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क्या अमीरों पर कोरोना टैक्स भी लगेगा?

वैसे देखा जाए तो यह बढ़िया कांसेप्ट है। इससे पता चलता है अमीरों के पास भी दिल होता है, वे भी परिस्थिति की गंभीरता को समझते हैं, किसी आपात स्थिति में उन्हें अपना फर्ज बराबर याद रहता है। दरअसल, दुनिया के अरबपतियों के एक समूह ने एक खुले पत्र में कहा है कि विश्व भर की सरकारों को उनकी बिरादरी से ऊंची दर पर कर वसूलना चाहिए और इस पैसे का महामारी से निपटने की कोशिशों में इस्तेमाल होना चाहिए।
दुनिया भर के अस्सी से भी ज्यादा अरबपतियों ने विश्व की सरकारों से कहा है कि उन्हें कोरोना वायरस महामारी के झटके से उबरने की कोशिशों में मदद के लिए अमीरों से और ज्यादा कर वसूलना चाहिए।
यह तो एक अच्छी पहल है। आज के जमाने में इस तरह की पहल की आवश्यकता भी है। बशर्ते कि सभी अमीर इस पर खुले दिल से सकारात्मक रवैया अपनाएं। वे कोई विरोध न करें और कोरोना कर से संबंधित प्रकिया में सरकार का सहयोग करें। एक अनुमान के अनुसार दुनिया भी में सुपर वेल्थी यानी महा धनवान लोगों की श्रेणी में ५ लाख से ज्यादा लोग आते हैं। यानी आइसलैंड, माल्टा और बेलीज की आबादी से ज्यादा इनकी संख्या है। इनके पास अकूत पैसा है। आज जबकि कोरोना महामारी ने दुनिया भर में लगभग १ करोड़ ४२ लाख लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है और इसकी वजह से लगभग ६ लाख लोग मौत के मुंह में समा गए हैं और कोरोना का कहर अभी थमा नहीं है। संक्रमितों की संख्या रोज नए रिकार्ड बना रही है। कोरोना की वजह से दुनिया भर में बड़े पैमाने पर धन जन की हानि हुई है। अब तक अमेरिका में ३५,६०,३६४ लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं जबकि १,३८,२०१ मौतें हुई हैं। सुपर पॉवर अमेरिका में २०.५ मिलियन नौकरियां भी चली गई हैं। इस महामारी के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था में ३.२ फीसदी की कमी आने वाली है।
हालांकि दुनिया के कुछ हिस्सों में कोरोना कर जैसी एक सार्थक पहल हुई है। जैसे जैसे देश वैश्विक महामारी के आर्थिक असर से निपटने की तैयारी कर रहे हैं, कुछ देशों ने अभी से कर की दरों को बढ़ाने का प्रस्ताव दे दिया है। ब्रिटेन में इंस्टीट्यूट ऑफ फिस्कल स्टडीज ने कहा है कि कर की दरों का बढ़ना सिर्फ अमीरों के लिए ही नहीं, बल्कि सब के लिए निश्चित है। इसीलिए ब्रिटिश लेबर पार्टी ने सरकार से अमीरों पर वेल्थ टैक्स लगाने का निवेदन किया है। नॉर्वे में ५ लाख से ज्यादा अमीर इस तरह का कर पिछले कुछ महीने से दे रहे हैं। स्पेन व रूस में इस तरह के कर लगाए जाने की प्रकिया चल रही है। इसी महीने, स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने संकेत दिए थे कि उनकी सरकार करों की दरों को बढ़ा सकती है। रूस में भी ऊंची कमाई वालों को निशाना बनाने की संभावना है। सऊदी अरब ने महामारी के असर और तेल के दामों में गिरावट को देखते हुए सेल्स टैक्स की दर बढ़ा दी है। लेकिन कर के मामले में हिंदुस्थान की बात मत कीजिए। अमीर लोग खूब कमाएंगे, पर उनसे ज्यादा टैक्स मत मांगिए। जैसे ज्यादा टैक्स मांगेंगे वैसे ही वे विरोध शुरू कर देंगे। यहां के अधिकांश अमीर ज्यादा टैक्स लगाने के प्रस्ताव पर भड़क उठते हैं। अब तक हिंदुस्थान में १० लाख ३८ हजार से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं जबकि २६,२७३ मौतें हुई हैं। हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर कोरोना ने बहुत बुरा असर