" /> गाय को क्षति पहुंचाने की बात भी अपराध

गाय को क्षति पहुंचाने की बात भी अपराध

भोजन सभी जीवों की प्राथमिक आवश्यकता है। हिंदुस्थानी ज्ञान परंपरा में शरीर की प्राथमिक या ऊपरी परत को अन्नमय कोष कहा गया है। मनुष्य शरीर का निर्माण अन्न से होता है। उपनिषद् वैदिक साहित्य के दर्शन भाग कहे जाते हैं। उपनिषदों में भी अन्न की महिमा है। आधुनिक समाज ने अन्न से बने तमाम खाद्य पदार्थ विकसित किए हैं। इन्हें फास्ट फूट या तुरंता खाद्य कहते हैं। ये काफी दिन तक बिना सड़े उपयोग योग्य बने रहते हैं। लेकिन स्वास्थ्यवर्द्धक नहीं हैं। वैदिक काल से लेकर अब तक भोजन के घटकों में बहुत कुछ जोड़ा घटाया गया है। वैदिक और उत्तरवैदिक काल में माना जाता था कि शुद्ध, सम्यक और पोषक आहार शारीरिक बल के साथ मन और बुद्धि का भी निर्माता है। ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद के रचनाकाल तक भोजन की आदर्श संहिता का विकास हुआ है।
पृथ्वी माता है। उपास्य है। भूमि के प्रति कृतज्ञता के अनेक कारण हैं। एक प्रमुख कारण इसका अन्नदायिनी होना भी है। भूमि सूक्त (१२.१.४२) में कहते हैं ‘पंचकृष्टया इस भूमि में जौ चावल आदि अन्न प्रचुर मात्रा में होते हैं – यस्मान्नं ब्रीहि यवौ यस्या इमा पंचकृष्टया। निश्चित समय पर पर्जन्य वर्षा करते हैं, उस भूमि को नमस्कार है – नमो अस्तु।’ अथर्ववेद में अनेक अन्नों के नाम उल्लेख हैं। संभवत: जौ और चावल का उपयोग ज्यादा होता था। एक मंत्र (३.२.१८) में कहते हैं ‘धान और जौ तुम्हारे लिए कल्याणकारी व बलवर्द्धक हों।’ अन्न के साथ दूध का आनंद बढ़ जाता है। कहते हैं ‘धान्य और दूध खीर रूप में पीते हो। हम उसे विषरहित करते हैं।’ (वही १९) यहां भोजन की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया गया है। जौ, चावल उड़द और तिल खाओ। यह तुम्हारी तृप्ति के लिए प्रस्तुत है।’ अन्न का संग्रह भी होता था। कहते हैं ‘हमने विविध प्रकार के अन्न का संग्रह किया है। अग्नि देवता इस संपदा को सुंदर बनाएं।’ (६.७१.१) अन्न का उपयोग औषधि रूप में भी था। कहते हैं, ‘जौ की बाल, तिल सहित तिल की मंजरी व अर्जुन की लकड़ी आनुवंशिक रोग नष्ट करे।’ (२.८.३)
खाद्यान्न ढेर सारे हैं लेकिन मुख्य भोजन के रूप में जौ और चावल की भूमिका है। जान पड़ता है जौ के बिना अथर्ववेद के समाज की भूख नहीं शांत होती। एक मंत्र (७.५०.७) में इंद्र से कहते हैं ‘हम दरिद्रता से उत्पन्न दुर्मति को गाय आदि पशुधन से दूर करें। जौ से अपनी क्षुधा शांत करें।’ जौ से ‘यवाशिर’ बनता था। यह जौ की लप्सी थी। यहां इन्द्र से स्तुति है कि ‘वे ऋषि के पास आकर गाय दूध व जौ मिलाकर बने यवाशिर का पान करें।’ (२०.२४.