" /> चीन पर केंद्र की कशमकश

चीन पर केंद्र की कशमकश

प्रधानमंत्री की माने तो गलवान में चीनी सैनिकों की घुसपैठ नहीं हुई? बीते शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री की अगुवाई में सर्वदलीय बैठक आयोजित हुई। बैठक वर्चुअल थी जिसमें २० सियासी दलों के बड़े नेताओं ने भाग लिया। मुद्दा था चीन के साथ हो रही तनातनी को लेकर आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श करना। बैठक में विपक्ष के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सबसे पहले एक ही सवाल दागा, पूछा चीन बॉर्डर पर क्या हुआ, इतना बड़ा हादसा कैसे हुआ जिसमें बीस सैनिक शहीद हो गए? प्रधानमंत्री ने जबाव दिया कि ‘कुछ नहीं हुआ, सब सामान्य है चीनी सैनिक हमारी सीमा में नहीं घुसे? उनकी बात सुनकर बैठक में वर्चुअल रूप से जुड़े नेता एक एकदम शांत हो गए, एक दूसरे की तरफ तांकने लगे। सोचने लगे चारों तरफ इतना बड़ा हंगामा कटा हुआ और प्रधानमंत्री बोल रहे हैं कुछ नहीं हुआ। कई नेता तो बैठक से डिस्कनेक्ट भी होना चाह रहे थे।
चीन के प्रति केंद्र के लचर रवैये से थोड़ा असमंजस में जरूर डाला हैं। लेकिन बावजूद इसके चीनी सेना की नापाक और कायराना हरकतों के बाद समूचा देश आक्रोशित है। लोगों के भीतर आक्रोश इस कदर बढ़ा हुआ, जिससे उन्होंने चाइना निर्मित उत्पादकों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है। चाइना के सामानों की न लेने की पूरे देश में जैसे मुहिम ही छिड़ गई हो। अब तो मोहल्लों की दुकानों से भी चीन निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार शुरू हो गया है। लेकिन सरकार हल्के में ले रही है। बड़ी घटना को सामान्य घटना बता रही है। सीमा पर बिगड़े हालातों के बाद से देशभर में चाइना के सामनों का बहिष्कार हो रहा है, लोग नारेबाज़ी और पुतले फूंक रहे हैं। आम हिंदुस्थानियों का गुस्सा चरम पर पहुंच गया है, लोग भड़के हुए हैं। इसी कारण अब कोई भी चीनी सामान बाजारों से खरीदना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो, देर-सबेर केंद्र सरकार यह भी घोषण कर दे, कि जो भी चीनी सामानों का बहिष्कार करेगा, उसपर कार्रवाई की जाएगी। असमंजस की स्थिति बन गई है।
चीनियों की हरकतों के बाद कनफेडेरशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स यानी कैट ने भी उनके सामानों के बहिष्कार के लिए ‘भारतीय सामान-हमारा अभिमान’ जैसी कैंपेन चला रखी है। कैट ने अधिकृत रूप से बताया है कि अगर एक वर्ष तक चीनी सामानों के भारत द्वारा आयात में लगभग १३ बिलियन डॉलर यानी १.