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`ख्वाब अधूरा रह गया!’ शरद केलकर

बेहद हैंडसम और रोबीली आवाज के मालिक शरद केलकर की पहचान हिंदी, मराठी के साथ ही साउथ फिल्म इंडस्ट्री में भी है। फिल्म ‘तानाजी’ में शरद द्वारा निभाया गया छत्रपति शिवाजी महाराज का किरदार बहुत अधिक सराहा गया। फिल्म ‘भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया’ से शरद केलकर चर्चाओं में हैं। डबिंग आर्टिस्ट के रूप में नाम कमा चुके शरद फिल्म ‘बाहुबली’ में प्रभास की आवाज बने थे। कई प्रतिभाओं के अपने भीतर समेटे शरद केलकर भगवान गणेश की मूर्ति भी बनाते हैं। पेश है, शरद केलकर से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

 गणपति बनाने की कला आपने कैसे विकसित की?
यह कला मुझमें पहले से थी, लेकिन इस ओर मैं बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे पाया। पत्नी कीर्ति केलकर के आग्रह पर मैं गणपति बनाने लगा हूं। इस बार मैंने जो गणेश की मूर्ति बनाई है उसके लिए मैंने पर्यावरण पूरक सामग्री इस्तेमाल की है। वैसे इस कला को साध्य करने में शिल्पकार शुभांकर कांबले की मुझे सहायता मिली। मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं।
 सफलता मिलने के बाद आपके जीवन में क्या बदलाव आया?
मैं अपने क्षेत्र का सेलेब्रिटी कलाकार हूं। मराठी फिल्म ‘लई भारी’ की धुआंधार सफलता के बाद मेरी पहचान बनी। मेरी पहचान के बारे में पत्नी कीर्ति जानती हैं। लेकिन बेटी केशा को अपने पिता के सेलिब्रिटी स्टेटस का नहीं पता। मैं मिडल क्लास शख्स हूं। ग्वालियर से मुंबई तक का फासला तय करने में मुझे १५ वर्ष लगे। मैं अपनी बेटी को पैसों की अहमियत अप्रत्यक्ष तरीके से समझाता हूं। विरासत में सिर्फ नाम मिलता है।
 क्या आपने भी नेपोटिज्म का दंश झेला है?
मैं नेपोटिज्म को नहीं मानता। नेपोटिज्म सिर्फ स्टार्स की डेब्यू फिल्म तक रहता है। स्टार्स के बच्चों को लॉन्चिंग पैड बेहद अच्छे से मिलता है, उन्हें साइन करने के लिए मेकर्स लालायित रहते हैं। लेकिन हमारे जैसे एक्टर्स जिनका कोई फिल्मी कनेक्शन न हो, उन्हें फिल्मों में पहला मौका पाने के लिए कड़ी मेहनत और तपस्या करनी पड़ती है। लेकिन पहला मौका मिलने पर आगे चलकर अगर उनमें प्रतिभा है, तो ही वे आगे जा सकते है। रितिक रोशन बेहद अच्छे और टैलेंटेड स्टार हैं ये कहने की जरूरत नहीं। पिता राकेश रोशन ने उन्हें लॉन्च किया लेकिन वे शिखर पर पहुंचे क्योंकि उनमें टैलेंट कूट-कूट कर भरा है। यही बात रणबीर कपूर की भी है। कपूर परिवार से होने के बावजूद वे बेहद प्रतिभाशाली हैं। रणवीर सिंह, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना ये नॉन फिल्मी परिवार से हैं। लिहाजा, फर्स्ट ब्रेक मिलने में उन्हें देर लगी लेकिन अब उन्हें पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं।
 क्या आप शुरू से एक्टिंग में आना चाहते थे?
नहीं, ऐसा नहीं है। जब मैं ग्वालियर में नौवीं क्लास में पढ़ रहा था तब मैंने अपना करियर डिफेंस में बनाने के बारे में सोच लिया। पढ़ाई-लिखाई में अव्वल था। फिजिक्स में अच्छे नंबर लाने थे लेकिन बारहवीं में कम नंबर मिले। मेरा हमेशा से यही ख्वाब था कि मैं देश की सेवा करूं, डिफेंस का यूनिफॉर्म पहनना मेरे लिए एक जुनून-सा बन गया था। लेकिन दुर्भाग्यवश कम नंबरों के चलते मैं अनफिट हो गया। मेरा यह ख्वाब अधूरा रह गया, इसका मुझे मलाल है। डिग्री लेने के बाद मैं मुंबई आया और यहां मुझे मॉडलिंग का ऑफर मिला। यह कोई सोचा-समझा निर्णय नहीं था।
 हकलाने की प्रॉब्लम से आपने वैâसे निजात पाई?
अगर मेरा हकलाना कायम रहता तो मैं अभिनय के क्षेत्र में वैâसे टिक पाता? पत्नी कीर्ति ने मुझे इससे उबरने में मेरी बहुत मदद की। मैं बच्चन साहब से बहुत प्रभावित था। अत: उनकी तरह आवाज निकालने की मैं कोशिश करने लगा और यह प्रैक्टिस मेरे काम आई। सोते-जागते हर वक्त मैंने खुद के हकलाने पर निजात पाने का प्रयास किया और मेरा हकलाना बंद हो गया।
 फिल्म ‘तानाजी’ की सफलता का आपको कितना फायदा हुआ?
पिछले ५-६ वर्षों से मैं हिंदी के साथ ही साउथ की फिल्मों में काफी व्यस्त हूं। लेकिन ‘तानाजी’ की सफलता से मेरी ओर कई मेकर्स का ध्यान आकृष्ट हुआ। ‘तानाजी’ में मेरी परफॉर्मेंस को देखकर ही मुझे हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया’ मिली। लेकिन ये सच्चाई है कि इस दौर में अक्सर कई नामी-गिरामी स्टार्स को भी ऑडिशन देना पड़ता है। एक तरह से ये बात अच्छी भी है और बुरी भी। अच्छी इसलिए चूंकि आप सिर्फ नामी स्टार हैं इस वजह से आपको कोई फिल्म नहीं मिल रही है, अगर आप योग्य हो किरदार के लिए तो ही आपके बारे में सोचा होगा। बुरी इसलिए क्योंकि सीनियर्स और स्ट्रगलर्स के भेद खत्म होते जा रहे हैं।