७) इस लप्सी में सोमरस भी मिलाते थे। सोमरस युक्त लप्सी में दही मिलाते थे। दही मिलाने से बनी लप्सी के लिए अथर्ववेद (२०.६९.३) में ‘दध्याशिर’ शब्द प्रयोग हुआ है। दूध, दही और जौ मिले सोमरस के लिए ऋग्वेद (५.२७.५) में न्न्याशिर शब्द आया है। अथर्ववेद (१८.४.१६) में ‘अपूप’ का उल्लेख है। यह उस समय का मालपुआ है। इसे घी मिलाकर बनाया जाता था। ऋग्वेद (१०.४५.९) में भी अपूप का विवरण है।
आर्यों का सर्वाधिक प्रिय पेय था दूध। अथर्ववेद में दूध से बने खाद्य पदार्थ ‘खीरवान’ कहे गए हैं। दही से बने खाद्य पदार्थ दधिवान, अन्न से बने अन्नवान, रस से बने रसवान, शहद या अन्य मधुपदार्थों से बने मधुमान बताए गए हैं। वैद्यों के अनुसार घी और शहद का समिश्रण अच्छा नहीं कहा जाता लेकिन अथर्ववेद (१२.३.४४) में घी से मिले मधु को देवों व ऋषियों के लिए श्रेष्ठ बताया गया है ‘हम आदित्य देवों व अंगिरा ऋषियों के लिए घी मिला हुआ मधु अर्पित करते हैं।’
दही मंथन भी होता रहा होगा। अथर्ववेद में एक पेय मंथ है। ‘मंथ’ मक्खन या मट्ठा हो सकता है। एक मंत्र (१८.४.४२) में कहते हैं ‘मंथन से प्राप्त मंथ, भात अन्न को हम अर्पित करते हैं। यह मधुर और घी से परिपूर्ण है – मधुमंतो घृतश्चुत:।’ दूध भात का भी उल्लेख है। (१८.२.३०) चावल को घी में भूनकर पुरोडास बनता था। (वही २०.२३.३) अथर्ववेद रचे जाते समय भोजन में विविधता थी लेकिन मीठे पदार्थों का उपयोग ज्यादा दिखाई पड़ता है। मधु इन ऋषियों का प्रिय पदार्थ है और प्रिय भाव भी है। इन्द्र से कहते हैं, ‘आपके लिए घी मिश्रित सोम है। इस मधुरस को पीकर आप प्रसन्न हों – भवंतु पीतये मधूनि। (२०.७६.६) ईख का रस मधु-मधुर होता है। एक सुंदर मंत्र (१.३४.५) में कहते हैं ‘सब तरफ से घिरे हुए मीठी ईख के समान परस्पर मीठे और प्रिय रहने के लिए हम आपको प्राप्त हुए हैं।’ मधुमय अभिलाषा इन ऋषियों का केंद्रीय मनस् तत्व है। वे मीठा खाना पसंद करते हैं, मीठा बोलते हैं। संसार को भी माधुर्य गुण से भरना चाहते हैं। यह प्रत्यक्ष भौतिक कर्मठतावाद ही है।
गोमांस भक्षण की बातें भी कुछेक लोगों द्वारा कही गई हैं। ऋग्वेद में गाय अघन्या है। अथर्ववेद में यह मान्यता और भी गहराई है। गाय की हत्या तो दूर की बात है, तब उन्हें क्षति पहुंचाने की बात भी अपराध थी। अथर्ववेद (४.२१.३) में कहते हैं, ‘तस्कर उन्हें हानि नहीं पहुंचा सकते – न दमाति तस्करो। अस्त्र गायों को क्षति नहीं पहुंचा सकते। आगे कहते हैं ‘गायो पर आघात न करें।’ (वही ४) समाज के सभी वर्ग गो प्रेमी व गोपालक थे। संभवतः समाज के विद्वानों में गोपालन व आदर की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही थी। अथर्ववेद (५.१८) में ब्रह्मगवी सूक्त है। ब्रह्मगवी का अर्थ ब्राह्मण की गाय है। कहते हैं, ‘गाय तिरस्कार योग्य नहीं होती।’ (वही ३) बताते हैं, गाय को पीड़ित करने वाले राष्ट्र का तेज मर जाता है। उस राष्ट्र में वीर नहीं होते – तेजो राष्ट्रस्य निर्हन्ति न वीरो जायते वृषा’ (५.१९४) ऐसे गोसंवर्द्धक वातावरण में गोमांस भक्षण की बातें काल्पनिक हैं।
