" /> क्रिकेट में नो नेपोटिज्म!

क्रिकेट में नो नेपोटिज्म!

लीजिए जिस बात का डर था वही हुआ। क्रिकेट में नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद की बहस एकबार फिर उछाल पर आ गई। सोशल मीडिया इस विषय पर गरम हो उठा है। हालांकि इस बहस को ठंडा करने और सही दृश्य दिखाने के प्रयास किए जा रहे हैं मगर अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि क्या सचमुच क्रिकेट नेपोटिज्म से अछूता है या नहीं। मामला सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर और प्रणव धनावडे॰ से उठा। ये तब भी उठा था जब प्रणव चर्चा में आए थे। किंतु जैसे मामला शांत हुआ ही था कि सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के बाद मचे बॉलीवुड में बवाल ने क्रिकेट को भी घेर लिया। इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो पता नहीं मगर इन दिनों एकबार फिर इस चर्चा पर क्रिकेट हलको में बहस हो रही है। इस बहस को शांत करने के लिए आकाश चोपड़ा ने अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रयास भी किया है।

दरअसल, सोशल मीडिया पर कई लोगों ने दावा किया कि बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद के कारण सैकड़ों प्रतिभाओं को दरकिनार कर दिया गया और इसी तरह क्रिकेट में भी होता है। मुख्य निशाना बनाया गया सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर को जिन्होंने तबसे ही ट्विटर पर इसका सामना किया है। उदाहरण दिया जा रहा है कि २०१६ में अंडर १६ वेस्ट जोन टीम में प्रणव धनावडे॰ के ऊपर उनका चयन था। चार साल पहले यह बहस छिड़ गई थी, क्योंकि प्रणव को अर्जुन के लिए नजरअंदाज कर दिया गया था, जबकि प्रणव ने सिर्फ ३२७ गेंदों में १००९ रन बनाए थे, वहीं अर्जुन अभी तक कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे रहे थे। एक पुरानी तस्वीर पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर यह दावा कर रही है कि क्रिकेट में भाई-भतीजावाद मौजूद है और अर्जुन को केवल इसलिए चुना गया क्योंकि वह सचिन के बेटे थे जबकि प्रणव जैसी वास्तविक प्रतिभा को बाहर रखा गया था। हालांकि जब दावे के बारे में तथ्यों की जांच की गई, तो वे पूरी तरह से भ्रामक पाए गए। दरअसल, एक खिलाड़ी वेस्ट जोन की तरफ से चुने जाने के तभी योग्य है, यदि वह मुंबई के लिए खेल चुका हो। जबकि प्रणव ने यह रिकॉर्डतोड़ पारी मुंबई की टीम चुने जाने से पहले खेली । बल्कि तब तक टीम कुछ मैच खेल चुकी थी। यानी इस एक बात से समझा जा सकता है कि मामले में दम नहीं है। इसके बावजूद प्रणव धनावड़े के पिता प्रशांत ने भी चार साल पहले ही साफ कर दिया था कि उनका बेटा चयन के लिए योग्य नहीं था क्योंकि मुंबई अंडर १६ की टीम को १००९ रन बनाने से पहले चुना गया था। उन्होंने यह भी कहा कि अर्जुन तेंदुलकर और प्रणव धनावड़े बहुत अच्छे दोस्त हैं और एक दूसरे के साथ नियमित रूप से बात करते हैं। इस तरह जो तथ्यों में स्पष्ट रूप है उसे समझा जाना चाहिए कि भाई-भतीजावाद के कारण अर्जुन को पश्चिम क्षेत्र अंडर १६ के पक्ष में नहीं चुना गया और प्रणव के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ। बल्कि प्रणव और उनके परिवार को निर्धारित नियमों के बारे में अच्छी तरह से पता है और फिर उन्हें अंडर १९ टीम में ले जाया गया। आइए इसके बाद की छानबीन की जाए तो ज्ञात होगा कि २०१७ में एक रिपोर्ट्स भी सामने आई थी कि प्रणव अपना ध्यान खो चुके थे और खेल नहीं खेल रहे थे। हालांकि उन्होंने इस पर काम किया और एक इंटर कॉलेज खेल में २३६ रन बनाने के साथ जोरदार वापसी की। फिर क्या हुआ? अब यहां इस बात को मद्देनजर रखा जा सकता है कि प्रणव चूंकि साधन-सुविधाओं के अभाव में पीछे रह गए और अर्जुन आगे निकल गए। इसमें सिर्फ एक संयोग को दोष दे सकते हैं। अर्जुन का कोई दोष नहीं है। जो भी हो मगर एक सच्चाई आकाश चोपड़ा ने भी पेश की जिनके तथ्यों पर गौर करें तो मामला स्पष्ट नजर आता है कि क्रिकेट में अभी ऐसा कुछ नहीं है। किंतु यहां ये भी ध्यान देने योग्य है कि क्रिकेटर पुत्रों को केवल साधन और दिशा अवश्य मिल जाती है बाकी भविष्य तो उन्हें ही संवारना पड़ता है।

टीम इंडिया के पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा ने ये साफ किया कि हिंदुस्थानी क्रिकेट इससे अछूता है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इंडियन क्रिकेट में नेपोटिज्म जैसा कुछ भी नहीं है। इसके लिए उन्होंने सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर का उदाहरण भी दिया। आकाश चोपड़ा ने यूट्यूब चैनल पर इंडियन क्रिकेट में भाई-भतीजावाद से इनकार करते हुए कहा कि अगर बड़े स्तर पर कुछ भी इस तरह का होता तो सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर काफी समय तक क्रिकेट खेलते नजर आते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने बंगाल के लिए शानदार प्रदर्शन किया था जिसके बाद उन्हें इंडियन टीम के लिए खेलने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि गावस्कर ने अपने बेटे रोहन को मुंबई से नहीं खेलने दिया था। उन्होंने सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर के बारे में भी कहा कि उन्हें कुछ भी परोसा नहीं जा रहा है। वो मुंबई रणजी टीम या फिर हिंदुस्थान टीम में खेलेंगे तो अपने प्रदर्शन के दम पर ही खेलेंगे। हिंदुस्थान में उच्च स्तर पर किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं है। मुझे नहीं लगता है कि दूसरे किसी सेक्टर या इंडस्ट्री की तुलना में भाई-भतीजावाद क्रिकेट में प्रासंगिक है। यहां ये भी ध्यान रखें कि रोहन गावस्कर ने टीम इंडिया के लिए सिर्फ ११ वनडे मैच खेले थे और उनके खराब प्रदर्शन के बाद उन्हें टीम से बाहर किया गया था। इसके बाद उनकी कभी इंडियन टीम में वापसी नहीं हो पाई थी। वहीं सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर बाएं हाथ के तेज गेंदबाज हैं साथ ही वो बल्लेबाजी भी करते हैं। वो भी इन दिनों मुंबई रणजी टीम में जगह बनाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। वो इंग्लैंड की टीम को या भी टीम इंडिया के बल्लेबाजों को नेट प्रैक्टिस करवा चुके हैं। वो लगातार आइपीएल की मुंबई टीम के प्रैक्टिस सेशन में भी शामिल होते हैं। आकाश की बात में तथ्य है। ये एक तरह से बचाव भी कहा जा सकता है। किंतु ये एकदम सत्य है कि क्रिकेट में जो काबिल है, वही टीम का पात्र बन सकता है। इस काबिल में निस्संदेह कुशल खेल योग्यता का होना जरूरी है बाकी राजनीति आदि से कोई क्षेत्र अछूता तो नहीं मान सकते।