" /> कोल्ड वार या कोरोना वार?, अमेरिका-चीन के बीच शीतयुद्ध

कोल्ड वार या कोरोना वार?, अमेरिका-चीन के बीच शीतयुद्ध

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार को लेकर शुरू हुई तकरार आखिरकार अब शीत युद्ध बन गई है। चीन को लेकर अपने नए विजन डॉक्यूमेंट में अमेरिका ने उस पर कायदे और कानून पर आधारित वैश्विक व्यवस्था का दुरुपयोग कर उसे सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की विचारधारा और हितों के अनुकूल बनाने का आरोप लगाते हुए सीधा जवाब देने की बात कही है। इस मनमुटाव में कोरोना ने आग में घी डालने का काम किया है। लिहाजा अब अमेरिका तथा चीन के बीच कोल्ड वार के साथ कोरोना वार भी चल रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैसे चीन बहुत सख्त बयान देते रहे ही हैं, चीन से ही कोरोना फैलने और उसे एक लंबे समय तक बाकी दुनिया से छिपाने की बात पर ट्रंप ने मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप के मुताबिक कोरोना वायरस चीन से ही निकला है और उनका देश इस तथ्य को हल्के में नहीं लेगा। मिशिगन में अप्रâीकी-अमेरिकी नेताओं के साथ बैठक में भाग लेते हुए ट्रंप ने कहा, यह चीन से आया। हम इसको लेकर खुश नहीं हैं। हमने व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, अभी उसकी स्याही सूखी भी नहीं है कि अचानक यह आ गया। हम इसे हल्के में नहीं लेने वाले।

अमेरिका और चीन जिस तरह से एक दूसरे के खिलाफ आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं उससे लगता है कि दुनिया के दूसरे शीत युद्ध की शुरुआत हो रही है। वैसे शीत युद्ध शब्द का इस्तेमाल पहली बार अमेरिका और सोवियत संघ के बीच उस दौर में जारी रहे तनावपूर्ण संबंधों के लिए किया गया था। परमाणु युद्ध की आशंका से दोनों ही पक्ष कभी भी सीधे तौर पर एक दूसरे से युद्ध में नहीं उलझे लेकिन उस वक्त करोड़ों लोग इस डर के साये में जी रहे थे। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ये सन १९४५ से १९८९ के बीच का दौर था। दुनिया दो ध्रुवों के बीच बंट गई थी और ये दो ध्रुव थे अमेरिका और सोवियत संघ। हालांकि कुछ लोग इसे सरकार चलाने की दो तरह की व्यवस्थाओं (पूंजीवाद और साम्यवाद) के बीच की लड़ाई के तौर पर भी देखते हैं। इसमें अमेरिका पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था और रूस साम्यवादी प्रणाली का। देश चलाने का दोनों ही देशों का तरीका अलग था और दोनों ही ये मानते थे कि उनका सिस्टम ज़्यादा बेहतर है। दोनों ही देश ये मानने लगे थे कि दूसरा पक्ष अपने सिस्टम को दुनिया भर में लागू करने के लिए कोशिशें कर रहा है और तनाव का एक बड़ा कारण ये भी था।

अमेरिका और चीन के विरुद्ध शीत युद्ध की शुरुआत व्यापार के मुद्दे से हुई लेकिन कोरोना वायरस ने इसे और भड़का दिया। इससे दोनों देशों के बीच एक तरह से शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी है। हर रोज एक दूसरे पर आरोपों के तीर चलाए जाते हैं। ट्रंप ने यह भी कहा है कि चीन द्वारा संक्रमण और इससे मौत के जो आँकड़े पेश किए गए हैं वो कम नज़र आ रहे हैं। इसका मतलब यह है कि चीन ने कोरोना संक्रमण के मामले छुपाए। और यह सभी है भी। वुहान में जैसे कोरोना का पहला मामला मिला तो चीन ने उसे किसी से नहीं बताया। यह वायरस जब तेजी से फैलने लगा, उससे लोगों की मौत होने लगी और ये वायरस चीन से दूसरे देशों में पहुंचा तब मजबूरन चीन को स्वीकार करना पड़ा कि वही इसका जन्मदाता है। पर चीन ने इससे हुई मौतों का सही आंकड़ा कभी भी नहीं बताया। अमरीका समेत सारी दुनिया का इससे काफी नुकसान हुआ है। सारे देशों को इस वायरस ने काफी पीछे ढकेल दिया है। सारी दुनिया चीन को गालियां दे रही है। पर चीन सुधरने को तैयार नहीं हैं। अब भी कुछ लोग चीन की ओर इस नज़र से देख रहे हैं कि शायद वो कोई साफ जवाब दे अपनी गलती माने पर चीन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वह संक्रमण और इससे हुई मौतों की जानकारी देने में पूरी ईमानदारी नहीं बरत रहा। चीन का रिकार्ड ऐसा ही गन्दा है।

