घाटी से मिलेगी जिंदगी की घुट्टी

किसी भी देश, राज्य और शहर का विकास वहां होनेवाले उद्योग पर निर्भर होता है। आज से ३० साल पहले कश्मीर में भी उद्योग को धीरे-धीरे बढ़ावा मिल रहा था। १९७१ में कश्मीर घाटी में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए एचएमटी घड़ियां बनाने का प्लांट लगा था लेकिन आज से करीब ३० साल पहले जब घाटी में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने लगीं और आतंकवाद अपने चरम पर पहुंचने लगा तो यहां लोगों को मिलनेवाले रोजगार के अवसर भी धीरे-धीरे समाप्त होते गए। आतंकवाद के कारण जम्मू में भी कई उद्योग बंद हो गए लेकिन एक बार फिर जम्मू और कश्मीर में उद्योग के जरिए विकास की उम्मीद जगी है। माना जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर ठंडा प्रदेश होने के कारण यहां दवा उद्योग के अवसर को बढ़ावा मिलेगा। जब से कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद ३७० के दो खंडों को खत्म कर दिया गया है तब से राज्य के औद्योगिक विकास की उम्मीद काफी बढ़ गई है। जम्मू-कश्मीर में फार्मा उद्योग के विकास की काफी संभावनाएं बढ़ गई हैं। जम्मू पहले से ही फार्म उद्योग का एक बड़ा केंद्र रहा है और अब पूरे राज्य में इसके विकास की संभावना जताई जा रही हैं, जो कि यहां के विकास और रोजगार के लिहाज से काफी बेहतर साबित होगा। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में फार्मा उद्योग का बाजार करीब १,२०० से १,४०० करोड़ रुपए का है। इसकी तुलना में महाराष्ट्र और यूपी जैसे बाजार करीब २० गुना ज्यादा हैं। जम्मू दवा उद्योग का प्रमुख केंद्र है और यहां ल्यूपिन, सन फार्मा, वैâडिला फार्मास्यूटिकल्स जैसी कई कंपनियों के कारखाने हैं। जम्मू में कुल ऐसी करीब ५० पैâक्ट्रि‍यां हैं, जिनमें से कुछ स्थानीय निर्माता भी हैं। जम्मू और कश्मीर ठंडा प्रदेश होने के कारण यहां बिजली की खपत कम होती है। साथ ही यहां देश के अन्य राज्यों के मुकाबले बिजली सस्ती है। आज देश के ज्यादातर स्थानों पर जल संकट का माहौल बना हुआ है और बिजली की लागत भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है क्योंकि बिजली पैदा करने का एक मूल स्रोत पानी भी है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर इस मामले में काफी बेहतर है। जम्मू में बिजली करीब २ रुपए प्रति यूनिट मिलती है जबकि देश के अन्य इलाकों में बिजली ६ से ७ रुपए प्रति यूनिट मिलती है। इसकी वजह यह है कि यहां पनबिजली का काफी विकास हुआ है। यहां साल के ज्यादातर समय ठंडा मौसम रहने के कारण जम्मू-कश्मीर में बिजली की खपत भी कम होती है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर दवा उद्योग के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। जम्मू-कश्मीर में फार्मा सेक्टर का विकास काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार संभावित निवेशकों को किस तरह का प्रोत्साहन देती है। ठंडा मौसम दवा उद्योग के लिए काफी मुफीद होता है क्योंकि यह तापमान के प्रति संवेदनशील माने जानेवाली वैक्सीन्स के उत्पादन के लिए आदर्श माहौल पेश करता है। फिलहाल जम्मू की ज्यादातर दवा पैâक्ट्रियां एक्यूट केयर से जुड़ी दवाइयां बनाती हैं। इनमें से करीब ६५-७० फीसदी कारखाने गैस्ट्रो इंटेस्ट‍िनल और एंटीबायोटिक्स जैसे मेजर थेरेपी में हैं। गंभीर बीमारियों की बात करें तो ज्यादातर दवाइयां कॉर्डियोलॉजी से जुड़ी हैं, जिसका यहां बड़ा बाजार है। ज्यादातर दवा कंपनियां जम्मू से और कुछ श्रीनगर से संचालित होती हैं। जम्मू-कश्मीर में दवा उद्योग के लिए अपनी निवेश योजना को आगे बढ़ाने से पहले कुछ इंतजार करने की नीति निवेशकों को जरूर अपनाना चाहिए। फिलहाल सबकी नजर केंद्र सरकार पर है कि आगे वह निवेशकों को आकर्षित करने के लिए किस तरह की सहूलियत देती है।
केंद्र सरकार जेनरिक दवाओं के निर्यात में देश की स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए छोटी दवा कंपनियों को तकनीकी तौर पर मजबूत बनाने और इन कंपनियों का कारोबार बढ़ाने पर फोकस कर रही है। ऐसे में हो सकता है कि सरकार छोटी दवा कंपनियां जो जेनेरिक दवाइयों का उत्पादन करती है। उन्हें जम्मू-कश्मीर में उद्योग चलाने का मौका दे। २०१४ की एक रिपोर्ट के अनुसार दवा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए काम करनेवाला संगठन फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) इसके लिए वाणिज्य मंत्रालय के साथ मिल कर एक योजना पर काम भी काफी समय से कर रहा है। वैश्विक बाजार में जेनरिक दवाओं के निर्यात के मोर्चे पर देश की स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए छोटी दवा कंपनियों को तकनीकी तौर पर आधुनिक बनाए जाने की जरूरत है। इसके अलावा सरकार छोटी दवा कंपनियों का उत्पादन बढ़ा कर बड़ी कंपनियों की वैâटेगरी में लाने पर भी फोकस करे तो ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि अन्य दवाइयों कि अपेक्षा जेनेरिक दवाइयां किफायती होती हैं।