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‘चाइना टाउन’, बनाम ‘लिटिल इंडिया’

चीन की विदेश और सामरिक नीति के विस्तार में उसकी अर्थनीति एक महत्वपूर्ण घटक है। विश्व भर में फैले चीन मूल के  प्रवासी इस नीति को सफल बनाने का मुख्य आधार हैं जिसका माध्यम विश्व भर में फैले ‘चाइना टाउन’ हैं।  चीन हिंदुस्थान से इतर प्रवासी हिंदुस्थानियों के देश जैसे कि  मॉरीशस, त्रिनिदाद,  फीजी, सूरीनाम, गुयाना आदि के साथ ही विश्व भर के महत्त्वपूर्ण शहरों में एक विशुद्ध चीनी क्षेत्र ‘चाइना टाउन’ को विकसित कर रहा है अथवा कर लिया है, जिसके माध्यम से चीन की संस्कृति, भाषा, वेषभूषा और उत्पादों को उस देश का अंग बना दिया।  इन उपभोक्ताओं के माध्यम से चीन ने उस देश की कूटनीति और व्यापार  नीति को भी चीन के अनुकूल बनाने  का प्रयास किया है।
`चाइना टाउन’ शब्द से प्राय: दुनिया में घूमने वाले सभी लोग परिचित हैं। चाइना टाउन एक अंग्रेजी नाम है किंतु वहां जाने के बाद सभी नामपट्ट मंदारिन भाषा में ही लिखे होते हैं। इनकी भवन निर्माण कला भी चीन से प्रभावित होती है,  प्राय: एक बड़ा सा द्वार बनाया जाता है और उस पर ड्रैगन का चित्र रहता है। यहां पर मुख्यत: चीनी रेस्तरां और चीनी सामान मिलता है, जो प्राय: पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है, क्योंकि वह सामान तुलनात्मक रूप से सस्ता होता है।
चीनी प्रवासी विश्व में जहां-जहां गए, उन्होंने अपने को  सामुदायिक रूप से सशक्त करने के लिए भी चाइना टाउन की स्थापना की, ऐतिहासिक रूप से मनीला में १५९४ में दुनिया का सबसे पुराना चाइना टाउन बना। हिंदुस्थान में भी ब्रिटिश काल के समय से कोलकाता में चाइना टाउन है। ये चाइना टाउन गैर चीनी लोगों की स्वीकार्यता के कारण प्रमुख व्यवसायिक केंद्र बन गए हैं। इसके माध्यम से चीन अपने छोटे-छोटे घरेलू सामान,  चीनी  स्वाद और मंदारिन भाषा को लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुंचा चुका है। अमेरिका में बसे एक मेरे मित्र ने बताया धूम्रपान के शौकीन लोग चीनी सिगरेट का प्रयोग करते हैं, क्योंकि वह सस्ती होती है। इस प्रकार के अनेक छोटे-छोटे उत्पाद पहले चाइना टाउन पहुंचते हैं फिर देश मे व्यापक रूप से जरूरत बन जाते हैं। आज चाइना के साथ अमेरिका के संबंध चर्चा में है। राष्ट्रपति ट्रंप आए दिन चीन को सबक सिखाने की बात भी करते हैं लेकिन सत्य  यह भी है कि न्यूयॉर्क शहर व  न्यू जर्सी सहित  देश के अनेक भागों में लगभग १२ चाइना टाउन हैं। यही स्थिति ब्रिटेन की भी है, मैंने वहां लंदन में एक भव्य  चाइना टाउन देखा है इसकी भव्यता रात को देखते ही बनती है। अपनी तमाम विदेश यात्राओं, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान, इंडोनेशिया, अप्रâीका सहित अन्य देशों मे चाइना टाउन को देख कर कसक भी होती है।
विगत वर्ष मुझे गिरमिटिया कांप्रâेंस के संदर्भ मे फ़ीजी जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। मैंने रास्ते में देखा कि  एक बहुत बड़ी जमीन को घेरा जा रहा था। मैंने कार में चल रहे स्थानीय मित्र से पूछा कि इतना बड़ा भूखंड किस लिए घेरा जा रहा है, क्या बनेगा? उसने बताया कि यहां पर एक चाइना टाउन बनने जा रहा है। मैं हैरान हुआ, क्योंकि फिजी देश में हिंदुस्थानी समुदाय का प्रभाव अधिक रहने के बावजूद चीन समुद्र किनारे अपना एक भव्य चाइना टाउन बनवा रहा है। जिसे वहां की सरकार का भी समर्थन प्राप्त है। चीनी दूतावास के बारे में उसने टिप्पणी की कि जब भी किसी को पैसे की जरूरत होती है तो चीनी राजदूत तत्काल बिना कम औपचारिकताओं के पैसा खर्च कर देते हैं, जबकि अन्य दूतावास समय लगाते हैं। इसलिए लोग चीन की ओर अधिक झुकाव रखने लगे हैं। इसी भांति हिन्दुस्थान वंशियों के देश सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो के उत्तर में चाइना  टाउन विकसित हो रहा है। सूरीनाम दक्षिण अमेरिका का सबसे छोटा देश होने के बावजूद चीन निवेश का एक बड़ा केंद्र है। यहां सभी मॉल, दुकानें, व्यापार  लगभग चीनियों के हाथ में है। साल में एक बार चीनी  नववर्ष के जरिए सूरीनाम का चीनी समुदाय सूरीनाम में चीन की उपस्थिति और उसके व्यापारिक और सामरिक महत्त्व के प्रदर्शन को दिखाता है। यही दृश्य मॉरीशस में भी देखने को मिलता है। नेपाल में भूकंप के बाद मंदिरों तक के जीर्णोद्धार का कार्य चीन ही कर रहा है।
