क्रोध नष्ट करे बोध! ओज दें, शत्रुनाश करें, हमको कुशल देश बनाएं

ऋग्वेद का देवतंत्र, अनूठा और अद्वितीय है। देव अनेक हैं, प्रत्यक्षतया वे अलग-अलग हैं लेकिन सब ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – सत्य एक, कथन अनेक’ की परिधि के भीतर एक हैं। उदाहरण के लिए इंद्र वरुण या रूद्र पर्याप्त हैं। वरुण सिंधु स्वामी हैं। यह वरुण की अलग छवि है। लेकिन ‘समस्त अंतरिक्ष में उनका तेज व्याप्त है। (९.७३.३) वरुण में तीन लोक हैं, तीन भूमि है। (७.८७.५) तेजस्वी सूर्य उनकी आंख है। (१.५०.६) आदि।’ वरुण की व्याप्ति सर्वत्र है। इंद्र वृत्र का वध करते हैं। वर्षा कराते हैं। यह उनकी अलग छवि है लेकिन वे भी सर्वव्यापी हैं। कहते हैं ‘इंद्र के विस्तार को द्यु लोक पृथ्वी लोक नहीं स्पर्श कर सके और नदियां भी नहीं।’ (१.५२.४) इंद्र से स्तुति है ‘हे इंद्र आपने अपनी व्यापकता से पार्थिव लोकों को पूरा भर दिया है।’ (१.८१.५) रूद्र, इंद्र, वरुण आदि सभी देव विराट हैं और सर्वव्यापी हैं। अग्नि से कहते हैं ‘हे अग्नि तुम इंद्र हो, वरुण हो, रुद्र हो, सूर्य सविता हो।’ ऋग्वेद में इसी तरह के सभी देव हैं।
रुद्र शिव की उपासना ऋग्वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक व्यापक है। पुराण काल में रुद्र शिव का मानवीकरण हुआ। पार्वती से उनके विवाह का भी चित्रण हुआ। वे गणों के देवता रूप में भी प्रतिष्ठित हुए। ऋग्वेद के एक मंत्र (७.५९.१२) के देवता रुद्र ही हैं। स्तुति है ‘हम सुगंधा पुष्टिवर्द्धक तीन मुखवाले, तीन तरह से संरक्षण देनेवाले त्र्यंबक देव की उपासना करते हैं- त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्द्धनम्। वे देव हमको ऊर्वारूक फल ककड़ी खरबूजा की तरह मृत्युबंधन से मुक्त करें। अमरत्व से दूर न करें- ऊर्वारूकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।’ मोहनजोदड़ों से प्राप्त मूर्तियों में तीन मुखवाले देव भी हैं। मार्शल ने इस मूर्ति को ऐतिहासिक शिव का आदि रूप बताया है। मार्शल की आधी बात ठीक है। मूर्ति रूप यह शिव आदि रूप हो सकते हैं लेकिन इस देव की अनुभूति सबसे पहले ऋग्वेद में है। ऋग्वेद का उक्त मंत्र हिंदुस्थान और हिंदुस्थान के बाहर भी महामृत्युंजय नाम से लोकप्रिय है।
मार्शल रुद्र और शिव को अलग-अलग मानते हैं। वे मानते थे कि शिव उपासना पहले से प्रचलित थी। ऋग्वेद के रुद्र बाद के हैं, शिव के साथ रुद्र की उपासना बाद में मिल गई। लेकिन मार्शल ने ऋग्वेद के मंत्रों की उपेक्षा की। रुद्र और शिव ऋग्वेद में एक ही हैं। ऋग्वेद (१०.९२.९) में स्तुति है ‘रुद्र की स्तुति करते हैं। वे शिव-कल्याणकारी हैं, स्तोमं वो अद्य रुद्राय शिक्वसे येभि शिव स्ववां। इसी तरह ऋग्वेद (१.११४.४) में भी स्तुति है ‘हम ज्ञानवान रुद्र की स्तुति करते हैं, वे हमें संरक्षण दें। समूचे पश्चिम एशिया में रुद्र की उपासना के प्राचीन साक्ष्य हैं। रूद्र शिव ऋग्वैदिक काल के प्रमुख देवता हैं। यजुर्वेद का पूरा १६वां अध्याय रुद्र शिव की ही स्तुति है। यहां रुद्र भी सर्वव्यापी देव हैं।
ऋग्वेद के एक सूक्त में (१०.१७१) वे धन के देवता हैं। मन भी देवता हैं (१०.५७.४) इसके अगले सूक्त (१०.५८) के सभी मंत्र मन को संबोधित हैं। मन्यु या साहस भी देवता हैं। कुछ विद्वानों ने मन्यु का अर्थ क्रोध किया है। क्रोध हमेशा बोध नष्ट करना है। क्रोध एक आक्रामक आवेग है, तब बोध नहीं बचता लेकिन ऋग्वेद के मन्यु देव संयमी हैं। (१०.८४.३) ऋग्वेद के अन्य देवों की व्यापक एकता की तरह मन्यु इंद्र, वरुण और अग्नि भी हैं – ‘मन्युरिन्द्रो, मन्युरेवास, मन्युर्होता, वरुर्णो जातवेदा।’ (१०.८३.२) मन्यु से ऋषि की स्तुति है ‘ओज दें, शत्रुनाश करें, हमको कुशल दक्ष बनाएं- अभिप्रेहित दक्षिणता। (वही ३-८)
