क्यों हुआ था अस्थायी संन्यास?

यह १९८४ का वर्ष था जब करियर की तीन बड़ी फिल्में ‘नास्तिक’, ‘महान’ और ‘पुकार’ बॉक्स ऑफिस पर धराशायी हो गई थीं। ‘इंकलाब’ जरूर सफल रही और थोड़ी राहत भी मिली। किंतु तभी समाचार मिला कि अमिताभ बच्चन को एक बार फिर मुंबई के उसी ‘ब्रीच कैंडी’ अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जिसमें वे ‘कुली’ की दुर्घटना के बाद भर्ती हुए थे। अभी मैं अपने सूत्रों से पता लगाने की कोशिश कर ही रहा था कि समाचार कितना सही है और उन्हें क्यों भर्ती कराया गया है कि दुनिया भर की अफवाहों ने जन्म ले लिया। एक खबर यह थी कि ‘कुली’ की दुर्घटना के बाद जो इलाज किया गया था और भारी दवाइयां और इंजेक्शन दिए गए थे, उनका री-एक्शन हो गया है। अमिताभ की आंखों की रोशनी कम हो गई है और वे कैमरे के सामने खड़े नहीं हो पा रहे हैं। किसी ने खबर उड़ा दी कि ‘मर्द’ की शूटिंग पर मैसोर में अमिताभ का शरीर कांपने लगा था और उन्हें लकवे का हल्का झटका लगा है। इसीलिए वे ‘ब्रीच वैंâडी’ नहीं बल्कि मुंबई के ‘जसलोक’ अस्पताल में हैं। एक और खबर उड़ी कि टीनू आनंद ने अमिताभ को ‘शहंशाह’ से निकालकर उनकी जगह फिल्म में जैकी श्रॉफ को ले लिया है। कुछ लोगों की कहानी यह थी कि इस बार अमिताभ सचमुच ‘मायस्थेनिया ग्रेविस’ नामक रोग की चपेट में आ गए हैं। यह ऐसा रोग है जिसमें रोगी की आंखों की पुतलियां और चेहरा कमजोर हो जाता है। वह सीढ़ियां नहीं चढ़ सकता। कोई शारीरिक काम नहीं कर सकता। स्नायु और नाड़ियां ढीली पड़ जाती हैं। यह भी अफवाह उड़ रही थी कि अमिताभ बच्चन के सिर के बाल झड़ गए हैं और गला खराब हो गया है। उन्हें बोलने में कष्ट हो रहा है और उनकी बुलंद आवाज अपनी बुलंदी खो चुकी है। महानायक अब महानायक नहीं रहे हैं।
अभी अफवाहों के ये आंधी-तूफान चल ही रहे थे कि मेरे विश्वसनीय सूत्रों ने बताया कि सच क्या है। सच यह था कि अमिताभ को रूटीन चेकअप के लिए ‘ब्रीच कैंडी’ के कमरा नंबर-३१७ में भर्ती किया गया था और बाकी सब बातें अफवाहों से अधिक कुछ भी नहीं थीं। अत्यधिक काम करने के कारण अमिताभ को आराम की आवश्यकता थी। कुछ बददिमाग लोगों ने तो यह भी कहानी पैâला दी कि अस्पताल का यह सारा मामला एक ड्रामा है जो मनमोहन देसाई ने रचा है क्योंकि उनकी फिल्म ‘मर्द’ आनेवाली है और ‘कुली’ की तरह इस बार भी पब्लिसिटी के लिए यह ड्रामा कर रहे हैं। फर्क इतना ही है कि ‘कुली’ के समय ड्रामा असली था और इस बार ‘मर्द’ से पहले नकली है।
वास्तव में अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ बच्चन भी अमेरिका से लौटकर आ गए थे, जिसके कारण भी लगा कि मामला गंभीर है और दुनिया भर की अफवाहें पैâल गई थीं। कुछ समय तक यह सारा घटनाक्रम चला और जब तक अमिताभ बच्चन ‘ब्रीच वैंâडी’ से घर नहीं आ गए और शूटिंग नहीं करने लगे तब तक जितने मुंह उतनी बातें होती ही रहीं।
मगर अमिताभ बच्चन ने जब शूटिंग प्रारंभ कर दी और लोगों ने उन्हें वैâमरे के सामने काम करते हुए देखा तो सारी अफवाहें अपने आप खत्म हो गर्इं। यह सच भी सामने आ गया कि जिस जटिल रोग से अमिताभ को ग्रस्त बताया जा रहा था, वह कितना झूठ था। न तो अमिताभ की आंखों की रोशनी पर कोई गंभीर खतरा था और न ही उनकी आवाज की बुलंदी पर कोई असर हुआ था। अमिताभ बच्चन अफवाहों के तूफानों से सकुशल निकल आए थे और पहले की तरह पूरे जोश व लगन से अपने काम पर लग गए थे।
२०१२ में लोगों ने यह कहा था कि उनके मेकअप मैन दीपक सावंत की फिल्म ‘गंगा’ अमिताभ बच्चन की पहली भोजपुरी फिल्म थी। लेकिन यह सच नहीं था। सच यह है कि अमिताभ ने पहली भोजपुरी फिल्म जो की थी, उसका नाम ‘पान खाए सैंया हमार’। सुजीत कुमार इस फिल्म के निर्माता थे और १९८४ में आरंभ हुई यह भोजपुरी की बहुत बड़ी फिल्म थी। इस फिल्म में रेखा ने भी काम किया था। फिल्म के संवाद लेखक राही मासूम रजा और संगीतकार नौशाद थे। किंतु यह फिल्म कब पूरी हुई और कब प्रदर्शित हुई या नहीं हो पाई, कुछ पता न चला।
महानायक की गतिविधियां फिर शुरू हो गई थीं। शूटिंग, डबिंग चल पड़ी थी कि तभी एक चौंकानेवाली खबर आई कि अमिताभ ने संन्यास लेकर संन्यासी बनने का पैâसला कर लिया है और फिल्मों से अवकाश ले लिया है। फिल्म जगत के लिह यह बड़ा आघात था। पत्रकार जगत के लिए भी एक बड़ी खबर थी। अंतत: छानबीन की गई और जो तथ्य सामने आया, वह यह था कि अमिताभ ने न तो फिल्मों से अवकाश अथवा संन्यास लिया था और न ही वे संन्यासी हुए थे। अमिताभ को आत्मिक शांति के लिए ४५ दिनों का व्रत रखने और संयम से रहने की सलाह दी गई थी। वे गेरुए वस्त्र पहनने लगे थे। तुलसी के बीजों की माला पहनकर नंगे पांव रहते थे और ‘सबरी मलाई’ की लंबी यात्रा की तैयारी कर रहे थे। वास्तव में यह महानायक का आध्यात्मिक पड़ाव था जो महायात्रा के बीच में अकस्मात आ गया था। अंत में अमिताभ बच्चन की अत्यधिक व्यस्तताओं के कारण उनकी यह आध्यात्मिक यात्रा ४५ दिनों की बजाय २१ दिनों में ही खत्म हो गई और वे फिर अपने काम में लग गए।
कुछ लोगों का यह कहना था कि अमिताभ पहले की तरह अधिक परिश्रम करने योग्य न रहने, फिल्मों की असफलताओं और नई फिल्मों के बंद होते जाने के कारण काफी डिस्टर्ब हो गए थे। विचलित हो गए थे। इसीलिए ‘सबरी मलाई’ की यात्रा और व्रत जैसे धार्मिक कार्यों से खुद को संभालने की कोशिशों में लगे थे। यह महानायक के जीवन का शायद सबसे जटिल समय था जब वे अपना काम-काज नहीं संभाल पा रहे थे। हर ओर अमिताभ की आलोचनाएं हो रही थीं।
आलोचनाओं का यह दौर चल ही रहा था कि इसी बीच मनमोहन देसाई की ‘तूफान’, प्रकाश मेहरा की ‘जादूगर’ और एस. रामनाथन की ‘गंगा जमुना, सरस्वती’ बुरी तरह असफल हो गर्इं और अमिताभ बच्चन की ओर से खबर आई कि वे हमेशा के लिए फिल्मों से संन्यास ले रहे हैं पर कुछ ही दिन बाद ऑफिशियली खंडन और यह खबर आई कि अमिताभ ने केवल ५ वर्षों का संन्यास अस्थाई रूप से लिया है।