खूंखार हैवानियत : सिसकती आदमियत

हैदराबाद में रूह कंपा देनेवाली घटना में सामूहिक दुष्कर्म के बाद केरोसिन डालकर जला दी गई वेटरनरी डॉक्टर प्रियंका के आखिरी शब्द थे ‘आसपास अजनबी लोग हैं, वे मुझे घूर रहे हैं और मुझे डर लग रहा है।’ फिर मदद के नाम पर बर्बरता के बाद देश की एक और बेटी के साथ हैवानियत कर उसकी जिंदगी छीन ली गई। बची तो बस भयभीत होकर कहे गए उन आखिरी शब्दों की काली छाया, जो हमारे समाज का भयावह सच है। डरकर जीने के हालातों का ऐसा स्याह सच, जो हर उम्र, हर तबके की महिलाओं की जिंदगी का दंश बना हुआ है। भय के इस परिवेश को पुख्ता करती एक और घटना भी उसी दिन उसी शहर से सामने आई। डॉक्टर प्रियंका के साथ हुई वारदात से कुछ दूरी पर एक और महिला का जला हुआ शव मिला। इन्हीं दिनों झारखंड से भी एक युवती के साथ १२ लोगों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म की बर्बरता की खबर आई। इतना ही नहीं बिहार में नाबालिग के साथ कार में गैंगरेप के बाद उसका वीडियो वायरल करने की घटना का समाचार भी सुर्खियां बना है।
समाज, सरकार और यहां तक कि देश के हर परिवार को शर्मिंदा करती ऐसी घटनाएं अनगिनत सवाल लिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह कि गिरती नैतिकता और वहशी होते इंसानों के इस दौर में बेटियां आखिर कहां जाएं? घर, दफ्तर, बाजार, स्कूल-कॉलेज या खुली सड़क। बेटियों को हर जगह एक अनकहा डर घेरे रहता है, जो कभी भी समय ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसे के रूप में सामने आ जाता है। महिलाओं के साथ ऐसे अधिकतर जघन्य अपराध ऑफिस, कोचिंग या स्कूल-कॉलेज आते-जाते ही हो रहे हैं। प्रियंका भी उस समय अपने दफ्तर से ही लौट रही थी। रास्ते में स्कूटी पंक्चर होने पर कुछ लोग उसकी मदद को आए लेकिन मदद के बजाय इन हैवानों ने उसके साथ दुष्कर्म की बर्बरता की और निर्ममता से उसकी जान ले ली। सोचिए कि वैâसा बीमार समाज बना लिया है हमने? जहां ऑफिस में अपनी जिम्मेदारियां निभाकर घर लौट रही एक बेटी के साथ सहायता के नाम पर कुछ दरिंदों ने रोंगटे खड़े कर देनेवाले ऐसे हादसे को अंजाम दिया।
दरअसल, महिलाओं के प्रति विकृत मानसिकता रखनेवाले ऐसे लोग उन्हें देह के परे देख ही नहीं पाते। हरदम इसी ताक में रहते हैं कि कब किसी स्त्री की अस्मिता से खेला जाय? ऐसे कुंठित लोगों की दोयम दर्जे की सोच के चलते ही दूर-दराज के गांवों-कस्बों से लेकर महानगरों तक, बहू-बेटियों के साथ आपराधिक घटनाओं का होना जारी है। मासूम बच्चियों के उनके अपने दरिंदगी करने से नहीं चूक रहे। चिंतनीय यह है कि महिला अपराधों से जुड़ी स्थितियां अब और भयावह होती जा रही हैं। जन-जागरूकता के प्रयासों, सतर्कताओं और कानूनी सख्ती के बावजूद ऐसी हिंसक और बर्बर घटनाओं में कमी नहीं आ रही। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि शिक्षा के आंकड़ों ने भी महिलाओं के प्रति सोच और मर्यादित संस्कार को पोषित उतना नहीं किया, जितनी उम्मीद थी। इतना ही नहीं तकनीक की पहुंच ने भी जागरूकता की जगह जद्दोजहद बढ़ा दी है। चिंता की बात है कि आधुनिकता के नाम पर आये खुलेपन ने आपराधिक मामलों में नई तरह की घटनाओं को और जोड़ दिया है। महिलाओं के साथ बेहूदगी करते हुए वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की हिमाकत भी की जा रही है।
