गैरकानूनी ‘सीबीआई’ को रोकेगा कौन?

‘सीबीआई’ को लेकर इस समय देश का माहौल गरम है। सत्ताधीशों का ‘पोपट’ ऐसी पहचान सीबीआई की हो गई है। विपक्षियों को झुकाने के लिए सीबीआई का प्रयोग किया जाता है लेकिन सीबीआई संस्था असंवैधानिक और गैरकानूनी है। उसी पर यह एक प्रकाश ज्योति…

‘सीबीआई’ मतलब केंद्रीय गुप्तचर संस्था पर पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। जिसकी सत्ता दिल्ली में आती है, उसके ‘पोपट’ के रूप में काम करनेवाली संस्था की पहचान बन जाती है। भाजपा का राज है लेकिन जब कांग्रेस का राज था तो सीबीआई के दुरुपयोग पर भाजपावाले जोरदार टिप्पणी करते थे। आज भाजपा की सत्ता क्या अलग कर रही है? सीबीआई जैसी संस्था के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक विरोधियों को जेल में बंद करने और स्वत: के रास्ते का कांटा दूर करने का काम हो रहा है। सीबीआई को आदेश देनेवाला कौन? वे प्रत्यक्षरूप से सरकार में मंत्री के रूप में नहीं हैं लेकिन पार्टी के कार्यालय में बैठकर यह सब कार्य कर रहे हैं। कोलकाता में पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के घर पर सीबीआई का दस्ता अचानक पहुंच गया। उनसे शारदा चीटफंड मामले की पूछताछ करनी थी लेकिन पुलिस आयुक्त की जांच-पड़ताल करने के लिए पहुंचे सीबीआई पथक के पास ‘समन्स’ ही नहीं था इसलिए कोलकाता पुलिस ने सीबीआई के लोगों को गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया। उसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता सड़क पर उतरीं और आगे का सारा तमाशा पूरे संसार ने देखा। इस पूरे प्रकरण में जो भी मामले सामने आए वे दुर्भाग्यपूर्ण थे! सीबीआई जैसी संस्था आज ‘बेईमान’ घोषित हुई, वह भी राजनीतिक प्रयोग के कारण। कोलकाता में सीबीआई की गिरफ्तारी हुई लेकिन दो महीने पहले सीबीआई के कार्यालय में सीबीआई ने ही ताला लगा दिया था और अपने से बड़े अधिकारियों पर अपराध दर्ज किया था। यह अपराध हफ्ताखोरी, घूसखोरी का है अगर यह देखा जाय तो राजनेताओं की भ्रष्ट गंगा को स्वच्छ करने का अधिकार सीबीआई के पास रहता है क्या?

