क्या फर्क पड़ता है…

मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली। अब तो इंडिया में ही सबका इलाज हो जाता है। जिनका नहीं हो पाता वो विदेश जाकर करा लेते हैं। सेलेब्रिटीज तो अब छोटे-छोटे इलाज भी विदेश में कराने लगे हैं। फेलियर का नो-चांस। हां, वहां पैसा ज्यादा लगता है पर सब परफेक्ट हो जाता है। एकदम टनाटन। कितना भी गहरा मर्ज हो, चाहे दशकों पुराना ही क्यों न हो! सबका गारंटीड इलाज है विदेशियों के पास। अब दुनिया में इतने ऑप्शन होते हुए भी अगर अपने देश की ‘आन-बान-शान’ एयर इंडिया बीमार पड़ी रहे तो दु:ख तो होगा ही न? बेचारी सरकार! उससे ‘महाराजा’ को सांसें गिनते देखा भी तो नहीं जा सकता। यही दु:ख सालता रहता है उसे। जितना चाहिए, उतना पैसा बहाने को तैयार है सरकार। खजाने से, बैंकों से, सेबी के जरिए, जहां से भी हो ‘ट्रीटमेंट की तैयारी है। सरकारी वचन है एयर इंडिया को, तुम पर जितना लगे, जितना खर्च हो, हम देंगे। रघुकुल रीति है न, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए।’ फिर? उसे ‘राम-नाम’ वाली सरकार भुला दे क्या? वैसे भी ‘महाराजा’ है, तो राजसी ठाट हैं। वर्ना सब खाक है। इसमें १० करोड़ रुपए प्रतिदिन नुकसान के क्या मायने? सत्ता के ‘पुष्पक’ के प्रति देश का कोई कर्तव्य है कि नहीं? बीमार है तो क्या मरने को छोड़ दें? मर्ज भी कोई १०-११ साल पुराना ही तो है। हजारों करोड़ खर्च हो गए, लाखों करोड़ खर्च कर देंगे पर उसे मरने नहीं देंगे। वैसे अब सरकार को सेलिब्रिटी स्टाइल अपना लेना चाहिए। एक बार अमेरिका ले जाकर ट्राई करने में क्या बुराई है? फालतू में ही वर्षों से यहां इतनी माथापच्ची। सरकारी ‘डॉक्टरों’ को सुध नहीं, ‘प्राइवेट’ को दिखाओ तो नाक-भौं सिकोड़ेंगे। बोलेंगे, आईसीयू में डालो, लाइफ सपोर्ट चाहिए, हम हाथ नहीं लगाएंगे, चांस नहीं है बचने का… वगैरह…वगैरह। छोड़ो इनके सामने गिड़गिड़ाना। अमेरिका के पास ‘सबका खास, सबका इलाज’ है तो। अब सनकी तानाशाह किंग जोंग उन की ‘परमाणु’ बीमारी का इलाज किया न उसने? बिगड़ैल पाकिस्तान की आतंकी बीमारी को छोटी-छोटी डोज देता है न वो? उसके पास डॉक्टर ट्रंप है! एक बार डॉक्टर ट्रंप से भी नब्ज चेक करवा लो न। वर्ना, इतनी देर न हो जाए कि आपकी ‘उड़ान’ के तारे जमीं पर हों! इतना और कर लो ‘महाराजा’ के लिए। उसे क्या रेलवे जैसी ‘गरीबों’ वाली बीमारी है क्या? जो झोलाछाप इलाज से ठीक हो जाएगी। ये तो राजसी मर्ज है। इसके लिए तिजोरी खाली करनी पड़े तो भी गम नहीं। अपने पास पैसे भी कम नहीं। हां, रेलवे की बीमारी का पूरा खर्चा डायरेक्ट पब्लिक से ही वसूलो। उसको कोई पैकेज-वैकेज मत देना। जितना चाहो सुपरफास्ट, फ्लैक्सी, डाइनेमिक, प्रीमियम, वगैरह-वगैरह जो समझ आए चार्ज वसूलो। रिजर्वेशन-कैंसिलेशन सब काटो। खाना-पीना, चढ़ना-उतरना जिधर दिखे, चार्ज लगा डालो। पाई-पाई पब्लिक से वसूल डालो। कोई आवाज करे तो बोलो, कार खरीदो और घूमो। कब तक खरीदेंगे पेट्रोल-डीजल? तेल पर भी टैक्स बढ़ा दो। बोलो, तुम्हारे लिए ही तो सड़कें बनेंगी इससे। वर्ना, कार कहां चलाओगे? जाएंगे कहां ये? आएंगे तो रेलवे के पास ही न। टेंशन मत लो रेलवे का जरा भी। कोई रियायत मत दो पैसेंजर्स को। हां, अमीरों की एयर इंडिया का पूरा खयाल रखना। उन्होंने भी तो वोट दिया है न। थोड़ा सा ही दिया होगा। पर दिया तो है? अब आप भी ‘थोड़ा’ ज्यादा खर्च कर डालो न! क्या फर्क पड़ता है?