घाव : अन्याय!, सजा भुगतने के बाद साबित हुआ निर्दोष

न्याय मिलने में देरी अन्याय समान ही है। खासकर तब, जब किसी आरोपी को निचली अदालत दोषी मानकर सजा सुना दे और उक्त सजा भुगतने के बाद ऊपरी अदालत उस आरोपी को दोषमुक्त करार दे दे। ऐसे मामले में आरोपी को जो यातनाएं सहनी पड़ती हैं, उसका भुगतान किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता है। मुंबई से सटे ठाणे जिला स्थित शाहपुर तालुका निवासी एक बढ़ई (कारपेंटर) के मामले में कुछ ऐसा ही देखने को मिला है।
नाबालिग लड़की का अपहरण और बलात्कार करने के बाद उसे खुदकुशी के लिए मजबूर करने के मामले में सत्र न्यायालय ने जिस आरोपी को दोषी माना और १० साल की सजा सुनाई थी। सजा भुगतने के बाद ऊपरी अदालत ने उस आरोपी को दोषमुक्त करार दिया। ठाणे जिले के शहापुर तालुका स्थित रासगांव निवासी मधुकर बसवंत बरोरा नामक युवक को कल्याण स्थित सत्र न्यायालय ने १० साल की सजा दी थी। उक्त सजा के खिलाफ मधुकर ने उच्च न्यायालय में गुहार लगाई थी। उक्त अपील पर सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति साधना जाधव ने मधुकर को निर्दोष मानते हुए मुक्त करने का आदेश दिया है। इस आदेश से मधुकर को अपहर्ता एवं बलात्कारी होने के कलंक से मुक्ति तो मिल गई लेकिन गुनाह न करने के बाद भी लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरने तथा १० साल की सजा लगभग भुगतने के बाद।
मधुकर की बस्ती में रहनेवाली एक नाबालिग लड़की ने १३ अक्टूबर, २००९ को भोर के समय अपने घर के आंगन में खुद को जला लिया था। ८२ फीसदी जलने के कारण ठाणे सिविल अस्पताल में १९ अक्टूबर २००९ को उक्त लड़की की मौत हो गई थी। मरने से पहले लड़की द्वारा दिए गए बयान के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया था। बाद में पुलिस ने मधुकर को गिरफ्तार किया था। मरने से पहले मृतका द्वारा दिए गए बयान एवं अन्य गवाहों की गवाही के आधार पर कल्याण सत्र न्यायालय ने मधुकर को दोषी माना था तथा से १० साल वैâद की सजा सुनाई थी। सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ मधुकर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। अपील की सुनवाई के दौरान न्या. जाधव ने अभियोग पक्ष के कई गवाहों एवं सबूतों को अविश्वसनीय माना। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि अभियोग पक्ष द्वारा तमाम गवाहों की गवाही तथा सबूत पेश किए जाने के बाद भारतीय दंड प्रक्रिया की संहिता की धारा ३१३ के तहत न्यायाधीश के समक्ष आरोपी से जिरह होती है तथा उसका बयान दर्ज किया जाता है लेकिन मधुकर के मामले में सजा सुनाने से पहले यह जरूरी नहीं समझा गया। सत्र न्यायाधीश ने मधुकर को मृतका द्वारा मरने से पहले उसके खिलाफ दिए गए बयान की जानकारी ही नहीं दी गई थी। लिहाजा मधुकर को आरोपों का खंडन करने तथा अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं मिला, जबकि इस दौरान सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई १० साल की सजा भी लगभग खत्म ही हो चुकी थी। इस लापरवाही पर गौर करते हुए न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि सुनवाई के दौरान न्यायालयीन प्रक्रिया में हुई गलतियों को सुधारने के लिए यह मामला सत्र न्यायालय में दोबारा भेजे जाने से अब कुछ भी हासिल नहीं होगा क्योंकि न्यायालय द्वारा दी गई सजा मधुकर भुगत चुका है। ऐसे हालात में मधुकर की अपील स्वीकार करके उसकी निर्दोष मुक्तता ही एक मात्र उपाय रह जाता है। ऐसा कहते हुए न्यायाधीश जाधव ने मधुकर को निर्दोष मुक्त करने का आदेश दिया।
न्यायालयीन प्रक्रिया में देरी और लापरवाही का खामियाजा मधुकर को निश्चय ही भुगतना पड़ा है। उसके जीवन के दस अनमोल वर्ष सलाखों के पीछे बीत गए, वह भी एक ऐसे गुनाह के लिए जो उसके अनुसार उसने किया ही नहीं था। अशिक्षित होने के कारण मधुकर को कानूनी प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी इसलिए सत्र न्यायालय द्वारा सुनवाई के दौरान बरती गई लापरवाही के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने में मधुकर ने एक साल की देरी कर दी। उसके द्वारा उच्च न्यायालय में गुहार लगाए जाने के बाद उच्च न्यायालय में अंतिम सुनवाई में और पांच साल निकल गए। दरअसल जेल में बंद आरोपियों की उच्च न्यायालय में अपील के मामलों का अलग से वर्गीकरण किया जाता है, इससे मामले का जल्द से जल्द निपटारा किया जाता है लेकिन मधुकर के मामले में दुर्भाग्य से यहां भी ऐसा नहीं हो सका। मधुकर को जब अपील संबंधित प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिली तो प्रारंभ में उसने अपने खर्चे पर वकील नियुक्त किया था लेकिन बाद में मधुकर को सरकार ने श्रद्धा सावंत नामक वकील प्रदान की। एडवोकेट सावंत ने मधुकर के इंसाफ की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया।