" /> कोरोना वायरस और सोशल मीडिया

कोरोना वायरस और सोशल मीडिया

अफवाहों का अड्डा बने सोशल मीडिया पर सब-कुछ बताने और जताने की आदत वाकई चिंतनीय हो चली है। वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बनी गंभीर बीमारी को कोरोना वायरस को लेकर पैâलाई जा रही अजब-गजब बातें इसी की बानगी बनीं। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन हाल ही में कोरोना वायरस से बचने को लेकर एडवाइजरी जारी की है, जिसमें सोशल मीडिया में पैâलाई जा रही गलत जानकारियों पर विराम लगाने के लिए कोरोना वायरस से जु़ड़े कई मिथकों के बारे में बात की है क्योंकि लोग कोरोना वायरस को लेकर आभासी दुनिया में अजब-गजब सूचनाएं साझा किए जा रहे हैं। अफसोस कि महामारी बनी इस बीमारी के वायरस को खत्म करने के लिए हैंड ड्रायर्स की गर्म हवा के नीचे हाथ रखने, माउथवाश के इस्तेमाल, तिल के तेल का प्रयोग, एंटीबायोटिक्स खाने, निमोनिया से लड़नेवाले टीके लगवाने, लहसुन खाने और अल्कोहल एवं क्लोरीन का छिड़काव करने जैसी अफवाहों पर विश्वास कर रहे हैं। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने एडवाइजरी जारी कर कहा है कि ऐसी बातों में कोई भी सच्चाई नहीं है।
दरअसल एक गंभीर संक्रामक रोग से संबंधित ऐसी अफवाहें हर तरह से घातक हैं। भ्रामक जानकारियां न केवल महामारी बनने के कगार पर खड़े रोग से लड़ने की तैयारियों को कमजोर करती हैं बल्कि लोगों में भय बढ़ाती हैं। कोरोना वायरस, कोविड-१९, बीमारी से जुड़ीं कई गलत जानकारियां ऐसी हैं, जो इस वायरस से बचाने की बजाय सेहत को और नुकसान पहुंचानेवाली हैं। खासकर अल्कोहल और क्लोरीन का छिड़काव करने से वायरस का खात्मा तो नहीं होता बल्कि यह कपड़ों और शरीर के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। डब्लूएचओ ने यह भी कहा है कि निमोनिया का टीका भी कोरोना वायरस में कारगर नहीं है। इतना ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से कोरोना वायरस से बचाव में सक्षम जिन चीजों की सूची बनाई गई है, उसमें तिल का तेल और लहसुन शामिल नहीं हैं। चिंतनीय है कि कोरोना वायरस पर काबू करने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास कर रहा पड़ोसी देश चीन भी इस बीमारी से जुड़ी अफवाहों से परेशान है। इसके बावजूद आए दिन सोशल मीडिया पर ऐसी बातें साझा की जा रही हैं, जो कोरोना वायरस के प्रकोप को दूर करने या इसके पैâलने से जुड़े भ्रम लोगों तक पहुंचा रही हैं। दुखद है कि ऐसी निराधार जानकारियां बेवजह खौफ का माहौल बनाती हैं।
मौजूदा समय में जब इस खतरनाक वायरस के कहर से पूरी दुनिया में भय और फिक्र का माहौल बना हुआ है, लोगों को अपनी जवाबदेही समझनी चाहिए। खासकर तब, जब दुनियाभर में तकरीबन ६७ हजार से भी ज्यादा लोगों को संक्रमण की चपेट में ले चुके कोरोना वायरस का अब तक कोई इलाज सामने नहीं आया है। इतना ही नहीं यह बीमारी वैश्विक रूप से सामाजिक, आर्थिक और कामकाजी जीवन पर भी काफी असर डाल रही है। हाल ही में मूडीज एनालिटिक्स ने भी कहा है कि चीन की अर्थव्यवस्था के बाद कोरोना अब पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुका है। यह गंभीर रोग वैश्विक अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर नुकसान पहुंचा रहा है। मूडीज एनालिटिक्स के मुताबिक कोरोना वायरस अगर महामारी बन गया तो वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है। चिंतनीय है कि यह संक्रमण दुनिया के कई देशों तक पहुंच भी चुका है। इटली और कोरिया में भी कोरोना से संक्रमित लोगों के मामले सामने आए हैं। हालांकि हमारा देश अभी तक इस रोग के प्रकोप से बचा हुआ है लेकिन भारत जैसे बड़ी आबादीवाले देश में भविष्य में इस संक्रमण के फैलने से जुड़ीं चिंताएं भी कुछ कम नहीं हैं। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत कई विशेषज्ञों द्वारा चेताया जा चुका है कि कोरोना वायरस का प्रकोप और विस्तार अभी आगे भी जारी रहेगा। यही वजह है कि दुनियाभर के लोगों को एक क्लिक में जोड़ने और सामग्री साझा करने की सुविधा देनेवाले इन मंचों के इस्तेमाल को लेकर समझ और सजगता दोनों जरूरी हैं। ऐसी गंभीर व्याधि को लेकर कुछ साझा करने से पहले सोचना आवश्यक है।
हालिया बरसों में सोशल मीडिया पर पैâलाए जानेवाले अजब-गजब संदेश और सामग्री राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन तक के लिए मुसीबत बन गई है। कहना गलत नहीं होगा कि हम अब तक इन माध्यमों का सही इस्तेमाल करना नहीं सीख पाए हैं। जबकि स्मार्ट फोन और इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या हमारे देश में ही नहीं दुनिया के हर कोने में तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में कई फेक मैसेज, फोटो या वीडियो देखते ही देखते वायरल हो जाते हैं। हमारे देश में तो सोशल मीडिया में बच्चा चोरी की अफवाहों के चलते कितने ही लोगों की जान ली जा चुकी है। मॉब लिंचिंग की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के अलावा सामाजिक सौहार्द बिगाड़नेवाले भड़काऊ संदेशों और अफवाहों से भी कई बार हालात बिगड़े हैं। ऐसे में कोरोना वायरस जैसी बीमारी को लेकर आमजन में पैâलाई जा रही भ्रांतियां वाकई तकलीफदेह और जानलेवा हैं। गौरतलब है कि ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंजिला के वैज्ञानिकों द्वारा एक विश्लेषण इसी विषय पर किया गया है कि गलत सूचना का प्रसार वैâसे बीमारी के पैâलने को प्रभावित करता है। इस अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक फर्जी खबरों को पैâलने से रोकने के किसी भी सफल प्रयास से लोगों की जान बचाई जा सकती है। शोध के सह लेखक के अनुसार ‘गलत सूचना का मतलब है कि बुरी सलाह बहुत तेजी से फैलती है और यह इंसानों के व्यवहार को बदल देती है जिससे वह ज्यादा जोखिम लेता है। वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि कोरोना वायरस को लेकर सोशल मीडिया पर फेक न्यूज, अधूरी जानकारी और गलत सलाह इस बीमारी के प्रकोप को और बढ़ा सकती है।
वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बनी बीमारी को लेकर सोशल मीडिया में फैल रही अफवाहें बताती हैं कि तकनीकी सुविधाओं को हाथों हाथ अपनानेवाले लोग, इनके सही इस्तेमाल और सजग यूजर बनने की समझ से कोसों दूर हैं। सोशल मीडिया के यूजर्स का व्यवहार इतना गैर-जिम्मेदार है कि कई बार तो लोग स्वयं किसी संदेश को देखे-पढ़े बिना ही दूसरे लोगों तक पहुंचा देते हैं। तभी तो अफवाहों और झूठे दावोंवाली खबरों और जानकारियों का यह जाल जानलेवा हो चला है। विषय कोई भी हो कई आधारहीन खबरों की ऐसा शृंखला चल पड़ती है कि नई उलझनें खड़ी हो जाती हैं। जरूरी है कि सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़ा कोई संकट हो या सामाजिक परिवेश से संबंधित बात, अफवाहों को पैâलाने से बचा जाय। सोशल मीडिया पर आधारहीन जानकारियां साझा न की जाएं।