विचारणीय है कि ऐसी बर्बर घटनाएं कामकाजी महिलाओं की दुश्वारियों को भी सामने रखती हैं। आज श्रमशक्ति में अहम् भागीदारी निभा रही बेटियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षित दफ्तर पहुंचने और घर लौट आने की ही है। असुरक्षा के कारण आज भी महिलाएं योग्यता और क्षमता के मुताबिक नौकरी नहीं चुन पातीं। असुरक्षित हो चले परिवेश में महिलाएं एक बंधे हुए रूटीन में ही काम कर पाती हैं। यही वजह है कि उच्च शिक्षा के बढ़ते आंकड़ों के बावजूद १९९४ से महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी लगातार घट रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने कुछ समय पहले महिला श्रम बल की हिस्सेदारी को लेकर यह अनुमान जारी किए थे यानी योग्यता और क्षमता के बावजूद महिलाएं खुद को चहादीवारी में वैâद करने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने की सोच रखनेवाले अभिभावक भी डरे-डरे रहते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े भी आधी आबादी की चिंता सामने रखनेवाले हैं। साल २०१७ की रिपोर्ट बताती है कि देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध में करीब ६ फीसदी का इजाफा हुआ है। एनसीआरबी की अनुसार घर के भीतर अपनों का दुर्व्यवहार हो या नाबालिग बच्चियों के शोषण के मामले। हर उम्र, हर वर्ग की महिलाओं के साथ आपराधिक घटनाएं हुई हैं। एनसीआरबी के मुताबिक १८ से ३० साल की युवतियों के लिए तेलंगाना देश में सबसे असुरक्षित राज्य है। वर्ष २०१७ में यहां दर्ज हुए दुष्कर्म के कुल मामलों में ९१ फीसदी पीड़ताएं १८ से ३० साल की हैं। गौरतलब है कि कुछ समय पहले आये एसोचैम के एक सर्वेक्षण में दिल्ली की ९२ प्रतिशत, बंगलुरु की ८५ प्रतिशत, कोलकाता की ८२ प्रतिशत और हैदराबाद की १८ प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया कि वह दिन और रात दोनों ही पाली में काम करने में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े एसोचैम के इसी सर्वेक्षण में दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरु, हैदराबाद, अमदाबाद, पुणे और देहरादून सहित कई शहरों को शामिल किया गया था, जिसमें शत-प्रतिशत महिलाओं ने माना कि महिलाओं की सुरक्षा की समस्या देश की किसी भी समस्या से ज्यादा बड़ी है।
आज की बेटियां कामकाजी बन रही हैं। आत्मनिर्भर बन परिवार ही नहीं देश की तरक्की में भी अपना योगदान सुनिश्चित कर रही हैं। इसके बावजूद नैतिक और सामाजिक मूल्यों की गिरावट के इस मौजूदा दौर में आधी आबादी भय के परिवेश में जीने को विवश है जबकि मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक टूटन की अंतहीन पीड़ा देनेवाली बलात्कार की बर्बर घटनाएं समाज का पूरा परिवेश बदल देती हैं। अविश्वास और फिक्र का माहौल बनाती हैं। हैदराबाद में हुई सहायता करने के नाम पर दरिंदगी की यह घटना भी पूरी सामाजिक व्यवस्था से भरोसा उठानेवाली है। कामकाजी बेटियों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को सामने रखती है। हद दर्जे तक गिर चुकी इंसानी सोच और हिंसक प्रवृत्ति की बानगी है।