दुनिया के सामने कोई भी आधिकारिक आँकड़ा रखने के मामले में चीन काफ़ी बदनाम है। अर्थव्यवस्था को लेकर चीन के आँकड़ों को लेकर यह काफ़ी हद तक सच है जो कि देश और सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी- सीपीसी दोनों की प्रगति का एक प्रमुख पैमाना है।
दुनिया के तमाम देशों से अलग चीन के प्रति तिमाही जीडीपी के आँकड़े उसके असल आर्थिक प्रगति और सटीक आँकड़ों के बजाय एक गाइड की तरह होते हैं। वुहान शहर से शुरू इस वायरस की चपेट में आकर दुनिया भर में आज तक ५७ लाख से ज्यादा इसके मरीज हैं और ३ लाख ५२ हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। अमेरिका में दुनिया में सबसे ज्यादा १७ लाख मरीज हैं जबकि १ लाख लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं।

चीन पर संक्रमण के शुरुआती दिनों में जानकारी छिपाने का आरोप लग रहा है। पर चालाक चीन ने इसका खंडन करते हुए यहां तक कहा कि घातक सार्स- सी ओ ३ जो उसके क्षेत्र में पाया गया वहां कई और से आया। चीनी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कोरोना वायरस प्रसार के लिए अमेरिकी सेना पर भी आरोप लगाया था। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और इसके डायरेक्टर जनरल टेड्रोस अधानोम गेब्रेयेसस पर भी चीन का पक्ष लेने का आरोप लगा। इथोपिया के पूर्व मंत्री गेब्रेयेसस सन २०१७ में चीन के समर्थन से ही डब्ल्यू एच ओ के प्रमुख बने थे।

लेकिन अपनी जिम्मेदारी लेने की बजाय चीन फालतू के तर्क पेश करता है। अमेरिका को गुस्सा चीन की हरकत पर आता है। विदेश मंत्री वांग यी ने फरमाते हैं कि कोरोना वायरस और व्यापार के मुद्दों पर अमेरिका जिस तरह से हमले कर रहा है, वो दोनों देशों के रिश्ते को नए शीतयुद्ध की तरफ ले जा रहा है। अमेरिका को चीन के प्रति अपना नजरिया बदलना चाहिए और १.४ बिलियन लोगों को आधुनिकता की तरफ आगे बढ़ने में अडंगा नहीं डालना चाहिए। पर ट्रंप की भी अपनी मजबूरियां हैं आगामी नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के लिए बिगुल बज चुका है। ट्रंप अब तक कोई खास लोकप्रिय तो हो नहीं पाए हैं। इसलिए उनका एक ट्रंप कार्ड चीन है। कोरोना को लेकर चीन की कारगुजारियां भी उनका चुनावी मुद्दा है। वो बार-बार अपने देश के लोगों को नसीहत दे रहे हैं कि वो चीन की चिकनी चुपड़ी बातों में कतई ना आएं। चीन उन्हें बेदखल कर अपनी मर्जी की सरकार अमेरिका में बनवाना चाहता है।
बहरहाल, अमेरिका और चीन के विरुद्ध शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी है। यूनाइडेट स्टेट स्ट्रेटेजिक एप्रोच टू द पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना नामक इस विजन डॉक्यूमेंट को व्हाइट हाउस ने जारी कर दिया है। हालांकि इस डाक्यूमेंट् में शीत युद्ध शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है लेकिन उसका मकसद साफ है। यह आहट, यह लहर, यह शुरुआत शीत युद्ध की ही है क्योंकि चीन का इतिहास बदमाशी का रहा है आज भी उसकी बदमाशियां कम नहीं हुई हैं। वह अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं है। कोरोना वायरस के आंकड़े छुपा कर उसने मानवता के साथ जो अपराध किया है उसकी सजा उसे मिलनी ही चाहिए।