गो हत्या का ‘संशय पिशाच’, सवाल अस्सी सीटों का!

गो हत्या की अफवाहों के चलते उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में सोमवार को उत्पात हुआ और उसमें एक पुलिस अधिकारी सहित एक युवक की बलि चढ़ गई। बुलंदशहर में एक तीन दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। सोमवार को उसका अंतिम दिन था। उसी समय गो हत्या की अफवाह पैâली और जो होना था, वही हुआ। हमारे देश के खेतों में फसलें कई कारणों से नहीं उगतीं लेकिन अफवाह की फसल लहलहाकर आती है। ऊपर से इन अफवाहों के बाजार में अपना हाथ धोनेवाले सही-सलामत छूट जाते हैं। बुलंदशहर में गो हत्या की आशंका के चलते जो हिंसाचार हुआ, उसमें भी ऐसा ही कुछ हुआ है क्या? इस हिंसाचार के कंधे पर बंदूक रखकर किसी ने किसी का ‘गेम’ किया है क्या? अब ऐसे कई सवाल किए जा रहे हैं। जिस सुबोध कुमार सिंह नामक पुलिस अधिकारी की इस हिंसाचार में बलि चढ़ी है, उसके भाई और बहनों ने कई आरोप लगाए हैं। २०१५ में उत्तर प्रदेश के दादरी में हुई अखलाख हत्या की तफ्तीश सुबोध कुमार सिंह ने ही की थी। गो मांस रखने के संदेह के चलते उस समय भीड़ ने अखलाख की निर्मम हत्या कर दी थी। उस मामले के आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए सुबोध कुमार ने सख्त भूमिका अपनाई थी, ऐसा अब कहा जा रहा है। ऐसे में बुलंदशहर का उत्पात, उसमें सुबोध कुमार की चढ़ी बलि और अखलाख मामले में हुई कार्रवाई का एक-दूसरे से संबंध है क्या ऐसा सवाल अब पूछा जा रहा है। इसका नतीजा पुलिस जांच में ही आएगा लेकिन गो हत्या का यह ‘संशय पिशाच’ देश में और कितने जातिगत हिंसाचार करवाएगा? कितने माासूमों की बलि उसमें चढ़नेवाली है? गो माता हिंदुओं की श्रद्धा विषय अवश्य हैं। मगर जिस गाय के शरीर में ३३ करोड़ देवता निवास करते हैं, उस गाय के नाम से इंसान दानव बनकर उन्माद वैâसे पैâला सकता है? यह किस धर्म तत्व में आता है? गो हत्या करने या गो मांस रखने का सिर्फ संदेह होने के चलते किसी की बलि लेने का वह प्रमाण-पत्र कैसे हो सकता है? दो वर्ष पूर्व खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ही ‘गो रक्षा के नाम पर ८० प्रतिशत लोग गोरखधंधा करते हैं, ऐसे संगठनों की सूची बनाकर ऐसे लोगों के खिलाफ सरकार को सख्त कार्रवाई करनी होगी।’ ऐसा स्पष्ट किया था। मगर मोदी द्वारा कान उमेठे जाने के बावजूद तथाकथित गोरक्षकों का उन्माद कम नहीं हुआ है। यही बात बुलंदशहर के हिंसाचार से दिखाई देती है। गो रक्षा के नाम पर उन्माद पैâलानेवालों को भी बाद में कानून के डंडे, जेल की आंच सहन करनी पड़ती है। वे लोग सही-सलामत रहते हैं, जो गो रक्षा की आड़ में हिसाब चुकता करते हैं और उसके द्वारा धार्मिक ध्रुवीकरण कर वोटों की रोटियां सेंकते हैं। अब २०१९ के लोकसभा चुनाव के नगाड़े बजने लगे हैं। यह चुनाव हमारे लिए आसान नहीं, ये बात सत्ताधारी भाजपावालों की समझ में आ गया है। उसी के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण वाला हमेशा का हथियार इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है न? गो मांस और गो हत्या जैसे मुद्दे गोवा, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल, त्रिपुरा जैसे राज्यों में भी हैं क्योंकि वहां तो खुलेआम गोमांस खाया जाता है। मगर उन राज्यों में कभी उस मुद्दे पर उत्पात नहीं मचा। मॉब लिंचिंग जैसा मामला नहीं हुआ क्योंकि उन राज्यों में लोकसभा की सीटें ‘एकांकी’ हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं है। इस एक ही राज्य में लोकसभा की करीब ८० सीटें हैं इसलिए दिल्ली की सत्ता की चाबी उत्तर प्रदेश के हाथ होती है। २०१४ में ८० में से ७१ सीटें जीतने के कारण ही भाजपा केंद्र की बहुमतवाली सरकार बन सकी। मगर २०१९ में उसकी पुनरावृत्ति होने की संभावना नहीं। ऊपर से सारे विरोधी एक हो गए तो भाजपा की हार हो सकती है, यह बात ‘वैâराना’ लोकसभा उपचुनाव ने स्पष्ट कर दी है। इसलिए २०१४ के चुनाव से पहले जिस तरह ‘मुजफ्फरनगर’ और बीच के दिनों में ‘वैâराना’ कराया गया, वैसा अब ‘बुलंदशहर’ में कराया जा रहा है क्या? उत्तर प्रदेश की ८० सीटें २०१९ में भी भाजपा के लिए ‘गेम चेंजर’ होनेवाली हैं। उसी के लिए गो हत्या का ‘संशय पिशाच’ लोगों की गर्दन पर बैठाकर धार्मिक उन्माद का और वोटों के ध्रुवीकरण का वही रक्तरंजित ‘पैटर्न’ फिर से चलाने की कोशिश शुरू है क्या? आखिरकार सवाल उत्तर प्रदेश की ८० सीटों का और केंद्र के सत्ता सोपान का है।