुरक्षा के इंतजाम करना है।
कोरोना से ये सुंदर पंक्ति याद आ रही है।।
हे प्रभु तेरी निराली शान है।
आंखवाले को तेरी पहचान है।।
कोरोना, स्वाइन फ्लू व अन्य बीमारियों का
हमारे सुंदर स्वच्छ भारत में आयात होता है।
यह हमारा दुर्भाग्य है प्रभु इससे पार लगाएंगे।।
-आर.डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’,
खेतवाड़ी, मुंबई

प्रभु कुछ करो न!
निर्दोष कटते-मरते जीव बोले प्रभु कुछ करो न,
हम बेमौत मर रहे हैं प्रभु कुछ करो न,
प्रभु बोले शांत बैठो करेगा यही करो न,
अब ये तुमसे डरेंगे अब इनसे डरो न,
आ गया कोरोना इंसा बोले प्रभु कुछ करो न,
इस बीमारी से हमको यूं बेमौत मारो न,
ऊपरवाले की महिमा भी अजब निराली है,
कोरोना ने करोडों जीवों की जान बचा ली है,
अब भी वक्त है कहो ओम जय श्रीराम,
वर्ना बेवक्त पहुंच जाएगा यम के धाम,
ईश्वर सब समझ गया पर समझा न पाया,
कोरोना के डर से दिखे सबको मौत की छाया,
बचना है कोरोना से तो जप, तप, धर्म करो न,
छोड़ो हिंसा-पाप अब बहुत हुआ अब कोरोना।।
-ईश्वर लाल चौहान, मुंबई

तैयारी
इतने दिन से लगे हुए तुम,
तैयारी में कसर न बाकी।
आई घड़ी परीक्षा की अब,
तनिक और थोड़ा-सा साथी।
सबकी आंखें तुम्हें निहारें,
सपने देख रही हैं सारी।
हमें पता है फतह करोगे,
दिन-रातों की है तैयारी।
लगे रहो और हार न मानो,
न समझो इसको तुम भारी।
समझ-समझकर लिखना उत्तर,
रहे बनावट प्यारी-प्यारी।।
यही सोच रखो हरदम की,
मेहनत का फल मीठा होता।
मेहनत से जो जान चुराए,
सदा-सदा जीवन-भर रोता।।
जीवन के फलसफा को समझा,
जिसने जीत उसी का भाई।
रहा किनारे जो बुत बैठा,
नापेगा वह क्या गहराई?
एक वृत्ति यह ध्यान में रखो,
लक्ष्य बड़ा पर लगन हो भाई।
तो मंजिल ऊंची ही सही,
पा सकते हो शीर्ष ऊंचाई।
इतने दिन से लगे हुए तुम,
तैयारी में कसर न बाकी।
आई घड़ी परीक्षा की अब,
तनिक और थोड़ा-सा साथी।
– विद्यासागर यादव,
सानपाड़ा, नई मुंबई

गम का सागर
बेबस डूबता गम के सागर में है।
वो ही होगा लिखा जो मुकद्दर में है।
मेरे महबूब के रूप को मात दे
कोई ऐसा सितारा न अंबर में है।
शेर कहने का जिनको सलीका नहीं
नाम उनका भी अब तो सुखनवर में है।
जख्म देती चली जा रही जिंदगी
जोर कितना न जाने सितमगर में है।
सारी दुनिया में हम ढूंढ़ते हैं जिसे
वो सुकून चैन तो अपने ही घर में है।
प्यार-इकरार से आगे बढ़ने लगी
शायरी अब नए इश्क कलेवर में है।
जितनी ममता है माता के दिल में भरी
जल कहां उतना ‘हीरा’ समंदर में है।
-हीरालाल, मालाड, मुंबई