" /> कोरोना से मुक्त कर सकती है चाय!

कोरोना से मुक्त कर सकती है चाय!

विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की माने तो ३ केमिकल मेथिलजान टाइन, थियोब्रोमाइन एवं थियोफिलाइन कोरोना वॉयरस को मार सकते हैं। और ये तीनों केमिकल ही चाय में पाये जाते हैं। इसलिये यदि कोई दिन में तीन कप चाय पीते हैं, तो वे कोरोना वॉयरस से संक्रमित नहीं होंगे। साथ ही यदि कोई संक्रमित व्यक्ति चाय पीता है तो कुछ ही दिनों में वह संक्रमण मुक्त हो जाएगा। डॉ. लिवेंलियांग ने कोरोना रोगियों पर विशेष अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था। हालांकि लिवेंलियांग की मृत्यु कोरोना से ही हुई थी।

प्रायः माना जाता है कि चाय पीना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, परन्तु अन्तर्राष्टृीय स्तर पर हुए विभिन्न शोध निष्कर्षो से पता चलता है कि चाय कई रोगों को भगाने की अचूक दवा भी है। जो महिला चाय पीयेगी उसे गर्भाश्य कैंसर का खतरा कम होगा यानी चाय गर्भाश्य कैंसर को रोकने की अचूक दवा है। इसी तरह चाय पीने से मधुमेह रोगियो को लाभ होता है तो चाय तनाव को भी दूर भगाती है। वही चाय पीने से संक्रमण रोगों से मुक्ति, आस्टियोपोरेसिस बीमारी से निजात और हार्ट की बीमारी से भी रक्षा करती है। सबसे ज्यादा फायदा ब्लैक टी व ग्रीन टी पीने से होता है। चीन में जहां ग्रीन टी सेहत के लिए वरदान मानी जाती है वहीं पश्चिमी देशों में ब्लैक टी से सेहत संवारने का चलन है। एक बार चीन का शिन नोंग कही जंगल में आराम कर रहा था, जहां पास में ही पानी उबल रहा था। अचानक कुछ पत्तियां उड़कर उबलते पानी में जा गिरी और जब राजा ने वह पानी पिया तो उसकी सारी थकान उड़न छू हो गई। राजा उन पत्तियों को एकत्र कर अपने महल में ले गया और उन्हें रोज उबालकर पीने लगा और इस तरह मनुष्य के जीवन में चाय ने पहली दस्तक दे दी। चार हजार साल पहले शुरू हुआ चाय का यह सफर आज चरम पर पहुंच चुका है। आज चाय के बिना अतिथि सत्कार अधूरा है। चाय शहर से लेकर गांव तक जन जन में लोकप्रिय हो चुकी है। भले ही अपने देश में दूध- दही की नदिया बहने की बात की जाती हो। सन १८२३ से पहले तक भारत में चाय को कोई नहीं जानता था और न ही पहचानता था लेकिन अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजो ने भारतीयों को चाय पीने की ऐसी लत लगाई कि ज्यादातर भारतीय चाय के न सिर्फ मुरीद हो गए बल्कि गुलाम भी हो गए। तभी तो चाय ने दूध को मात देते हुए दूध से आगे बढ़ने में सफलता प्राप्त की है। चाय का पहला पौधा असम में मणिराम दीवान नें उगाया था जिनकी गत १७ अप्रैल सन २०२० को २१९ वीं जयन्ती मनाई गई है। मणिराम दीवान को सन १८५७ की आजादी का बिगुल बजाने पर अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़वा दिया था। यानी चाय की भारत में पहली पैदावार देश के अमर शहीद मणिराम दीवान ने की थी।
