" /> कोरोना को धार्मिक चश्मे से न देखें!

कोरोना को धार्मिक चश्मे से न देखें!

सोशल मीडिया पर अनेक समूहों में बने रहने के ढेर सारे नुकसान तो हैं, लेकिन बहुत सारे फायदे भी हैं। समाज में घटनेवाली घटनाओं पर आप इन समूह की मदद से अपडेट भी रहते हैं। हां, इन सोशल मीडिया पर परोसे जा रहे अतिरिक्त और अनर्गल ज्ञान से खुद को बचाए रखना भी एक कड़ी परीक्षा के समान है। व्हॉट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यम अब जिहालतवाली एक यूनिवर्सिटी का दर्जा रखते हैं, जिन पर ज्यादातर झूठ और फरेब परोसा जा रहा है। जागरूकतावाली इंद्रियों की सुषुप्तावस्था से ग्रस्त जाहिलों के लिए यहां परोसा गया ज्ञान ही पत्थर की लकीर होता है। यह चिंता की बात भी है और खतरे की भी, क्योंकि इसी अधकचरे और जबरदस्ती ठूंसे गए अतिरिक्त ज्ञान ने अक्सर सामाजिक माहौल को दूषित किया है।
इस बीच कि जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस को लेकर कोहराम मचा है, कनाडा के एक धर्मगुरु इमाम हुसैन आमेर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इस इमाम ने कोरोना को चीन पर अल्लाह का कहर बताते हुए कहा कि, `मुस्लिम औरतों का बुर्का उतारा, इज्जत लूटी, अब मरो।’ दरअसल चीन के वुहान से शुरू हुए कोरोना वायरस ने आज पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है। इमाम ने अपने वीडियो में कहा कि चीन ने जिस तरह से उइगर मुसलमानों को टॉर्चर किया है, उसी का नतीजा है कि चीन में लोग मर रहे हैं। इमाम ने कहा कई चीनी लोग कुछ भी खा लेते हैं। कोरोना की शुरुआत चमगादड़ खाने से हुई है। चीन के नागरिक तो इंसान भी खा जाते हैं। भ्रूण को खाना भी चीन में प्रचलित है। आगे इमाम ने कहा कि चीन के लोग लड़के चाहते हैं इसलिए गर्भ में पल रही लड़कियों के भ्रूण को वो खा जाते हैं। चीन में लोग वो हर चीज खा लेते हैं, जो चलती है। भले ही वो नुकसानदायक हो, फायदेमंद हो या जहरीला ही क्यों न हो। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के साथ किए गए जुल्म के खिलाफ ये अल्लाह का कहर है जो चीन पर बरपा। इमाम ने कहा कि जब मुस्लिम महिला के सिर से हिजाब उतारा जा रहा था और उसकी इज्जत लूटी गई, तब चीन को डर नहीं लगा। लेकिन अब चीन को अल्लाह ने सबक सिखा दिया है। ये वायरस मुस्लिमों की तकलीफ दिखाने के लिए काफी है।
किसी भी धर्म के किसी मजहबी रहनुमा का इस तरह का बयान क्या किसी तरह से जायज ठहराया जा सकता है? हालांकि इस इमाम के वीडियो पर मुस्लिम समाज की तरफ से भी काफी नकारात्मक टिप्पणियां आर्इं। गैर मुस्लिमों ने तो खैर इमाम के बयानों की जमकर आलोचना की। अपशब्दों की भरमार हुई। आलोचना तक तो सही है लेकिन अपशब्दों में आम मुसलमानों को भी गालियां दी गर्इं जो गलत तो है लेकिन अपशब्द बोलनेवालों से ज्यादा इमाम की बातों की मजम्मत होनी चाहिए कि उन्होंने इंसानों की मौत को अपनी खुशी का सामान बनाया। अव्वल तो प्राकृतिक आपदा हो, महामारी हो या कोई भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आई आफत उसे धर्म से जोड़ना ही मूर्खता है। इस्लाम इस तरह की बकवास को प्रश्रय नहीं देता। यहां बात इस्लाम की है, न कि जाहिल मुसलमान की। मुस्लिम समाज ने कुरआन से दूरी बनाकर सच्चे इस्लाम का अनुयाई होने का दावा खो दिया है। अल्लाह के इस्लाम पर मौलवी का इस्लाम अब ज्यादा रायज है। अगर चीन में अल्लाह का अजाब है तो आखिर मुस्लिम देशों में कोरोना का भय क्यों है? आखिर क्यों इस्लामी मुल्कों के मसीहा सऊदी अरब को यह कहना पड़ रहा है कि `कोरोना वायरस को रोकने के लिए सऊदी अरब भी दुनिया के साथ है।’ आखिर किस इस्लामी कानून या शरीयत का सहारा लेकर मुस्लिमों के लिए पवित्रस्थल मक्का और मदीना की यात्रा पर सऊदी अरब ने रोक लगा दी है? मक्का के अलावा सऊदी अरब ने मदीना स्थित पैगंबर मोहम्मद साहब की मस्जिद-ए-नबवी की यात्रा पर भी रोक लगा दी है। उमरा पर रोक लगाने पर उन मुसलमानों की क्या प्रतिक्रिया होगी, जो इस महामारी को अल्लाह का अजाब बता रहे हैं? तेल के मामले में समृद्ध और इस्लामी मान्यतानुसार अंतिम नबी पैगंबर मोहम्मद साहब की जन्म व कर्म स्थल सऊदी अरब के इस पैâसले से पता चलता है कि वह कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर कितना संजीदा है। केवल सऊदी अरब ही नहीं इस्लामी देशों में शक्क्तिशाली देश का दर्जा प्राप्त ईरान भी कोरोना से प्रभावित है। कोरोना को लेकर ईरान की तबाही जगजाहिर है। मध्य पूर्व के देशों में कोरोना संक्रमण के सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान भी इसकी चपेट में हैं। तो क्या कहेंगे इसे, अल्लाह की रहमत या अल्लाह का अजाब? अगर चीन, इटली सहित यूरोपीय देशों में कोरोना अजाब है, तो कट्टरपंथी मुसलमानों को बताना होगा कि आखिर इस्लामी मुल्कों में कोरोना वायरस को वह क्या कहेंगे?
अच्छे-अच्छे धुरंधर देश के राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रप्रमुखों के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं। बीमारी में भी मजहब तलाशनेवालों को यह समझना होगा कि बीमारी एक बला होती है। यह जितनी जल्दी दूर हो, उतना अच्छा है। बीमारी पैâलते वक्त मजहबी भेद नहीं देखती। वह केवल इंसान देखती है। कोरोना ने और कुछ किया हो या नहीं, धर्मधुरंधरों को इंसान बना दिया है। कुछ महामूर्खों को छोड़कर। महामारी के ऐसे माहौल में भी जो मजहबी भेदभाववाली बातें करनेवाले इंसान नहीं, बल्कि हैवान हैं। उनके लिए दुआ कीजिए। वैसे यह कहना गलत न होगा कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नाम पर दरकती एकता की दीवार को कम से कम हिंदुस्थान में `कोरोना वायरस’ ने आकर संभाल लिया। कोरोना का भय सभी में है। कहीं विशेष तौर पर अजान, नमाज और दुआओं का एहतेमाम हो रहा है, कहीं आरती-भजन और प्रार्थनाओं का, कहीं चर्च में विशेष मास और प्रे हो रहा है, कहीं गुरुद्वारों में कीर्तन और शब्दपाठ हो रहे हैं, तो कहीं बुद्धविहारों में विशेष प्रार्थनाएं की जा रही हैं। यानी हर मजहब के लोग अपने-अपने तर्इं `ईश्वर शरणम् गच्छामि’ की मुद्रा में हैं। जानते और मानते सब हैं कि कोई एक परम शक्ति है, जो सबको चला रही है।
कोरोना से मिलकर लड़ने की बात होनी चाहिए। कोरोना से प्रभावित सभी देशों के डॉक्टर्स, प्रशासन, स्वयंसेवी संगठन लोगों की जान बचाने में लगे हैं। कोरोना वायरस के बहाने मरती जा रही इंसानियत को जिंदा रखने का यह सुनहरा मौका है। फिलहाल जरूरी ये है कि मुस्लिम समाज कोरोना को अल्लाह का कहर जैसे फालतू बयान देनेवाले इमामों के झांसे में न आए। यह महज अपनी दुकान को चमकाने का तरीका भर है। कोरोना एक संक्रमण है और सावधानी बरतकर इससे बचा जा सकता है। कोरोना को धार्मिक चश्मे से न देखें। अगर यह अल्लाह का अजाब है भी, तो सभी के लिए है। और अगर आप धार्मिक हैं तो पूरी इंसानियत और विश्व के सभी कोरोना प्रभावित मरीजों के लिए प्रार्थना कीजिए। सच्चा इस्लाम और दुनिया के तमाम मजहब यही शिक्षा देते हैं।