शासक शैतान हो जाते हैं
सीबीआई जैसी संस्था शासकों की उंगली पर नाचनेवाली बनती जा रही है और उन्हें ‘ईडी’ मतलब प्रवर्तन निदेशालय का साथ मिलता है तो राजनेता शैतान बन जाते हैं। चुनाव जीतने के लिए और सत्ता उलट-पुलट करने के लिए इन संस्थाओं का दुरुपयोग होता है। नैतिकता व साधनशुचिता शब्द जिन्होंने राजनीति में प्रयोग किया, वे ही नैतिकता के हत्यारे साबित हुए। क्योंकि कोई भी राजव्यवस्था इंसान ही चलाता है। राजशाही, हुकूमशाही, राष्ट्रपति पद्धति का लोकतंत्र या संसदीय लोकतंत्र इन सभी पद्धतियों में कुछ न कुछ गुण-दोष हैं लेकिन एकाध राज पद्धति सफल होगी या नहीं, यह उस पद्धति के गुण-दोष पर जितना निर्भर करता है उतना ही उसे लागू करनेवाले व्यक्ति के गुण-दोष पर निर्भर करता है, ऐसा फिर सिद्ध हो गया है। सत्ता परिवर्तन होता है तब प्रधानमंत्री सबसे पहले सीबीआई व गुप्तचर विभाग के प्रमुख पद पर अपने आदमियों को लाता है फिर इसी पद्धति से वह चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक के प्रमुख को बदल कर अपने खास अधिकारियों को बैठा देता है। इसके पीछे का मकसद रहता है कि विरोध करनेवालों के मन में दहशत पैदा हो। पश्चिम बंगाल में चिट फंड घोटाले में २० लाख लोगों का घर उजड़ गया और पश्चिम बंगाल के सभी राजनीतिक पार्टियों के लोगों ने शारदा चिट फंड कंपनी से ‘लाभ’ लिया। शारदा चिट फंड के प्रमुख लाभार्थी मुकुल रॉय कल तक ममता बनर्जी के दाहिने हाथ थे, वे आरोपी हैं। आज वे भाजपा की गोद में जा बैठे हैं और चिटफंड घोटाले का दाग लिए हुए वे वाल्मिकी बनकर बैठे हैं। दूसरे प्रमुख आरोपी हेमंत बिस्व सरमा ने तीन करोड़ का लाभ लिया, ऐसा प्रमाण है ये महाशय भी भाजपा में चले गए और इस समय आसाम के उपमुख्यमंत्री हैं। सीबीआई ने उन्हें सीधे-सीधे अभय दे दिया है और कोलकाता आयुक्त के घर जब सीबीआई गई तब राजनीति सड़क पर आ गई। पश्चिम बंगाल में ममता ने पहले अमित शाह की रथयात्रा रोक दी। मोदी का विरोध किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हेलिकॉप्टर उतरने नहीं दिया तब भाजपा ने पुलिस आयुक्त के घर सीबीआई के लोगों को भेजा, ऐसा आरोप है। ममता बनर्जी व उनकी तृणमूल कांग्रेस कल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल होने का निर्णय लिया तो यही ममताबाई भाजपा के लिए ‘संत’ साबित होंगी। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव की युति के कारण राजनीतिक संकट पैदा होते ही दोनों के घर ‘ईडी’ के अधिकारी घुस गए। श्री लालू यादव चारा घोटाले मामले में जेल में हैं, उनको जमानत नहीं मिलने दी जा रही है। ‘२०१९ का चुनाव होने तक लालू यादव को जमानत नहीं मिलने दें। सीबीआई को ऐसा आदेश है’, ऐसी दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में खुलेआम चर्चा चल रही है। न्यायालय से लेकर रिजर्व बैंक तक और सीबीआई से लेकर चुनाव आयोग तक संस्थाओं का दुरुपयोग शुरू है और इस पर कोई बोलता है तो उसे अपराधी माना जाता है। मध्य प्रदेश के पुलिस महासंचालक पद पर जिस ऋषि कुमार शुक्ला नामक अधिकारी को वहां के मुख्यमंत्री ने दूर कर दिया था। उनको ही अब सीबीआई का नया संचालक नियुक्त किया, यह सब कांग्रेस को परेशान करने के लिए। श्री शुक्ला के कार्यक्षमता के बारे में शंका नहीं है लेकिन बड़े पदों पर राजनीति होती है और प्रतिष्ठा गिरती है।

सब कुछ गैरकानूनी
पश्चिम बंगाल में सीबीआई का दस्ता गैरकानूनी ढंग से पुलिस आयुक्त के घर में घुसा। ममता बनर्जी ने कहा कि यह संविधान के बाहर है। देश का संविधान खतरे में है इसी कारण ऐसा नारा दिया गया लेकिन प्रत्यक्ष में सीबीआई को संविधान की मान्यता है क्या? यह प्रश्न हमेशा चर्चा में आता है। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में ‘सीबीआई’ को गैरकानूनी और संविधान के बाहर बताया है। यह निर्णय आज भी कायम है और केंद्र सरकार हाईकोर्ट में सही उत्तर नहीं दे पाई। ९ नवंबर २०१३ को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने यह निर्णय दिया, तब केंद्र ने इस निर्णय पर सिर्फ ‘स्टे’ लिया। कानून के राज में सीबीआई जैसी संस्था को स्थान नहीं है। सीबीआई ठोंक पीटकर तैयार किया गया फौजदार है। कानून और सुव्यवस्था यह राज्य का विषय है। इस कारण केंद्र के ‘सीबीआई’ जैसे पुलिस को तर्कसंगत नहीं मानेंगे लेकिन केंद्र के विभागीय जांच के लिए पुलिस चाहिए इसीलिए ‘सीबीआई’ मामले को लटका कर रखा। राज्य-राज्य की सरकारें जिस तरह से पुलिस का दुरुपयोग करती हैं वैसा ही दुरुपयोग केंद्र सरकार सीबीआई की करती आई है।