५ लाख करोड़ रुपए के उत्पाद कम कर दिए जाएं, तो उसकी औकाद पता चल जाएगी। उनको सबक सिखाने का यह तरीका भी अच्छा रहेगा। कैट का आंकलन तथ्यात्मक और वाजिब इसलिए है क्योंकि चीन का बाजार भारत में बहुत विस्तार कर चुका है। व्यापारिक रिश्ते टूटते ही औंधे मुंह गिर जाएगा। कैट ने चीनी सामानों की एक भारी भरकम लिस्ट भी जारी की है, जो रोज़मर्रा की जरूरतें हैं। भारतीयों से उन सामानों को नहीं खरीदने का आह्वान किया है। आह्वान का असर भी दिखने लगा है। सोशल मीडिया पर ऐसे तस्वीरे तैरने लगी हैं जिसमें लोग अपने चाइनीज फोनों को तोड़ते दिख रहे हैं। फिलहाल जनता ने तो अपने स्तर पर चीन को सबक सिखाना शुरू कर दिया है। इस पर सरकार क्या स्टेप उठाती है इसको लेकर देशवासी सोचने पर मजबूर हो रहे हैं।
संकट के वक्त आवाम की भी जो जिम्मेदारियों बनती हैं उसे वह बखूबी निभा रहे हैं। चीनी सामान न खरीदने का मतलब सीधे तौर पर उनकी आमदनी पर हथोड़ा मारना होगा। जब आर्थिक रूप से चीन कमजोर होगा, तो उसकी आधी शक्तियां अपने आप कमजोर हो जाएंगी। इसलिए ऐसी आहूति सभी को देनी चाहिए। सामान नहीं खरीदने के लिए सभी को कमर कस लेनी चाहिए। वैसे, देश में चीनी उत्पादकों के बहिष्कार की मांग तो पहले से ही उठ रही थी। लेकिन मौजूदा भारत-चीन सैनिकों के बीच हिंसक झड़पों के बाद माहौल और खराब हो गया है।
चीन की पांच बड़ी कंपनियों ने हमारे यहां कब्ज़ा किया हुआ है। गेजेट्स जगत में शिकंजा कसा हुआ है। जिन बड़ी कंपनियों ने भारतीय बाजारों में पैर पसारे हुए हैं उनपर थोड़ा नजर डालते हैं। पहला, ‘श्याओमी’ मोबाइल जिसने मोबाइल क्षेत्र में धूम मचाई हुई है, हर दसवां व्यक्ति इसी कंपनी का ग्राहक है। दूसरी, ‘बाइटडांस’ कंपनी जो टिकटॉक वाली है उसने भी सभी को दीवाना बनाया हुआ हैै। तीसरी, ‘वीवो’ मोबाइल कंपनी है जिसने मोबाइल की दुनिया में करीब २० फीसदी मार्केट फैलाया हुआ है। चौथी कंपनी है ‘यूसी ब्राउजर’ और पांच वी कंपनी है ‘पबजी’ जिसकी दीवानगी भी लोगों के सिर चढ़कर बोल रही है। भारत का हर वर्ग इस ऐप का दीवाना है। फिलहाल बॉर्डर पर तनातनी और बीस भारतीय सैनिकों के शहीद होने के बाद हिंदुस्तानियों ने इन सभी कंपनियों से तौबा करने का मन बना लिया है।
खैर, बहिष्कार की जो अलख जगी है वह रस्मअदायगी मात्र तक सीमित न रहे। आक्रोश का जलजला यथावत रहे। शायद इससे हमारा ही फायदा होगा। क्योंकि इससे देशी निर्मित लघु उद्योग, स्टार्टअप तथा अन्य स्वःनिर्मित वस्तुओं और देशी किस्म के उद्योग-धंधों को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिलेगा। एक बात और चीनी सामान के बहिष्कार से भले ही हमारे अभी छोटे-मझले व्यापारियों को घाटा हो जाए, लेकिन देर-सबेर इस मुहिम की सफलता उनके ही हित में होगी। ये सभी जानते है कि आज से पहले तक छोटे व्यापारियों, कामगारों और कुटीर उद्योगों को सबसे अधिक नुकसान चीनी सामान ने ही पहुंचाया है। उनके सस्ते उत्पादनों ने स्वदेशी सामानों के समक्ष कांटे बोए हैं। चाइना उत्पादकों की कोइ गारंटी नहीं होती बावजूद इसके लोग सस्ता माल होने के चलते खरीदते रहे हैं। बहिष्कार का कुछ लोग विरोध भी करने लगे हैं। पर ये सच है, जो ऐसा कर रहे हैं वह निश्चित रूप से हिंदुस्तान के कामगारों और कुटीर उद्योगों के अरमानों पर चोट कर रहे हैं।