खिसियाने खान खंबा नोचें!

गत २० दिनों में पाकिस्तान ४० बार परमाणु युद्ध की धमकी दे चुका है। धमकियों की मैराथन में वहां के छुटभैये नेता ही नहीं, बल्कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मंत्रिमंडल के सदस्य भी शामिल हैं। हमारे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने परमाणु नीति पर भविष्य में पुनर्विचार की सुरसुरी क्या छोड़ी, पाकिस्तान का पूरा ‘खान ब्रिगेड’ खिसियाहट में खंभा नोंचने लगा।
हम साथ-साथ आजाद हुए थे। हिंदुस्थान ने विकास की राह पकड़ी तो उन्होंने विनाश की। उनकी नीति हमेशा आवाम को अंधेरे में रखकर स्वार्थी सियासत की रही। वहां देश के मुद्दों को दरकिनार कर केवल कश्मीर के नाम पर ही सियासत हुई। हमेशा उनकी सियासत के केंद्र में वो कश्मीर रहा जो न कभी उनका था, न हो सकता है। आंख मूंदकर ना‘पाक’ नीति तय करनेवालों ने कश्मीर के बेजा मोह में अपने ही सूबों को अंधकार में धकेल दिया। नतीजे में बलूचिस्तान में विद्रोह पनपता रहा, कराची-सिंध भेदभाव का आरोप लगाता रहा, खैबर पख्तूनख्वा पिछड़ा का पिछड़ा बना रहा और हमारा पीओके व गिलगित-बालटिस्तान अंदर-ही-अंदर सुलगता रहा। अपने संसाधन संपन्न सूबों को भी पाकिस्तान ने षडयंत्रकारी सियासत में सड़ा डाला, सत्यानाश कर दिया उनका। नतीजतन, पाकिस्तान केवल ‘आधे’ पंजाब तक सिमटकर रह गया। आवाम पिछड़ती चली गई, मरती चली गई। आज भी पाकिस्तान के सियासतदान अपने गुनाहों को कबूल नहीं कर पा रहे हैं, देश को गर्त में ले जाने की गलती स्वीकार नहीं कर रहे हैं। ७० सालों तक जो झूठ उन्होंने आवाम से बोला, उसे एकाएक वैâसे कबूल कर लेते? इमरान खान ने सत्ता संभालते ही थोड़ा साहस जुटाया तो था, पर कश्मीर का मुद्दा सामने आते ही उनकी भी पतलून ढीली हो गई। वो भी उसी पांत में जा बैठे, जिसमें उनकी सारी सियासत बैठी है। उन्होंने भी ठगी की सियासत का शॉर्टकट अपना लिया। नतीजा क्या हुआ? पाकिस्तान की हालत आज बद से बदतर हो गई। अब इमरान मियां देश को वैâसे बताएं कि उनके पास अपने वादों को पूरा करने का कोई रास्ता ही नहीं है। शुक्र है इस बार भी डूबते को तिनके के सहारे के रूप में कश्मीर का मुद्दा मिल गया। आनन-फानन में सेना से लेकर सियासत तक ने उसे लपक लिया। देश की आजादी का पर्व कश्मीर के नाम कर दिया, पाकिस्तान की तमाम सड़कें-चौराहे ‘कश्मीर’ हो गए, दुनिया भर में हिंदुस्थान विरोधी प्रायोजित कार्यक्रम करवा दिए… और तो और अब जुम्मे पर भी नियमित जहर उगलने की अपील हो गई। आखिर ये सब करके क्या मिला मियां साहब को? ऐसा क्या कर दिया हिंदुस्थान ने जो पाकिस्तान परेशान है? वो तो अनुच्छेद ३७० को कभी मानता ही नहीं था। फिर उसे हिंदुस्थान ने खत्म कर दिया, तो परेशानी वैâसी? क्या फर्क पड़ गया इससे उसकी कश्मीर नीति पर? असल में पाकिस्तान अपनी नाकामयाबियों से बचने का मौका ढूंढ रहा था, जो उसे मिल गया। वर्ना, वही इमरान खान जो मोदी के दोबारा सत्ता में आने पर उनसे बात करने, उनसे मिलने के लिए मिन्नतें कर रहे थे, पलक-पावड़े बिछाए बैठे थे, उनके सुर अचानक बदल गए। क्यों? क्योंकि अब हाथ मिलाने में नहीं आंख दिखाने में उनका हित है। अपने घरेलू मुद्दों पर मिट्टी डालने का मौका है, आवाम से बचने का रास्ता है कश्मीर पर आलाप। वर्ना आवाम को वैâसे बताएं कि पाकिस्तान कश्मीर के सपने देखता रहा और उसके ही सपने लुट गए। खैर, पाकिस्तान ने ‘चिल्ला-चिल्लाकर’ हमारे लोकतंत्र की कामयाबी का ही सबूत दिया है। एक तरह से उसने मान लिया है कि हिंदुस्थान ने हमेशा अपने संविधान का सम्मान किया और हमेशा संविधान के दायरे में रहकर ही काम भी किया है। जम्मू-कश्मीर में हिंदुस्थान का संविधान लागू होने के बावजूद भी ३७० से हमने कश्मीर को स्वायत्तता दे रखी थी। कभी इसे लेकर देश या दुनिया की आंखों में धूल नहीं झोंकी, जम्मू-कश्मीर सरकार के प्रशासकीय निर्णयों में दखलअंदाजी नहीं की। आज पाकिस्तान का नंगा नाच यही साबित कर रहा है और यही डर दिखा रहा है कि अनुच्छेद ३७० के निष्प्रभावी होने के बाद उसके आतंक की ‘आजादी’ खत्म हो जाएगी। कश्मीर में आतंक पैâलाने के उसके मंसूबों पर अंकुश लग जाएगा। यही उसके दर्द का कारण है। उसे अब वो आजादी नहीं मिलेगी जो पहले मिलती रही थी। इसीलिए ये रोना-धोना है। इसीलिए जिन देशों की भीख पर पाकिस्तान जिंदा है आज वो उन्हीं को ताने मार रहा है, आंखें दिखा रहा है। सऊदी अरब, यूएई, प्रâांस, अमेरिका जैसे अपने आकाओं पर तरह-तरह के आरोप लगा रहा है, पर यह मानने को तैयार नहीं कि कश्मीर पर उसकी नीति और नीयत में ही खोट है। अगर अब भी पाकिस्तान ने नीति नहीं बदली तो आज केवल विदेश में उसके एक मंत्री पर अंडे पड़े हैं, उसी की जनता ने मारे हैं। कल हो सकता है अपने ही देश में उस पर डंडे पड़ें और सिर्फ उसकी आवाम ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया उसे ‘समझदारी’ की चोट पहुंचाए। कश्मीर का ‘स्वर्ग’ पाने के चक्कर में पाकिस्तान रेगिस्तानी ‘दोजख’ न बन जाए। बहुत पानी बह चुका है अब वो भी उसे नसीब नहीं होगा। पानी भी राह बदलने को बेताब है।