" /> गोपीचंद करामाती!, भाजपा को जूते !!

गोपीचंद करामाती!, भाजपा को जूते !!

गोपीचंद जासूस नामक एक हिंदी फिल्म आई थी। इस गोपीचंद के कई करतब पर्दे पर दिखे। भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक पर्दे पर एक नया गोपीचंद लेकर आई है और इस गोपीचंद की करामातों के कारण भाजपा पर गांव-गांव में चप्पल खाने की नौबत आ गई है। एकनाथ खडसे को अनदेखा कर जिस गोपीचंद पडलकर को देवेंद्र फडणवीस ने विधायक बनाया था, उस गोपीचंद ने शरद पवार के बारे में अपशब्द कहे और उसका नतीजा राज्य भर में देखने को मिल रहा है। भाजपा के ये गोपीचंद राजनीति या समाज के कोई महान व्यक्तित्व नहीं हैं, लेकिन देवेंद्र फडणवीस ने उनका भाजपा की सुविधा के लिए धनगर समुदाय के एक युवा प्रतिनिधि के रूप में इस्तेमाल किया है। इसलिए इस बात पर संदेह करने की गुंजाइश है कि क्या पवार के बारे में गोपीचंद महाशय द्वारा दिया गया गंदा बयान फडणवीस या उनके भाजपा के ‘मन की बात’ तो नहीं है। गोपीचंद ने शाब्दिक गरारे करते हुए कहा कि शरद पवार महाराष्ट्र को लगे कोरोना हैं। गोपीचंद महाशय कहते हैं, ‘पवार ने हमेशा बहुजन समाज के साथ अन्याय किया है और छोटे समूहों को उकसाने और लड़वाने की नीति अपनाई है।’ गोपीचंद ने कहा, ‘पवार के पास कोई विचारधारा नहीं है, न कोई विजन है और न ही एजेंडा।’ पवार के बारे में गोपीचंद द्वारा दिए गए बयानों को समय-समय पर कुछ भाजपा नेताओं ने भी कहा ही है। गोपीचंद राजनीति में एक कच्चे घड़े थे, ये पता था लेकिन अब यह भी साबित हो गया है कि कच्चा घड़ा फूटा हुआ भी है। पवार के बारे में पडलकर के बयान विवादास्पद हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अक्सर पवार की वरिष्ठता, अनुभव, परिश्रम और समाज नीति की प्रशंसा की है। पवार का महाराष्ट्र और देश में बहुत सम्मान है। मोदी ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा है कि पवार उनके गुरु हैं। गोपीचंद आज भाजपा की बिल में घुसे हैं। पडलकर ने बिल में घुसे गैर विषैले सांप की तरह डंक मारा है। पडलकर ने सांगली में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा। पडलकर तब ऐसा कहते थे कि ‘भाजपा को वोट मत दो और अगर मैं कभी भाजपा के लिए वोट मांगने आया तो मुझे जूतों से मारना।’ बाद में पडलकर भाजपा में शामिल हो गए और बारामती में अजीत पवार के खिलाफ भाजपा के उम्मीदवार बन गए। लेकिन बारामती में धनगर समुदाय की बड़ी संख्या के बावजूद, पडलकर की जमानत जब्त हो गई। इसलिए इस सज्जन के ही एजेंडे व विजन में गड़बड़ हैं। गोपीचंद की आपत्ति यह है कि पवार आरक्षण पर बहुत सकारात्मक नहीं हैं। इसमें पवार का संबंध आया ही कैसे? यह फैसला फडणवीस सरकार को करना था। गोपीचंद ये कैसे भूल गए कि फडणवीस सरकार २०१४ में आई थी और भाजपा ने पहली कैबिनेट में ही धनगर आरक्षण प्रस्ताव का वादा किया था? भाजपा ने बिना किसी अध्ययन, संदर्भ और जनमत के लोगों की भर्ती करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। शरद पवार को लेकर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं। उनकी आलोचना भी की जा सकती है। लोकतंत्र में सभी को यह स्वतंत्रता है, लेकिन जो लोग पवार जैसे वरिष्ठों की आलोचना करते हैं, उन्हें इस तरह के गंदे शब्द बोलने के पहले आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि उनके पैर कहां हैं और उनकी कीमत क्या है? पवार ने बहुजन समाज के कई युवाओं को राजनीति में आगे लाया। यदि नहीं, तो दिवंगत आर.आर. पाटील, जयंत पाटील, धनंजय मुंडे, जीतेंद्र आव्हाड और सुनील तटकरे राजनीति में चमकते नहीं देखे जाते। पवार की कैबिनेट का चेहरा बहुजनों का था। बालासाहेब ठाकरे और शरद पवार ने राजनीति में जमीन से जुड़े बहुजन समाज को सदैव सम्मान दिया। इसलिए ६० से ७० वर्षों तक पवार ने बहुजन समाज को अधर में रखा, ऐसी सोच न केवल मूर्खता का संकेत है, बल्कि मन को कोरोना होने के भी संकेत हैं। इसलिए गोपीचंद की मानसिक स्थिति को समझा जाना चाहिए। भाजपा ने अब यह बता दिया है कि उसका गोपीचंद पडलकर के बयान से कोई लेना-देना नहीं है। यह सबसे बड़ा पाखंड है। ये लोग मोदी की आलोचना करनेवालों को देशद्रोही मानते हैं और जो लोग पवार की आलोचना करते हैं, उनसे पल्ला झाड़ लेते हैं। इससे पहले पंढरपुर के एक भाजपा विधायक प्रशांत परिचारक ने भी सीमा पर डटे सैनिकों की पत्नियों के बारे में निम्नस्तरीय बयान दिया था। वो एक प्रकार से सैनिकों और उनके परिवारों का अपमान ही था। भाजपा ने उस विधायक से पहले दूरी बनाई और फिर उसे पास ले आए। गोपीचंद के मामले में भी ऐसा ही होगा। गोपीचंद के बयानों से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन गोपीचंद हमारा है! कल तक महादेव जानकर तुम्हारे थे। जानकर के मुंह से पवार की आलोचना की। अब उन्हें जानकर नहीं चाहिए क्योंकि वे मुंडे के करीबी हैं। यह भी जातीय राजनीति है। गोपीचंद कहते हैं कि पवार छोटे समूहों का उपयोग करते हैं। तो भाजपा ने गोपीचंद को विधायक क्यों बनाया? यह भी छोटे समूहों का उपयोग करने की राजनीति है। प्रधानमंत्री मोदी भी इस राजनीति में कुशल हो गए हैं। कल प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘बिहार रेजिमेंट’ ने लद्दाख की गलवान घाटी में बहादुरी दिखाई। तो महारों, मराठों, राजपूतों, सिखों, गोरखाओं, डोगरा रेजिमेंट सीमा पर तंबाकू मलते बैठे थे क्या? महाराष्ट्र के वीरपुत्र सुनील काले कल पुलवामा में शहीद हो गए। लेकिन बिहार में चुनाव होने के कारण ही सेना में ‘जाति’ और ‘प्रांत’ का महत्व बताया जा रहा है। इस तरह की राजनीति कोरोना से भी बदतर है! महाराष्ट्र में विपक्ष इस खुजली को खुजलाने का काम कर रहा है। इसलिए भाजपा पर गांव-गांव में जूते खाने की नौबत आ गई है। पता नहीं ये कब सुधरेंगे?