गणपति पूजा में वर्जित है तुलसी

भगवान गणेश सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माने गए हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान श्री गणेश की पूजा का विशेष महत्व मानी जाती है तथा लोग गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए विधि-विधान से पूजा करते हैं। लेकिन गणेश जी की पूजा में तुलसी का४ प्रयोग वर्जित है। इसके पीछे की रोचक पौराणिक कथा बताई जाती है।
कथा- एक समय में धर्मात्मज नाम के राजा हुआ करते थे। उनकी कन्या तुलसी यौवनावस्था में थी। अपने विवाह की इच्छा लेकर तुलसी तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ी। उन्होंने कई जगह की यात्रा की। एक स्थान पर उन्हें तरुणावस्था में भगवान श्री गणेश को तपस्या में लीन देखा। भगवान गणेश का रुप अत्यंत मोहक और आकर्षक था। तुलसी भगवान गणेश के इस रूप पर मोहित हो गई और अपने विवाह का प्रस्ताव उनके समक्ष रखने के लिए उनका ध्यान भंग कर दिया।
भगवान गणेश ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताते हुए तुलसी का विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया। तुलसी को भगवान गणेश के इस रुखे व्यवहार और अपना विवाह प्रस्ताव ठुकराए जाने से बहुत दुख हुआ और उन्होंने आवेश में आकर भगवान गणेश को दो विवाह होने का शाप दे दिया, जिसके बाद श्री गणेश ने भी तुलसी को असुर से विवाह होने का शाप दे दिया। बाद में तुलसी को अपनी भूल का अहसास हुआ और भगवान गणेश से क्षमा मांगी। तब भगवान गणेश ने तुलसी से कहा न तुम्हारा शाप खाली जाएगा न मेरा। मैं रिद्धि और सिद्धि का पति बनूंगा और तुम्हारा भी विवाह राक्षस राज जलंधर से अवश्य होगा लेकिन अंत में तुम भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की प्रिया बनोगी और कलियुग में भगवान विष्णु के साथ तुम्हें पौधे के रूप में पूजा जाएगा लेकिन मेरी पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाएगा।

लंबोदर को प्रिय है यह मंत्र
श्री गणेश की पूजा का विशेष दिन बुधवार माना गया है। साथ ही इस दिन बुध ग्रह की भी पूजा की जाती है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बुध ग्रह अशुभ स्थिति में हो तो बुधवार को गणेश पूजन करने से लाभ मिलता है। बुधवार के स्वामी बुध ग्रह हैं जो बुद्धि के कारक भी माने जाते हैं इसलिए श्री गणेश को मोदक का भोग लगाकर पूजा करने से बुद्धि बढ़ती है और साथ ही सुख-सफलता बनी रहती है।
ऐसे करें गणेश का पूजन-
पूजन में श्रीगणेश को सिंदूर, चंदन, यज्ञोपवीत, दूर्वा, लड्डू या गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद धूप और दीप जलाकर आरती करें.
पूजन में इस मंत्र का जप करें-
प्रातर्नमामि चतुरानन वन्द्यमान मिच्छा नुकूलमखिलं च वरं ददानम्।
तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयो: शिवाय।।
प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोकदावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्।
अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाहमुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य।।
मंत्र का अर्थ-
मैं ऐसे देवता का पूजन करता हूं, जिनकी पूजा स्वयं ब्रह्मदेव करते हैं. ऐसे देवता, जो मनोरथ सिद्धि करने वाले हैं, भय दूर करने वाले हैं, शोक का नाश करने वाले हैं, गुणों के नायक हैं, गजमुख हैं, अज्ञान का नाश करने वाले हैं. मैं शिव पुत्र श्री गणेश का सुख-सफलता की कामना से भजन, पूजन और स्मरण करता हूं.

श्री गणेश का स्वरूप है स्वस्तिक
मान्यताओं के अनुसार स्वस्तिक को गणेश जी का प्रतीक चिन्ह माना गया है। गणेश जी की पूजा से पहले स्वस्तिक चिन्ह बनाया जाता है। इसलिए पूजन से पहले स्वस्तिक चिन्ह बनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। गणेश जी प्रथम पूज्नीय देव हैं इसलिए पूजन से पहले स्वस्तिक चिन्ह बनाने की परंपरा है। पूजन से पहले स्वस्तिक बनाने से धर्म-कर्म के कार्य सफल हो जाते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती है। स्वस्तिक चिन्ह का काफी महत्व है और इसको सही तरह से बनाने से ही पूजा सफल होती है। स्वस्तिक सीधा और सुंदर होना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान दें कि स्वास्तिक कभी भी उल्टा ना बनाया जाए। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार उल्टा स्वास्तिक भी बनाया जाता है परंतु ऐसा सिर्फ किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए किया जाता है। घर पर स्वास्तिक बनाने से पहले घर में साफ-सफाई कर लें जहां पर स्वास्तिक चिन्ह बनाना हो वह स्थान पवित्र होना चाहिए। वहां पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। मान्यता है कि स्वास्तिक अपनी तरफ दैवीय शक्तियों और सकारात्मक ऊर्जा को खींचता है। वास्तु दोष को दूर करता है इसलिए घर के मुख्य द्वार पर भी स्वास्तिक का निशान बनाना चाहिए।