डाला है। अनलॉक प्रक्रिया शुरू हो जाने के बावजूद उद्योग धंधे ठीक से शुरू नहीं हो पाए हैं। नकदी का प्रवाह रुक गया है। लोगों के पास दैनन्दिन जरूरतों की पूर्ति के लिए भी रकम नहीं आ रही है तो लक्जरी की बात भूल ही जाइए। खाने तक के लाले पड़े हुए हैं। जबर्दस्ती रिटायरमेंट, छंटनी, नौकरी से निकालना, बिना वेतन के अनिवार्य अवकाश, वेतन में कटौती, वेतन वृद्धि पर रोक, बेरोजगारी में बढोत्तरी, उपभोक्ता खपत में कमी जैसी बातें आम हैं। इतना सब होने के बावजूद अगर सरकार कर बढाने की बात करती है तो बवाल मच जाता है। अप्रैल में इंडियन रेवेन्यू सर्विस-आईआरएस के ५० अधिकारियों के एक समूह ने अमीरों पर कोरोना कर लगाने का प्रस्ताव रखा तो वित्त मंत्री ने तुरंत उसे गैर जिम्मेदार कदम करार दिया। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, दिल्ली आदि की सरकारों ने शराब के साथ पेट्रोल डीजल पर कोरोना के नाम पर कर लगाने की पहल की तो उसकी काफी आलोचना हुई। दिल्ली सरकार ने शराब पर एक समय ७० फीसदी कोरोना कर लगा दिया था पर भारी विरोध की वजह से उसे हटाना पड़ा। इसलिए हिंदुस्थान के अमीर कोरोना कर की बात शायद ही मानें। लेकिन वैश्विक स्तर पर अरबपतियों का समुदाय स्वेच्छा से ज्यादा कर देना चाहता है। खुद को मिलियनायर्स फॉर ह्यूमैनिटी कहने वाले इस समूह ने एक खुले पत्र में कहा है कि सरकारों को उनसे तुरंत, पहले से काफी अधिक और स्थाई रूप से वर्तमान दर से ऊंची दर पर कर वसूलना चाहिए। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में बेन एंड जेरी आइसक्रीम बनाने वाली कंपनी के सह-संस्थापक जेरी ग्रीनफील्ड, ब्रिटिश फिल्म पटकथा लेखक व डायरेक्टर रिचर्ड कर्टिस, डिज्नी की उत्तराधिकारी फिल्म निर्माता अबीगैल डिज्नी, अमेरिकी उद्यमी सिडनी तोपोल, आयरिश वेंचर वैâपिटलिस्ट जान ओ फारेल, वेयरहाउस समूह के संस्थापक व न्यूजीलैंड दूसरे धनवान व्यक्ति व्यवसाई स्टीफन टिंडाल आदि शामिल हैं। इस पत्र पर कुल ८३ अरबपतियों ने हस्ताक्षर किए हैं। पत्र में लिखा गया है कि कोविड-१९ के दुनिया पर असर की वजह से अपनी दुनिया को फिर बेहतर बनाने के लिए हम जैसे अरबपतियों को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। हम कोरोना केयर सेंटर्स में, आइसोलेशन केंद्रों में, इंस्टिट्यूशनल क्वारन्टीन में, इंटेंसिव केयर वार्डों में भर्ती बीमार लोगों का ख्याल नहीं रख रहे हैं। उन तक जीवन रक्षक दवाएं भी नहीं पहुंचा रहे हैं, हम बीमारों को अस्पतालों तक पहुंचाने वाली एम्बुलेंस नहीं चला रहे हैं। हम किराना की दुकानों में फिर से सामान नहीं भर रहे हैं और ना ही हम घर-घर जा कर खाना पहुंचा रहे हैं। लेकिन हमारे पास पैसा जरूर है, और बहुत सारा है। वह पैसा जिसकी अभी बहुत जरूरत है और जिसकी आने वाले वर्षों में भी बहुत जरूरत रहेगी, तब जब दुनिया इस संकट से उबरने की कोशिश कर रही होगी। यह पत्र जी २० देशों के वित्त मंत्रियों की होने वाली बैठक से पहले सार्वजनिक हुआ है। मिलियनायर्स फॉर ह्यूमैनिटी समूह का यह पत्र कई समूहों के बीच सहयोग का नतीजा है। इनमें ऑक्सफैम, ह्यूमन एक्ट, टैक्स जस्टिस यूके, क्लब ऑफ रोम, रिसोर्स जस्टिस, ब्रिजिंग वेंचर्स और ऊंची नेट-वर्थ वाले अमेरिकी समूह पेट्रियोटिक मिलयनायर्स शामिल हैं। अब देखना यह है कि जी २० देशों के वित्त मंत्रियों की होने वाली बैठक में इस तरह के प्रस्ताव पर क्या निष्कर्ष निकलता है। वैसे अगर ये प्रस्ताव लागू हो जाता है तो निश्चित रूप से देश व दुनिया की तस्वीर बदल जाएगी।