गुलाम कश्मीर की आजादी जरूरी

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इंदौर में कहा है कि ‘जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-३७० हटाए जाने के बाद अब सरकार जल्द ही पाक अधिकृत कश्मीर पर बड़ा कदम उठा सकती है। क्योंकि पीओके हिंदुस्थान का हिस्सा है और उसे हिंदुस्थान में मिलाना हमारा दायित्व है। इस विलय के संबंध में सर्वसम्मति से संसद में प्रस्ताव भी पारित होते रहे हैं। १९९४ में पीवी नरिंसह राव की सरकार केंद्र में रहने के दौरान इस बाबत एक प्रस्ताव पारित हुआ था। चूंकि पीओके हिंदुस्थान का हिस्सा है इसलिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके क्षेत्र की बनाई गई चौबीस सीटें फिलहाल खाली रखनी पड़ती हैं।’ जावड़ेकर का यह बयान हिंदुस्थान सरकार के पीओके के परिप्रेक्ष्य में भविष्य का नजरिया स्पष्ट करनेवाला है। इस बयान से पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वह कश्मीर में दखल देने की बजाय पीओके को यथास्थिति में बनाए रखने के लिए सजग रहे। दरअसल हिंदुस्थान कश्मीर मुद्दे पर अब तक नाकाम इसलिए रहा क्योंकि उसने आक्रामकता दिखाने की बजाय रक्षात्मक रवैया अपनाया हुआ था। इससे लाखों पंडितों को विस्थापन का दंश तो झेलना पड़ा ही, यह पूरा इलाका आतंक व अलगाव की चपेट में भी आ गया। नतीजतन ४२,००० से भी ज्यादा लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि विभाजन की जिस अव्यावहारिक व अप्राकृतिक मांग के आगे नेहरू समेत हमारे तत्कालीन नेता जिस तरह से नतमस्तक होते चले गए, उससे न केवल जम्मू-कश्मीर, बल्कि पाक अधिकृत कश्मीर, हिंदुस्थान, पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी विभाजन का दर्द झेलना पड़ा है। जबकि विभाजन के समय ही यह साफ लगने लगा था कि यह अखंड भारत की विरासत को खंडित करने की अंग्रेजी हुकूमत की कुटिल चाल है। बावजूद इसके कांग्रेस नेता यह नहीं समझ पाए कि जो शेख अब्दुल्ला ‘मुस्लिम कॉन्प्रâेंस’ का गठन कर कश्मीर की सामंती सत्ता से मुठभेड़ कर रहा है, उसे शह मिलती रही तो वह भस्मासुर भी बन सकता है? १९३१-३२ में शेख की मुलाकात नेहरू तथा खान अब्दुल्ल गफ्फार खान से हुई। इन्हें सीमांत गांधी भी कहा जाता है। इस गुफ्तगू से शेख को इतनी ताकत और दृष्टि मिली कि शेख ने अपनी स्वार्थर्पूित के लिए ‘मुस्लिम कॉन्प्रâेंस’ से मुस्लिम शब्द हटा दिया और ‘नेशनल’ जोड़ दिया, जिससे राष्ट्रीयता का भ्रम हो। इसी समय जिन्ना ने पृथकतावादी अभियान चला दिया। फिरंगी शासक तो चाहते भी यही थे कि हिंदुस्थान की आजादी धर्म के आधार पर बंटवारे की परिणति में हो। आमतौर से ऐसा माना जाता है कि कश्मीर समस्या १९४७ के बाद पनपी व विकसित हुई जबकि वास्तव में इसकी शुरुआत जम्मू-कश्मीर के महाराजा गुलाबिंसह के दरबार में ‘आंग्रेज रेजिमेंट’ की नियुक्ति के साथ ही हो गई थी। िंकतु अंग्रेज नाकाम रहे। इसी समय दुर्भाग्य से कश्मीर के गिलगिट क्षेत्र के राजा रणवीर िंसह का देहांत हो गया। अंग्रेजों ने शोक में डूबे राज-परिवार की इस कमजोरी को एक अवसर माना और सक्रियता बढ़ा दी।
दरअसल अंग्रेजों ने १८८५ में ही यह योजना बना ली थी कि किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर के दुर्गम व सुरक्षित क्षेत्र गिलगिट व बाल्टिस्तान पर कब्जा करना है, जिससे अमेरिका की सैन्य गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित स्थान मिल सके। अमेरिका इसे सोवियत संघ पर शिकंजा कसने की दृष्टि से उपयुक्त क्षेत्र मान रहा था। लिहाजा अंग्रेजों ने षडयंत्रपूर्वक इस क्षेत्र को ‘गिलगिट एजेंसी’ नाम देकर १८८९ में अपने कब्जे में ले लिया। इसके अधीनता में आते ही िंसधू नदी के पूर्व और रावी नदी के पश्चिम तट तक समूचे पर्वतीय भू-भाग पर अंग्रेजों का नियंत्रण हो गया। इस समय गिलगिट में प्रतापिंसह राजा रणवीर िंसह के उत्तराधिकारी के रूप में शासक थे। प्रतापिंसह अंग्रेजों की साजिश का शिकार हो गए। गुलाब िंसह की मृत्यु के बाद हरििंसह जब राजा बने तो १९२५ में उनकी आंखें खुलीं और गिलगिट की साजिश को समझा। तब हरििंसह ने हिम्मत व सख्ती से काम लेते हुए अपनी सेना गिलगिट भेजकर अंग्रेजी सेना को गिलगिट छोड़ने को विवश कर दिया और यूनियन जैक उतारकर कश्मीरी झंडा किले पर फहरा दिया।
जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय नेहरू के हाथ में होने के कारण असमंजस में रहा। डोगरा राजा हरििंसह जहां कश्मीर की स्वतंत्र राज्य की परिकल्पना कर रहे थे, वहीं उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक पाकिस्तान के साथ विलय पर विचार कर रहे थे, क्योंकि उनकी पत्नी यूरोपियन थीं, इसलिए उनकी आंखें मूंद गई थीं। उन्होंने २६ अक्टूबर १९४७ को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद २७ अक्टूबर १९४७ को कबायलियों को बेदखल करने के लिए हवाईजहाज से सेना भेज दी गई। भारतीय सैनिकों ने कबायलियों को खदेड़ दिया, िंकतु दुर्गम क्षेत्र होने के कारण मुजफ्फराबाद का पीओके, गिलगिट व बाल्टिस्तान क्षेत्र पाक के कब्जे में बना रहा। इस परिप्रेक्ष्य में नेहरू जल्दबाजी में संयुक्त राष्ट्र्र संघ चले गए। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने इसे विवादित क्षेत्र घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप युद्धविराम तो हो गया, लेकिन कश्मीर की शासन व्यवस्था को लेकर नेहरू, हरि िंसह और शेख के बीच ‘दिल्ली समझौता’ हुआ। अब वह समय आ गया है, जब गुलाम कश्मीर माने जानेवाले पीओके, गिलगिट व बाल्टिस्तान को पाक के शिकंजे से मुक्त कराकर जम्मू-कश्मीर का हिस्सा बनाया जा सकता है।