कभी उत्तराखण्ड़ के कुमाऊ जंगलों में चाय के पौधे खरपतवार की तरह लावारिस रूप में उग आते थें। जगंली घास समझकर इन चाय के पौधों का कोई उपयोग भी नहीं करता था। लेकिन जब सन् १८२३ में असम की धरती पर चाय के जंगली पौधों की खोज होने के बाद बिशप हेलर नामक सैलानी सन् १८२४ में हिमालय क्षेत्र की यात्रा पर उत्तराखण्ड़ क्षेत्र में आए और कुमाऊ के जगंलों में खडे़ लावारिस चाय के पौधों को देखा तो उन्होंने यहां चाय की खेती संभावना व्यक्त की। उन्होंने उत्तराखण्ड़ के भौगोलिक स्वरूप व जलवायु को चाय की खेती के अनुकूल मानते हुए लोगों को उत्तराखण्ड में चाय की खेती की सलाह दी। सैलानी बिशप हेलर द्वारा चाय की खेती की बाबत दिए गए सुझाव को कार्य रूप में लाने के लिए सहारनपुर के तत्कालीन सरकारी बोटेनिकल गार्डन चीफ डाक्टर रायले ने तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम बेटिंग से उत्तराखण्ड़ पर्वतीय क्षेत्र में चाय का उद्योग विकसित करने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास करने का अनुरोध किया। जिस पर सन् १८३४ में चाय उद्योग के लिए एक कमेटी का गठन किया गया और सन् १८३५ में इस कमेटी के माध्यम से चाय की दो हजार पौधे कोलकाता से उत्तराखण्ड़ के लिए मंगाए गए। जिसे कुमाऊ क्षेंत्र के अल्मोड़ा में भरतपुर ले जाकर रोपित किया गया। यही चाय की नर्सरी बनाकर चाय कि खेती का विस्तार कुमाउ के साथ-साथ गढ़वाल क्षेत्र में भी किया गया। अनुकूल जलवायु एवं चाय की उन्नत खेती तकनीक के चलते उत्तराखण्ड़ में जो चाय पैदा हुई वह गुणवता की दृष्टि से लाजवाब है तभी तो सन् १८४२ में चाय विशेषज्ञ द्वारा उत्तराखण्ड की चाय को असम की चाय से श्रेंष्ठ घोषित किया गया था। इंग्लैण्ड में भेजे गये उत्तराखण्ड़ की चाय के नमूनोंको भी गुणवत्ता की दृष्टि से दुनिया भर की चाय से श्रेष्ठतम माना गया। जिससे उत्साहित होकर सरकारी प्रोत्साहन के बलबूते उत्तराखण्ड़ की धरती पर सन् १८८० तक चाय की खेती का विस्तार १०,९३७ एकड़ क्षेत्रफल तक पहुंच गया और चाय के ६३ बागानों में उन्नत खेती की गई। चाय उत्पादन के क्षेत्र में उत्तराखण्ड़ दार्जलिंग और असम की तरह भले ही चर्चित न हो, लेकिन उत्तराखण्ड़ की आर्थोडाक चाय आज भी दुनिया की सबसे महंगी चाय में शुमार है। अमेरिका, नीदरलैण्ड़ और कोरिया समेत दुनिया भर के कई देशों में उत्तराखण्ड की चाय को लोग हाथों-हाथ लेते हैं। १२०० मीटर से २००० मीटर की ऊंचाई पर उगाई जाने वाली आर्थोडाक चाय जिसे जैविक चाय भी कहा जाता है को चाय के पौधों पर आने वाली पहली दो कोमल पत्तियों को कली के साथ तोड़कर एक दिन के प्रोसिस से तैयार किया जाता है। हरी पत्तियों की चाय तो और भी लाजवाब है। हरी पत्ती की चाय पीने से धूम्रपान करने की आदत तक छूट जाती है। वहीं यह चाय तनाव से मुक्ति दिलाने में भी कारगर है। एक अध्ययन के अनुसार हरी पत्ती की चाय पीने से दो माह के अन्दर ४३ प्रतिशत धूम्रपान की लत में कमी आती है। जबकि ३१ प्रतिशत से ज्यादा धूम्रपान की लत के शिकार लोग यह बुरी आदत छोड देते है। कोरोना महामारी के दौर में चाय का सही सेवन करके हम सुरक्षित रह सकते है।