वर्तमान समय में चीन के साथ सामरिक मोर्चे के अतिरिक्त  आर्थिक प्रतिस्पर्धा का भी शंखनाद हो गया है। सोनम  वांगचुक ने जो अपील की है कि चीन को ‘बुलेट’ से नहीं ‘वॉलेट’  से  हराइए।इसका देश की आम जनता पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। गांधी जी ने जिस स्वदेशी के मंत्र से अंग्रेजों को परास्त किया था उसी हथियार से चीन को पस्त करने का आवाहन देश के प्रधानमंत्री से लेकर आमजन तक कर रहे हैं। देश में चीनी उत्पादों के विरूद्ध एक वातावरण तैयार हो रहा है। चीन को आर्थिक मोर्चे पर चुनौती देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद तो चाहिए किन्तु छोटे छोटे उत्पादों की महत्ता भी कम नहीं है। आज  दुनिया भर में हिंदुस्थानी उत्पादों की उपलब्धता आवश्यक है इससे ना केवल हिंदुस्थानी बाजार समृद्ध होंगे बल्कि साथ ही साथ हमारी संस्कृति का भी विस्तार होगा।
विश्व में जहां-जहां हिंदुस्थानी मूल के लोग बसे हैं, वहां पर हिंदुस्थानी बाजार हैं।  अनेक देशों में यह बाजार लिटिल इंडिया के नाम से जाने जाते हैं। सिंगापुर के लिटिल इंडिया का एक विशिष्ट आकर्षण है। इसी प्रकार तमाम देशों में कुछ क्षेत्र हैं जहां पर हिंदुस्थानियों की आबादी के साथ साथ हिंदुस्थानी खानपान का  सामान भी मिलता है। हिंदुस्थानी संगीत और बॉलीवुड की सीडी को अनेक दुकानों पर बिकते हुए देखा जा सकता है, लेकिन जो मैं तुलना  चाइना टाउन से कर रहा हूं, वह नहीं हो पाती है।  जैसे इंडोनेशिया के बाली द्वीप पर अनेक हिंदुस्थानी पर्यटक जाते हैं और  कृष्णा मार्ट जैसे एक-दो बड़े शॉपिंग के ठिकाने हैं, जहां पर हिंदुस्थानी खरीदारी करते हैं । इसका मूल कारण वही  है कि सामान सस्ता मिलता है, लेकिन साथ ही यह भी यथार्थ है कि बहुत सा सामान ‘मेड इन चाइना’ होता है। इन देशों में हिंदुस्थान की तरह त्योहारों का सामान भी मेड इन चाइना मिलता है।  विदेशों  में स्मृति चिन्ह के रूप में खरीदा हुआ सामान जो हम अपने  घर लाते हैं, वह भी अधिकांश मेड इन चाइना होता  है। आज देश में यह जागृति आ रही है।  हमें अपने लघु उद्योगों को सशक्त बनाना होगा, ताकि  उत्पाद की गुणवत्ता और मात्रा में आयात करने की श्रेणी में लाया जा सके।  लिटिल इंडिया सहित तमाम विश्व के बाजारों में भारतीय स्वाद का तो  डंका बजता है, लेकिन उत्पादों का डंका बजना बाकी है। हिंदुस्थानी करी विश्व में बहुत प्रसिद्ध है, अनेक पाकिस्तानी मूल के लोग भी ‘इंडियन रेस्टोरेंट’ के नाम पर अपना रेस्तरां  चलाते हैं। विश्व भर में हमारे त्यौहार धूमधाम से मनाए जाते हैं।  सभी हिन्दुस्थानी होली और दिवाली जैसे त्योहारों को स्थानीय लोगों से मिलकर मनाते हैं, इसमें यदि वे अपने उत्सवों को चीनी सामान से मुक्त कर दें तो यह भी एक उत्सव ही होगा। इन देशों में हमारे छोटे-छोटे सामान की मांग  बढ़ेगी तो भी एक बड़ा उदेश्य पूरा होगा। यह प्रण हमारे लघु उद्योगों के लिए वरदान सिद्ध होगा। इस समय देश में स्वदेशी की भावना प्रबल हो रही है। विश्व में अपनी प्रतिभा का झंडा गाड़ चुके हमारे प्रवासी हिंदुस्थानी बंधु यदि ठान ले तो एक बहुत सशक्त संदेश विश्व भर में जाएगा कि अब लिटिल इंडिया, लिटिल नहीं रहेगा बल्कि यह ‘ग्रेटर  इंडिया’ हो जाएगा। आज आवश्यकता है कि लिटिल इंडिया की अवधारणा को  व्यापक स्वरूप देने की और इसे हिंदुस्थानी कूटनीति और व्यापार नीति का अंग बनाने की, इससे प्रधानमंत्री जी के लोकल से वोकल और ग्लोबल की संकल्पना को मूर्तरूप  देने में सफलता मिलेगी।