चटोरे हैं मुंबईकर!

होटल का खाना खाने के मामले में मुंबईकर सबसे आगे हैं। इन चटोरे मुंबईकरों में हर परिवार होटल के खाने पर प्रति माह २,८९० रुपए खर्च करता है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह खर्च औसतन ढाई हजार रुपए ही है। करीब ९३ प्रतिशत मुंबईकर बाहर खाना खाने के लिए जाते हैं। ५२ प्रतिशत मुंबईकर अपने परिवार के साथ तो ४८ प्रतिशत मुंबईकर अपने दोस्तों के साथ घर की बजाय बाहर होटल में खाना खाने जाते हैं। इस बात का खुलासा एनआरआई इंडिया फूड सर्विसेज रिपोर्ट २०१९ से हुआ है। इस रिपोर्ट का प्रकाशन कल मनपा आयुक्त प्रवीण परदेशी के हाथों किया गया।

देश की आर्थिक राजधानी मुंबी खाद्य सेवा क्षेत्र में भी सबसे अधिक रोजगार देनेवाला शहर है। इस क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराने में राजधानी बनी मुंबई के ८७,६५० होटलों में करीब ४.२८ लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। एनआरएआई के मुंबई विभाग के प्रमुख अनुराग कटियार बताते हैं कि संगठित खाद्य सेवा के क्षेत्र में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। २०१५-१६ के बाद से यह ४१ प्रतिशत की दर से प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। होटल में खाद्य पदार्थ खाने के प्रति मुंबईकरों में उत्तर भारतीय व्यंजन सबसे अधिक लोकप्रिय है। ३७ प्रतिशत मुंबईकर दक्षिण भारतीय व्यंजन का स्वाद लेते हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर उत्तर भारतीय व्यंजन पसंद किए जाते हैं। ३४ प्रतिशत उत्तर भारतीय तो २९ प्रतिशत चाइनीज खाद्य पदार्थ और २८ प्रतिशत मुगलाई व्यंजन मुंबईकरों की पसंद है।

एनआरएआई आईएफएसआर २०१९ के अनुसार मुंबई का संगठित खाद्य सेवा बाजार ४०,४८० करोड़ रुपए का है जो देश के सभी महानगरों की तुलना में सबसे अधिक है। मुंबई में घर पर भोजन न करने की औसतन बारंबारता प्रति माह ४.२ गुना है, जिसमें होटल में खाना खाने, ऑर्डर के जरिए घर पर ही भोजन मंगाने और पार्सल ले जाना शामिल है। देश के २४ शहरों के १३० से अधिक रेस्टोरेंट के सीईओ व ३,५०० ग्राहकों के साथ किए गए सवाल जवाब के आधार पर ये आंकड़े प्रकाशित किए गए हैं। एनआरएआई के न्यासी समीर कुकरेजा बताते हैं कि २०१८-१९ में देश के होटल उद्योग में ७.३ मिलियन लोग काम करते थे, जो संगठित खाद्य क्षेत्र का ३५ प्रतिशत ही है। असंगठित क्षेत्र के जुड़ने से यह दोगुना हो जाएगा। इस उद्योग का आकार ४,२३,८६५ करोड़ रुपए का था जो ९ प्रतिशत की दर से बढ़ता हुआ २०२२-२३ में करीब ५,९९,७८२ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा।