‘गे’ का खून नहीं चलेगा

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही धारा ३७७ को रद्द कर दिया है, लेकिन कुछ मामलों में गे समुदाय अब भी उपेक्षा का शिकार है। यह मामला रक्तदान से जुड़ा है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) द्वारा तय किए गए और महाराष्ट्र स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (एसबीटीसी) द्वारा ब्लड बैंकों को दिए गए नए फॉर्म में स्पष्ट रूप से यह लिखा है कि यदि गे (एक पुरुष दूसरे पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाना) है तो उसका खून नहीं चलेगा क्योंकि वे `उच्च जोखिम समूह’ में आते हैं।
बता दें कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्था (नाको) की नियमावली पहले भी ‘उच्च जोखिम समूह’ की बात अपने नियमावली में की थी लेकिन उसमें स्पष्टता नहीं थी। अब रक्त लेने के पहले भरे जानेवाले नए फॉर्म में पुरुष रक्तदाताओं से यह प्रश्न भी पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं? यदि वे हां बोलते हैं तो उनका खून नहीं लिया जाएगा। मुंबई जिला एड्स नियंत्रण सोसाइटी (एमडैक्स) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि `एक से ज्यादा लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाना, असुरक्षित सेक्स, ऐनल सेक्स के चलते गे या कोई भी व्यक्ति में एचआईवी, हेपेटाइटिस बी व सी बीमारी होने का खतरा बना रहता है और वे उच्च जोखिम समूह में आते हैं।’ गे, लेस्बियन, बाय सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) के समुदाय हमसफर ट्रस्ट के प्रमुख अशोक कवि ने कहा ‘ यह नियमावली गलत है और इसके विरोध में हमने नाको को पत्र भी लिखा है। रक्त लेने के पहले जो पूछताछ की जाती है उसमें यह नहीं पूछा जाए कि आप गे है या नहीं? इस प्रश्न को अलग तरीके से पूछा जाए। जैसे आप असुरक्षित सेक्स करते हैं क्या? अनेक सेक्स पार्टनर्स है क्या? यदि आप फॉर्म के जरिए सीधे-सीधे पूछेंगे तो यह भेदभाव होगा।