खाद्यान्नों की अनुभव सिद्ध सूची थी। फल और दूध से बने पदार्थ थे। भोजन के नियम भी विकसित किए गए थे। ऋषि कवि अथर्वा रचित एक सुंदर आध्यात्मिक भौतिक सूक्त (१५.१४) पठनीय है। इस सूक्त में व्रात्य श्रेष्ठ व्यक्ति या देवता हंै। स्मृतियों में व्रात्य का अर्थ व्रत न मानने वाला है। लेकिन अथर्ववेद में व्रात्य आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न है। अथर्ववेद का पूरा १५वां काण्ड व्रात्य को समर्पित है। इस सूक्त में ‘व्रात्य’ की गति का वर्णन है। बताते हैं ‘व्रात्य पूर्व दिशा की ओर चला। वायु के अनुकूल चलते हुए उसने अपने मन को अन्न भक्षण करने वाला बनाया जो इस विषय के जानकार हैं वह पूरे मन से अन्न खाते हैं।’ (वही १ व २) भोजन में मन की महत्ता है। बेमन भोजन उचित नहीं। आगे कहते हैं, ‘वह दक्षिण दिशा की ओर चला। उसने बल को अन्नाद बनाया। जो यह बात जानते हैं, वह बल सामर्थ्य से अन्न खाते हैं।’ (वही ३-४) भोजन में बल ध्यान जरूरी है। फिर कहते हैं, ‘वह पश्चिम चला। उसने जल को अन्नाद बनाया। जो यह बात जानते हैं, वे अन्न के साथ उचित मात्रा में जल लेते हैं।’ (वही ४-५) भोजन में जल रस जरूरी है।
भोजन में मन, बल और जल की भूमिका है। यह आधुनिक काल की संतुलित भोजन धारणा से श्रेष्ठ है। भोजन के पोषक तत्व ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। भोजन के समय इधर-उधर का ध्यान व्यर्थ है। अथर्वा ने सप्त ऋषियों, स्वधा, स्वाहा आदि को भी अन्न भक्षण से जोड़ा है। एक मंत्र (वही ९-१०) में पृथ्वी को अन्नमयी बनाने का उल्लेख है, ‘जो यह बात जानते हैं कि वे विराट पृथ्वी की अनुकम्पा से अन्न सेवन करते हैं।’ भोजन के समय उत्साह का महत्व भी है ‘जो यह बात जानते हें वे उत्साहपूर्वक भोजन करते हैं।’ (वही १९-२०) इस सूक्त में बार-बार भोजन विषयक ज्ञान की बातें दोहराई गई हैं – ‘जो यह बात जानते हैं’ इस सूक्त के प्रत्येक मंत्र की टेक है। अंतिम मंत्र संपूर्ण ज्ञान पर है, ‘जो इस तथ्य को जानता है, वह ब्रह्म ज्ञान द्वारा अन्न का सेवन करता है।’ (वही २४) अन्न विज्ञान की जानकारी जरूरी है। इसके साथ अन्न सेवन की विधि का ज्ञान और भी आवश्यक है। अन्न सेवन के समय के मनोभाव का ज्ञान स्वस्थ रखता है। अथर्ववेद के ऋषियों ने इस विषय के सभी पहलुओं पर विचार किया था।