छवि क्यों बिगड़ी?
सीबीआई सत्ताधारियों का ‘पोपट’ है, यह छवि मिटने की बजाय और धूमिल हो गई है। सरकार ने एक बार न्यायालय में कहा कि दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (डीएसपीई) एक्ट १९४६ के अनुसार सीबीआई का गठन यह केंद्र सरकार के अधिकार में आता है लेकिन खास बात यह है कि ‘डीएसपीई’ एक्ट में ‘सीबीआई’ शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं है। इस ‘एक्ट’ में कई बार संशोधन हुआ लेकिन सीबीआई के नाम का उल्लेख नहीं है। यह कानून ब्रिटिशों ने बनाया था। दूसरे महायुद्ध के बाद भ्रष्टाचार के कुछ मामलों की जांच करना, इसका मूल उद्देश्य था। इसके बाद अन्य भ्रष्टाचार के मामले भी उसी में घुसा दिए गए। राज भारतीय संविधान के अनुसार चलता है, ऐसा रोज बोलनेवालों को एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि संविधान में कहीं भी किसी प्रकरण में सीबीआई के निर्माण के संदर्भ में कोई उल्लेख नहीं है। इस कारण आज भी सीबीआई को केंद्रीय जांच एजेंसी के रूप में कानूनी या संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है। १९६३ के एक प्रशासकीय आदेश (Executive Order) के बाद सीबीआई का गठन हुआ। संविधानसभा के सदस्य नजीरुद्दीन और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘सीबीआई’ जैसे संस्था के बारे में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘ऐसी एजेंसी केंद्र सरकार के ‘संघसूची’ में रहेगी। इस एजेंसी का कार्य सीमित रहेगा। आपराधिक मामले दर्ज करना या अपराधियों को गिरफ्तार करना, इसका काम नहीं रहेगा। केंद्र सरकार के पास कई अपराधों के संबंध में ज्ञापन आते हैं और जांच करने की मांग होती है। उन मामलों में ‘क्रॉस चेक’ करना इतना ही कार्य सीबीआई का रहेगा।’

सुप्रीम कोर्ट के एक वकील डॉ. एन. एस. चौधरी ने सीबीआई की वैधता को ही चुनौती दी थी। उसी के अनुसार गुवाहाटी हाईकोर्ट ने ६ नवंबर २०१३ को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार के मुकदमे में निर्णय दिया था कि सीबीआई संवैधानिक या कानूनी संस्था नहीं है, उसके पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने जो आगे कहा वह महत्वपूर्ण है। संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती है। हाईकोर्ट ने ‘सीबीआई’ को संपूर्ण रूप से गैरकानूनी घोषित कर दिया था अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देना है तो उसे संविधान के ‘समवर्ती सूची’ में शामिल करना पड़ेगा। सीबीआई को संवैधानिक दर्जा देने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव को मंजूर कराना पड़ेगा। जब तक यह कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती तब तक सीबीआई एक संस्था रहेगी जो केवल सत्ताधारियों के दांव-पेंच और राजनीति की मेहरबानी पर टिकी है। दूसरे भाषा में कहा जाय तो केंद्र का गैरकानूनी पुलिस दल है और राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने के लिए, कानून में हस्तक्षेप करने के लिए तथा विरोधियों पर रौब झाड़ने के लिए इसे बनाया गया है।
सीबीआई मतलब कानून का श्रद्धालु रक्षक नहीं। सीबीआई के कई अधिकारी विवादों में फंसे हैं। संचालक पद पर कार्य करनेवाले व्यक्ति के भी घोटाले बाहर आए और अनेक बड़े उद्योगपति सीबीआई संचालक पद पर अपने आदमी को बैठाने के लिए लॉबिंग करते हैं।
मोदी के राज में यह सब बदलेगा, ऐसा लगता था लेकिन यह गैरकानूनी पुलिस और ज्यादा ही बौखला गई है।
किससे क्या अपेक्षा की जाय!