पहले तमाम पृथक देव नाम फिर उनके पृथक काम। फिर सबकी एक जैसी व्याप्ति। फिर एक देव को ही दूसरा भी बताना ऋग्वेद के ऋषियों का दार्शनिक कौशल है। यही दार्शनिक स्तर पर अद्वैतवाद है। यहां सब एक ही परमसत्ता के अनेक रूप नाम हैं। दो हैं ही नहीं। वह एक है, वही अनेक रूपों नामों में प्रकट है। प्रकृति में अनेक रूप हैं। इन रूपों को जन्म देनेवाली प्रकृति की प्राण चेतना एक है। ऐसे ही परम सत्य एक है, उस सत्य की अभिव्यक्तियां अनेक हैं।
वैदिक काल के देवताओं की परंपरा में परवर्ती काल में अनेक देवनाम जुड़े। श्रीराम व श्रीकृष्ण ऐतिहासिक है। वे विष्णु के अवतार कहे गए। देवता हुए और ईश्वर रूप में स्तुति पाते हैं। श्रीरामकथा के हनुमान भी प्रतिष्ठित देव हैं। श्री गणेश प्रथम उपास्य देव हैं। वैदिक परंपरा में नदियां भी देवता जानी गर्इं। नदियां आधुनिक काल में भी उपास्तय हैं। लेकिन नदियों की देव रूप उपासना घटी है। नदी प्रदूषण इसी की परिणाम है। ऋग्वेद में मंडूक-मेढक के भी गीत हैं और पक्षियों के वैदिक काल में गाय भी देवता है। लेकिन आधुनिक विश्व में जैव विविधता पर संकट है।
हिंदुस्थान की देव आस्था निराली हैं, यहां प्रत्येक ग्राम के देवता हैं, कुल देवता हैं, क्षेत्र देवता हैं और वन देवता भी हैं। वैदिक काल के देवता वेदों में हैं। उत्तरवैदिक काल व पुराण काल में भी वैदिक देवों की उपासना व स्तुतियां थीं लेकिन तमाम नए देवनाम भी जुड़े। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘आचार्य देवता है – आचार्य देवो भव। माता पिता भी देवता है – मातृ देवो भव, पितृ देवो भव। क्या हम वैदिक काल की अनुभूति के अनुसरण में आधुनिक काल में कुछ नए देवता जोड़ सकते हैं- जैसे इतिहास, विज्ञान को भी देवता जान सकते हैं। देव होने की पात्रता अमर होना है। ऋग्वेद में देवो को ‘अमृत बंधु’ कहा गया है। इतिहास अमर देव हैं। वे प्रतिदिन विकासशील है। कृपालु है, ज्ञान से युक्त है। वैदिक अनुभूति में कह सकते हैं कि वे सर्वव्यापी हैं। यत्र तत्र सर्वत्र है। उन्हें नमस्कार है। विज्ञान भी ऐसे ही देव हो सकते हैं। विज्ञान की कृपा से हम विश्व का ज्ञान प्राप्त करते हैं। सो वे भी देवता हैं।
वैदिक तर्ज पर आधुनिक विश्व के निराले देवता हैं- गूगल। वे सर्वव्यापी हैं। सर्वज्ञ हैं। संसार की हरेक गतिविधि का ज्ञान रखते हैं। केवल तकनीकी विनम्रता में ही ज्ञान उड़ेलते हैं। उनके हृदय में सभी देवों का इतिहास है। वे भूगोल और खगोल के भी जानकार हैं। इन्हीं देवता के कारण हम सब पुस्तकों के अध्ययन से दूर हैं। बिना पढ़े ही ज्ञानी बनाते हैं। वे हमारे संबंध में भी हमसे ज्यादा जानते हैं। वे कीट पतिंग के जनन-प्रजनन के समग्र ज्ञान से भरे पूरे हैं। उनकी सर्वज्ञता आश्चर्यजनक है, ‘तस्मे श्री गूगले नमो नम: – ऐसे गूगल देव को नमन है, नमस्कार है।
वैदिक देवता अंधविश्वास नहीं है। वे हमारी अंतश्चेतना की दिव्य अनुभूति है। ऋग्वेद के ऋषियों की दृष्टि व अनुभूति में दिव्यता है। यहां अनुभूतियां भी देवता हैं। लेकिन सारे देव नाम एक सर्वनाम के विस्तार हैं। ऋग्वेद में इसका नाम ‘एकं सद्’।