कौन समझेगा थिरकते पांवों का दर्द?

मुंबई पुलिस के एंटी नारकोटिक्स सेल के मुखिया शिवदीप लांडे ने हाल ही में मालाड के काका बार पर छापा मारकर १० बार बालाओं को छुड़ाया तो सोशल मीडिया और पत्रकारों ने सिंघम रिटर्न, सिंघम ने बार बालाओं को छुड़ाया, अवैध बार जैसी खबरें प्रकाशित हुर्इं। आम लोगों के लिए यह डांस बार और बार गर्ल मात्र अय्याशी या आकर्षण का साधन हैं जबकि सरकार की नजर में भारतीय नृत्य कला को जीवित रखने का कारण। ११ सालों से विवाद के घेरे और अदालतों की फाइलों में रहा डांस बार एक बार फिर शुरू हो गया। डांस बार का इतिहास बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। १९८० में मुंबई का पहला डांस बार बेवॉच जब खुला तो वह मनोरंजन का एक साधन मात्र था और इस बार में मॉडल लड़कियां अपने कला का प्रदर्शन कर इनाम पा रही थीं लेकिन दलाल बार मालिकों ने इसे अय्याशी का अड्डा और पैसा कमाने का साधन बना दिया। जो लोग डांस बारों में जाते हैं और जो लोग नहीं जाते हैं उन लोगों ने कभी भी बार गर्ल के थिरकते पांवों के दर्द की आड़ में छुपी उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश नहीं की। क्या है बार गर्ल की जिंदगी? वैâसे मुसीबतों से समझौता कर बार बालाएं अपना जीवन-यापन करती हैं? कौन हैं अपराधी बार बालाएं? कौन देता है इनको शह? इस तरह के कई सवालों के जवाब को खोजने का प्रयास करती सामना शोध की यह रपट-
जिस वक्त डांसबारों पर प्रतिबंध लगा उस वक्त राज्य में तकरीबन ७५० डांस बार थे, जिनमें से मुंबई में ही मात्र ५०० के करीब बार हुआ करते थे। इन बारों में तकरीबन कुल ९० हजार के करीब बार गर्ल काम करती थीं। २००५ में जब डांस बार पर प्रतिबंध लगा तो सुर व सुरा रह गया डांस बार का तालमेल बिगड़ गया और बार गर्ल पर आफत की बरसात हो गई।